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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
  • अध्याय ५१ * २५५

ये ब्राह्मणाः संस्मरन्ति नमस्यन्ति च सर्वदा।<br>तर्पयन्त्यर्चयन्त्येतान् ब्रह्मविद्यामवाप्नुयुः॥ २९॥<br><br>इदं वैवस्वतं प्रोक्तमन्तरं विस्तरेण तु।<br>भविष्यति च सावर्णो दक्षसावर्ण एव च॥ ३०॥<br><br>दशमो ब्रह्मसावर्णो धर्मसावर्ण एव च।<br>द्वादशो रुद्रसावर्णो रोचमानस्त्रयोदशः।<br>भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्तो भविष्या मनवः क्रमात्॥ ३१॥जो ब्राह्मण सर्वदा इनका स्मरण करते हैं, इन्हें नमस्कार करते हैं, इनका तर्पण करते हैं और इनकी पूजा करते हैं, वे ब्रह्मविद्याको प्राप्त कर लेते हैं। वैवस्वत मन्वन्तरका विस्तारसे वर्णन किया। सावर्ण (आठवाँ) तथा (नवाँ) दक्षसावर्ण मन्वन्तर भविष्यमें होंगे। दसवाँ ब्रह्मसावर्ण, ग्यारहवाँ धर्मसावर्ण, बारहवाँ रुद्रसावर्ण तथा तेरहवाँ रोचमान मन्वन्तर है। चौदहवाँ भौत्य मन्वन्तर कहा गया है। ये मनु क्रमसे भविष्यमें होंगे॥ २९—३१॥
अयं वः कथितो ह्यंशः पूर्वो नारायणेरितः।<br>भूतभव्यैर्वर्तमानैराख्यानैरुपबृंहितः ॥ ३२॥<br><br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि श्रावयेद् वा द्विजोत्तमान्।<br>स सर्वपापनिर्मुक्तो ब्रह्मणा सह मोदते॥ ३३॥<br><br>पठेद् देवालये स्नात्वा नदीतीरेषु चैव हि।<br>नारायणं नमस्कृत्य भावेन पुरुषोत्तमम्॥ ३४॥<br><br>नमो देवादिदेवाय देवानां परमात्मने।<br>पुरुषाय पुराणाय विष्णवे कूर्मरूपिणे॥ ३५॥मैंने नारायणद्वारा कहे गये भूत, भविष्य तथा वर्तमानके आख्यानोंसे उपबृंहित इस पूर्वभागको आप लोगोंसे कहा। जो (ब्राह्मण) इसे पढ़ेगा, सुनेगा अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको* सुनायेगा, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्माके साथ आनन्द प्राप्त करेगा। स्नान करनेके अनन्तर नदियोंके किनारोंपर अथवा देवमन्दिरमें भक्तिभावसे पुरुषोत्तम नारायणको नमस्कार कर इसका पाठ करना चाहिये। देवोंके आदिदेव, देवोंके परमात्मा, पुराण पुरुष कूर्मरूपी विष्णुको नमस्कार है॥ ३२—३५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५१॥

॥ पूर्वविभागः समाप्तः ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥

॥ पूर्वविभाग समाप्त ॥


* द्विजोंको आगे करके पुराण-श्रवण करानेकी विधि है। पुराण-श्रवणका अधिकार अन्य वर्णोंको भी है। द्विज मुख्यरूपसे सात्त्विक वृत्तिके होते हैं तथा प्राणिमात्रका कल्याण ही इनका लक्ष्य होता है, इसीलिये इसकी प्रमुखता है।

( २५६ )

[ उपरिविभाग ]

पहला अध्याय

ईश्वर (शिव) तथा ऋषियोंके संवादमें ईश्वरगीताका उपक्रम

(ईश्वरगीता प्रारम्भ)

ऋषय ऊचुः<br><br>भवता कथितः सम्यक् सर्गः स्वायम्भुवस्ततः।<br>ब्रह्माण्डस्यास्य विस्तारो मन्वन्तरविनिश्चयः॥ १ ॥<br><br>तत्रेश्वरेश्वरो देवो वर्णिभिर्धर्मतत्परैः।<br>ज्ञानयोगरतैर्नित्यमाराध्यः कथितस्त्वया॥ २ ॥<br><br>तद्गदाशेषसंसारदुःखनाशनमुत्तमम् ।<br>ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं येन पश्येम तत्परम्॥ ३ ॥<br><br>त्वं हि नारायणात् साक्षात् कृष्णद्वैपायनात् प्रभो।<br>अवाप्ताखिलविज्ञानस्तत्त्वां पृच्छामहे पुनः॥ ४ ॥ऋषियोंने कहा—(सूतजी!) आपने स्वायम्भुव मन्वन्तरकी सृष्टि तदुपरान्त इस ब्रह्माण्डका विस्तार और (अन्य विभिन्न) मन्वन्तरोंके विषयमें भलीभाँति बतलाया तथा उन (मन्वन्तरों)-में धर्मपरायण ज्ञानयोगी वर्णधर्मके अनुयायियोंके नित्य आराध्य ईश्वरोंके ईश्वर देवका भी वर्णन आपने किया। इसीके साथ ही आपने सम्पूर्ण संसारके दुःखोंको नष्ट करनेवाले एकमात्र ब्रह्मविषयक उस उत्तम ज्ञानका भी वर्णन किया, जिसके द्वारा हम उस परम तत्त्वको देख सकते हैं। प्रभो! आपने साक्षात् नारायण कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-से सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया है, इसलिये हम आपसे पुनः पूछते हैं॥ १-४॥
श्रुत्वा मुनीनां तद् वाक्यं कृष्णद्वैपायनं प्रभुम्।<br>सूतः पौराणिकः स्मृत्वा भाषितुं ह्युपचक्रमे॥ ५ ॥<br><br>अथास्मिन्नन्तरे व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>आजगाम मुनिश्रेष्ठा यत्र सत्रं समासते॥ ६ ॥<br><br>तं दृष्ट्वा वेदविद्वांसं कालमेघसमद्युतिम्।<br>व्यासं कमलपत्राक्षं प्रणेमुर्द्विजपुंगवाः॥ ७ ॥मुनियोंके उस वाक्यको सुनकर पौराणिक सूतजीने प्रभु कृष्ण-द्वैपायनका स्मरणकर कहना प्रारम्भ किया। इसी बीच कृष्ण-द्वैपायन व्यास स्वयं वहाँ पहुँच गये जहाँ श्रेष्ठ मुनिजन यज्ञ कर रहे थे। कृष्ण मेघके समान द्युतिवाले तथा कमलपत्रके समान नेत्रवाले उन वेदके विद्वान् व्यासजीको देखकर श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें प्रणाम किया॥ ५-७॥
पपात दण्डवद् भूमौ दृष्ट्वासौ रोमहर्षणः।<br>प्रदक्षिणीकृत्य गुरुं प्राञ्जलिः पार्श्वगोऽभवत्॥ ८ ॥रोमहर्षण सूतजीने भी उन्हें देखकर भूमिपर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और गुरुकी प्रदक्षिणाकर हाथ जोड़ते हुए उनके पार्श्वभागमें खड़े हो गये। महामुनि (व्यास)-के द्वारा आरोग्यके विषयमें प्रश्न पूछे जानेपर उसका यथोचित उत्तर देकर शौनक आदि महामुनियोंने व्यासजीको आश्वस्त किया तथा उनके योग्य आसन उन्हें प्रदान किया॥ ८-९॥
पृष्टास्तेऽनामयं विप्राः शौनकाद्या महामुनिम्।<br>समाश्र्वास्यासनं तस्मै तद्योग्यं समकल्पयन्॥ ९ ॥
अथैतानब्रवीद् वाक्यं पराशरसुतः प्रभुः।<br>कच्चिन्न तपसो हानिः स्वाध्यायस्य श्रुतस्य च॥ १०॥तदनन्तर पराशरजीके पुत्र प्रभु (व्यास)-ने उनसे पूछा—क्या आप लोगोंके तप, स्वाध्याय तथा श्रवण किये गये वेदादिकी हानि तो नहीं हो रही है?

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२५८ * कूर्मपुराण *


| ततः स सूतः स्वगुरुं प्रणम्याह महामुनिम्।<br>ज्ञानं तद् ब्रह्मविषयं मुनीनां वक्तुमर्हसि ॥ ११ ॥<br><br>इमे हि मुनयः शान्तास्तापसा धर्मतत्पराः।<br>शुश्रूषा जायते चैषां वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ १२ ॥<br><br>ज्ञानं विमुक्तिदं दिव्यं यन्मे साक्षात् त्वयोदितम्।<br>मुनीनां व्याहृतं पूर्वं विष्णुना कूर्मरूपिणा ॥ १३ ॥<br><br>श्रुत्वा सूतस्य वचनं मुनिः सत्यवतीसुतः।<br>प्रणम्य शिरसा रुद्रं वचः प्राह सुखावहम् ॥ १४ ॥<br><br>व्यास उवाच<br><br>वक्ष्ये देवो महादेवः पृष्टो योगीश्वरैः पुरा।<br>सनत्कुमारप्रमुखैः स्वयं यत् समभाषत ॥ १५ ॥<br><br>सनत्कुमारः सनकस्तथैव च सनन्दनः।<br>अङ्गिरा रुद्रसहितो भृगुः परमधर्मवित् ॥ १६ ॥<br><br>कणादः कपिलो योगी वामदेवो महामुनिः।<br>शुक्रो वसिष्ठो भगवान् सर्वे संयतमानसाः ॥ १७ ॥<br><br>परस्परं विचार्यैते संशयाविष्टचेतसः।<br>तप्तवन्तस्तपो घोरं पुण्ये बदरिकाश्रमे ॥ १८ ॥<br><br>अपश्यंस्ते महायोगमृषिं धर्मसुतं शुचिम्।<br>नारायणमनाद्यन्तं नरेण सहितं तदा ॥ १९ ॥<br><br>संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः सर्वे वेदसमुद्भवैः।<br>प्रणेमुर्भक्तिसंयुक्ता योगिनो योगवित्तमम् ॥ २० ॥<br><br>विज्ञाय वाञ्छितं तेषां भगवानपि सर्ववित्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा किमर्थं तप्यते तपः ॥ २१ ॥<br><br>अब्रुवन् हृष्टमनसो विश्वात्मानं सनातनम्।<br>साक्षान्नारायणं देवमागतं सिद्धिसूचकम् ॥ २२ ॥<br><br>वयं संशयमापन्नाः सर्वे वै ब्रह्मवादिनः।<br>भवन्तमेकं शरणं प्रपन्नाः पुरुषोत्तमम् ॥ २३ ॥<br><br>त्वं हि तद् वेत्थ परमं सर्वज्ञो भगवानृषिः।<br>नारायणः स्वयं साक्षात् पुराणोऽव्यक्तपूरुषः ॥ २४ ॥<br><br>नह्यान्यो विद्यते वेत्ता त्वामृते परमेश्वर।<br>शुश्रूषास्माकमखिलं संशयं छेत्तुमर्हसि ॥ २५ ॥<br><br>किं कारणमिदं कृत्स्नं कोऽनुसंसरते सदा।<br>कश्चिदात्मा च का मुक्तिः संसारः किंनिमित्तकः ॥ २६ ॥ | तब उन सूतने अपने गुरु महामुनि (व्यास)-को प्रणामकर कहा—आप ब्रह्मविषयक ज्ञान मुनियोंको बतलायें। ये मुनि शान्त, तपस्वी तथा धर्मपरायण हैं। इन्हें सुननेकी इच्छा है, आप (कृपया) यथार्थरूपसे ब्रह्मविषयक सर्वोच्च ज्ञानका उपदेश करें। मोक्ष प्रदान करनेवाले जिस दिव्य ज्ञानको आपने मुझे तथा पूर्वकालमें कूर्मरूप धारणकर विष्णुने मुनियोंको बतलाया था (इस समय आप उसी ज्ञानका उपदेश दें)। सूतके वचन सुनकर सत्यवतीके पुत्र मुनि (व्यास)-ने रुद्रको मस्तकद्वारा प्रणामकर सुखदायक वचन कहा— ॥ १०–१४ ॥<br><br>व्यासजी बोले—प्राचीन कालमें सनत्कुमार आदि प्रमुख योगीश्वरोंद्वारा पूछनेपर स्वयं प्रभु महादेवने जो कहा था, उसीको मैं कहता हूँ। सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, अंगिरा, रुद्रसहित परम धर्मज्ञ भृगु, कणाद, कपिल, योगी महामुनि वामदेव, शुक्र तथा भगवान् वसिष्ठ—इन सभी संयमित चित्तवाले मुनियोंने संशयान्वित होनेपर परस्पर परामर्श करके पवित्र बदरिकाश्रममें घोर तप किया। तब उन लोगोंने आदि और अन्तसे रहित धर्मपुत्र महायोगी पवित्र नारायण नामक ऋषिका नरके साथ दर्शन किया। उन भक्तिसम्पन्न योगियोंने वेदोंमें वर्णित विविध स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करके उन श्रेष्ठ योगीको प्रणाम किया सर्वज्ञ भगवान् (नारायण)-ने उनके अभीष्टको जानकर पुनः गम्भीर वाणीमें उनसे पूछा कि आपलोग किस प्रयोजनसे तपस्या कर रहे हैं? ॥ १५–२१ ॥<br><br>प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने जिनका शुभ आगमन अभीष्ट-सिद्धिकी निश्चित सूचना देता है (ऐसे) उन विश्वात्मा, सनातन साक्षात् नारायणदेवसे कहा— ॥ २२ ॥<br><br>(भगवन्!) हम सभी ब्रह्मवादी संशयमें पड़ गये हैं। आप पुरुषोत्तम हैं, हम एकमात्र आपकी शरणमें आये हैं। आप उस परम तत्त्वको जाननेवाले हैं, सर्वज्ञ, भगवान्, ऋषि तथा स्वयं साक्षात् नारायण अव्यक्त पुराणपुरुष हैं। परमेश्वर! आपको छोड़कर अन्य कोई दूसरा जाननेवाला नहीं है, हमें सुननेकी इच्छा है, आप सम्पूर्ण संशयको दूर करनेमें समर्थ हैं। इस सम्पूर्ण (कार्यरूप जगत्)-का कारण क्या है? कौन नित्य गतिशील रहता है? आत्मा कौन है? मुक्ति क्या है और संसार (-की रचना)-का क्या प्रयोजन है? इस संसारका चलानेवाला शासक कौन हैं? |

५. उत्तरविभाग (अध्याय १-११) — ईश्वरगीता (भगवान् शिवद्वारा आत्मज्ञान व पाशुपतयोग उपदेश)

* अध्याय १ *२५९
कः संसारयतीशानः को वा सर्वं प्रपश्यति।<br>किं तत् परतरं ब्रह्म सर्वं नो वक्तुमर्हसि ॥ २७॥<br>एवमुक्ते तु मुनयः प्रापश्यन् पुरुषोत्तमम्।<br>विहाय तापसं रूपं संस्थितं स्वेन तेजसा॥ २८॥<br><br>विभ्राजमानं विमलं प्रभामण्डलमण्डितम्।<br>श्रीवत्सवक्षसं देवं तप्तजाम्बूनदप्रभम्॥ २९॥<br><br>शङ्खचक्रगदापाणिं शार्ङ्गहस्तं श्रियावृतम्।<br>न दृष्टस्तत्क्षणादेव नरस्तस्यैव तेजसा॥ ३०॥<br>तदन्तरे महादेवः शशाङ्काङ्कितशेखरः।<br>प्रसादाभिमुखो रुद्रः प्रादुरासीन्महेश्वरः ॥ ३१॥<br>निरीक्ष्य ते जगन्नाथं त्रिनेत्रं चन्द्रभूषणम्।<br>तुष्टुवुर्हृष्टमनसो भक्त्या तं परमेश्वरम् ॥ ३२॥<br>जयेश्वर महादेव जय भूतपते शिव।<br>जयाशेषमुनीशान तपसाभिप्रपूजित ॥ ३३॥<br><br>सहस्रमूर्ते विश्वात्मन् जगद्यन्त्रप्रवर्तक।<br>जयानन्त जगज्जन्मत्राणसंहारकारण ॥ ३४॥<br><br>सहस्रचरणेशान शम्भो योगीन्द्रवन्दित।<br>जयाम्बिकापते देव नमस्ते परमेश्वर ॥ ३५॥<br>संस्तुतो भगवानीशस्त्र्यम्बको भक्तवत्सलः।<br>समालिङ्ग्य हृषीकेशं प्राह गम्भीरया गिरा ॥ ३६॥<br>किमर्थं पुण्डरीकाक्ष मुनीन्द्रा ब्रह्मवादिनः।<br>इमं समागता देशं किं वा कार्यं मयाच्युत ॥ ३७॥<br>आकर्ण्य भगवद्वाक्यं देवदेवो जनार्दनः।<br>प्राह देवो महादेवं प्रसादाभिमुखं स्थितम् ॥ ३८॥<br>इमे हि मुनयो देव तापसाः क्षीणकल्मषाः।<br>अभ्यागता मां शरणं सम्यग् दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ३९॥<br>यदि प्रसन्नो भगवान् मुनीनां भावितात्मनाम्।<br>संनिधौ मम तज्ज्ञानं दिव्यं वक्तुमिहार्हसि ॥ ४०॥<br>त्वं हि वेत्थ स्वमात्मानं न ह्यन्यो विद्यते शिव।<br>ततस्त्वमात्मनात्मानं मुनीन्द्रेभ्यः प्रदर्शय ॥ ४१॥<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रोवाच मुनिपुङ्गवान्।<br>प्रदर्शयन् योगसिद्धिं निरीक्ष्य वृषभध्वजम् ॥ ४२॥<br>संदर्शनान्महेशस्य शंकरस्याथ शूलिनः।<br>कृतार्थं स्वयमात्मानं ज्ञातुमर्हथ तत्त्वतः॥ ४३॥अथवा सबका द्रष्टा कौन है ? परात्पर ब्रह्म क्या है ? यह सब आप हमें बतलायें ॥ २३-२७॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर मुनियोंने तपस्वी-रूपका परित्याग किये हुए, अपने तेजद्वारा प्रतिष्ठित, प्रकाशमण्डलसे मण्डित, वक्षःस्थलमें श्रीवत्स धारण किये हुए, तप्त स्वर्णके समान आभावाले और हाथोंमें शंख, चक्र, गदा तथा शार्ङ्ग नामका धनुष धारण किये हुए लक्ष्मीसहित विमल एवं द्युतिमान् पुरुषोत्तम देवका दर्शन किया। उस समय उन्हींके तेजके कारण नर (ऋषि) नहीं दिखलायी पड़े ॥ २८-३०॥<br><br>उसी समय चन्द्रमासे अंकित मस्तकवाले महादेव महेश्वर रुद्र प्रसन्नतापूर्वक प्रकट हुए। चन्द्रभूषण जगन्नाथ त्रिलोचनका दर्शनकर प्रसन्न मनवाले वे सभी (मुनि) भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरकी स्तुति करने लगे- ॥ ३१-३२॥<br><br>ईश्वरकी जय हो। भूतपति महादेव शिवकी जय हो। सभी मुनियोंके स्वामी तथा तपस्याद्वारा भलीभाँति प्रपूजित होनेवाले आपकी जय हो। सहस्रमूर्ति! विश्वात्मन् ! संसाररूपी यन्त्रके प्रवर्तक और संसारके जन्म, रक्षा और संहारके कारण हे अनन्त! आपकी जय हो। हजारों चरणवाले, ईशान, शम्भु, योगीन्द्रोंद्वारा वन्दित अम्बिकापति ! आपकी जय हो। परमेश्वरदेव ! आपको नमस्कार है॥ ३३-३५॥<br><br>इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भक्तवत्सल भगवान् त्र्यम्बक ईशने हृषीकेशका आलिंगनकर गम्भीर वाणीमें कहा— हे अच्युत ! पुण्डरीकाक्ष ! ये ब्रह्मवादी मुनीन्द्र किस कारणसे इस स्थानपर आये हैं अथवा मुझे क्या करना है ? भगवान्के वाक्यको सुनकर देवाधिदेव जनार्दनदेवने कृपा करनेके लिये उद्यत सामने स्थित महादेवसे कहा-देव ! ये सभी मुनिगण तपस्वी और निष्पाप हैं, ये लोग भलीभाँति तत्त्वदर्शनकी इच्छासे मेरी शरणमें आये हैं। हे भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे समीप इन भावनामय मुनियोंको वह दिव्य ज्ञान प्रदान करें ॥ ३६-४०॥<br><br>शिव ! केवल आप ही अपने-आपको जानते हैं दूसरा कोई आपको जाननेवाला नहीं है। अतः आप स्वयं इन मुनीन्द्रोंको अपना स्वरूप दिखलायें। ऐसा कहकर हृषीकेशने योगसिद्धियोंको दिखाते हुए वृषभध्वजकी ओर देखकर श्रेष्ठ मुनियोंसे कहा- (हे मुनिगणो!) त्रिशूल धारण करनेवाले शंकर महेशके दर्शनसे आपलोग अपने-आपको कृतार्थ समझें। आपलोग यथार्थरूपसे

२६० * कूर्मपुराण *


| प्रष्टुमर्हथ विश्वेशं प्रत्यक्षं पुरतः स्थितम्।<br>ममैव संनिधावेष यथावद् वक्तुमीश्वरः॥ ४४ ॥<br><br>निशम्य विष्णुवचनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>सनत्कुमारप्रमुखाः पृच्छन्ति स्म महेश्वरम्॥ ४५ ॥<br><br>अथास्मिन्नन्तरे दिव्यमासनं विमलं शिवम्।<br>किमप्यचिन्त्यं गगनादीश्वरार्हं समुद्बभौ॥ ४६ ॥<br><br>तत्राससाद योगात्मा विष्णुना सह विश्वकृत्।<br>तेजसा पूरयन् विश्वं भाति देवो महेश्वरः॥ ४७ ॥<br><br>तं ते देवादिदेवेशं शंकरं ब्रह्मवादिनः।<br>विभ्राजमानं विमले तस्मिन् ददृशुरासने॥ ४८ ॥<br><br>यं प्रपश्यन्ति योगस्थाः स्वात्मन्यात्मानमीश्वरम्।<br>अनन्यतेजसं शान्तं शिवं ददृशिरे किल॥ ४९ ॥<br><br>यतः प्रसूतिर्भूतानां यत्रैतत् प्रविलीयते।<br>तमासनस्थं भूतानामीशं ददृशिरे किल॥ ५० ॥<br><br>यदन्तरा सर्वमेतद् यतोऽभिन्नमिदं जगत्।<br>स वासुदेवमासीनं तमीशं ददृशुः किल॥ ५१ ॥<br><br>प्रोवाच पृष्टो भगवान् मुनीनां परमेश्वरः।<br>निरीक्ष्य पुण्डरीकाक्षं स्वात्मयोगमनुत्तमम्॥ ५२ ॥<br><br>तच्छृणुध्वं यथान्यायमुच्यमानं मयानघाः।<br>प्रशान्तमानसाः सर्वे ज्ञानमीश्वरभाषितम्॥ ५३ ॥ | ज्ञान प्राप्त करने योग्य हैं, सामने प्रत्यक्ष स्थित विश्वेशसे (उस तत्त्वज्ञानके विषयमें) पूछें। मेरी संनिधिमें ये यथार्थरूपसे वर्णन करनेमें समर्थ हैं। विष्णुका (यह) वचन सुनकर तथा वृषभध्वजको प्रणामकर सनत्कुमार आदि (ऋषियों)-ने महेश्वरसे पूछा-॥ ४१-४५॥<br><br>इसी बीच आकाशसे ईश्वरके योग्य एक अचिन्त्य दिव्य निर्मल आसन प्रकट हुआ। विश्वकर्ता वे योगात्मा (महेश्वर) विष्णुसहित उस आसनपर बैठ गये। अपने तेजसे विश्वको पूरित करते हुए महेश्वर देव वहाँ सुशोभित हो रहे थे। उन ब्रह्मवादियोंने उन प्रकाशमान देवाधिदेव शंकरका उस निर्मल आसनपर सुशोभित होते हुए दर्शन किया। योगमें स्थित लोग अपनी आत्मामें जिन आत्मस्वरूप ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन्हीं अनन्य तेजस्वी शान्तस्वरूप शिवको उन ब्रह्मवादियोंने देखा, जिनसे समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिनमें यह सब विलीन हो जाता है, उन प्राणियोंके ईशको ब्रह्मवादियोंने आसनपर विराजमान देखा। जिनके भीतर यह सम्पूर्ण संसार है और यह जगत् जिनसे अभिन्न है, उन परमेश्वरको वासुदेवके साथ आसनपर विराजमान देखा॥ ४६-५१॥<br><br>मुनियोंके पूछनेपर परमेश्वर (महेश्वर) भगवान् पुण्डरीकाक्ष (विष्णु)-की ओर देखकर अपने श्रेष्ठ योगका वर्णन करने लगे। शान्त मनवाले अनघ मुनियो! आप सभी लोग सुनें-मैं ईश्वरद्वारा कहे गये ज्ञानका वर्णन यथोचितरूपसे कर रहा हूँ॥ ५२-५३॥ |

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) प्रथमोऽध्यायः॥ १ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) प्रथम अध्याय समाप्त हुआ॥ १ ॥


दूसरा अध्याय

आत्मतत्त्वके स्वरूपका निरूपण, सांख्य एवं योगके ज्ञानका अभेद, आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका वर्णन

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
अवाच्यमेतद् विज्ञानमात्मगुह्यं सनातनम्।<br>यन्न देवा विजानन्ति यतन्तोऽपि द्विजातयः॥ १ ॥<br><br>इदं ज्ञानं समाश्रित्य ब्रह्मभूता द्विजोत्तमाः।<br>न संसारं प्रपद्यन्ते पूर्वेऽपि ब्रह्मवादिनः॥ २ ॥द्विजो! देवता लोग प्रयत्न करनेपर भी जिसे नहीं जान पाते हैं, मेरा यह विज्ञान अत्यन्त गुह्य है, सनातन है एवं बतलाने योग्य (भी) नहीं है। इस ज्ञानका आश्रय ग्रहणकर श्रेष्ठ द्विजगणोंने ब्रह्मभावको प्राप्त किया है। (इस ज्ञानके कारण) पूर्वकालमें भी ब्रह्मवादियोंको पुनः संसारमें आना नहीं पड़ा (अर्थात् इस ज्ञानसे ब्रह्मभाव अवश्य प्राप्त होता है और ब्रह्मभाव
* अध्याय २ *२६१
गुह्याद् गुह्यतमं साक्षाद् गोपनीयं प्रयत्नतः।<br>वक्ष्ये भक्तिमतामद्य युष्माकं ब्रह्मवादिनाम्॥ ३॥प्राप्त करनेके अनन्तर पुनः संसारमें आगमन नहीं होता)।<br>यह ज्ञान गुह्यसे भी गुह्यतम है, इस साक्षात् ज्ञानको<br>प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिये। आप भक्तिसम्पन्न<br>ब्रह्मवादियोंको आज मैं यह ज्ञान बतलाऊँगा॥ १-३॥
आत्मा यः केवलः स्वस्थः शान्तः सूक्ष्मः सनातनः।<br>अस्ति सर्वान्तरः साक्षाच्चिन्मात्रस्तमसः परः॥ ४॥जो आत्मा अद्वितीय, स्वस्थ, शान्त, सूक्ष्म, सनातन,<br>सभीका अन्तरतम साक्षात् चिन्मात्र और तमोगुणसे परे<br>है, वही (आत्मा) अन्तर्यामी है, पुरुष है, वही प्राण है,<br>वही महेश्वर है, वही काल तथा अग्नि है और वही<br>अव्यक्त है—ऐसा श्रुतिका कथन है॥ ४-५॥
सोऽन्तर्यामी स पुरुषः स प्राणः स महेश्वरः।<br>स कालोऽग्निस्तदव्यक्तं स एवेदमिति श्रुतिः॥ ५॥<br>अस्माद् विजायते विश्वमत्रैव प्रविलीयते।<br>स मायी मायया बद्धः करोति विविधास्तनूः॥ ६॥इसीसे संसार उत्पन्न होता है और इसीमें विलीन हो<br>जाता है। वह मायाका नियामक मायासे आबद्ध होकर<br>अपनी इच्छासे मायाको अङ्गीकार कर विविध शरीरोंको<br>उत्पन्न करता है। यह प्रभु आत्मा न तो गतिशील है और<br>न गतिप्रेरक है। न यह पृथ्वी है, न जल है, न तेज है, न<br>वायु है और न आकाश ही है॥ ६-७॥
न चाप्ययं संसरति न च संसारयेत् प्रभुः।<br>नायं पृथ्वी न सलिलं न तेजः पवनो नभः॥ ७॥<br>न प्राणो न मनोऽव्यक्तं न शब्दः स्पर्श एव च।<br>न रूपरसगन्धाश्च नाहं कर्ता न वागपि॥ ८ ॥यह न प्राण है, न मन है, न अव्यक्त है, न शब्द है, न<br>स्पर्श है, न रूप, न रस और न गन्ध ही है। न अभिमानी*<br>है, न वाणी ही है। द्विजोत्तमो ! यह न हाथ, न पैर, न पायु<br>(शौचेन्द्रिय) और न उपस्थ (मूत्रेन्द्रिय), न कर्ता, न भोक्ता<br>तथा प्रकृति-पुरुष भी नहीं है। माया भी नहीं है, प्राण भी<br>नहीं है, अपितु परमार्थतः चैतन्यमात्र है॥ ८-९॥
न पाणिपादौ नो पायुर्न चोपस्थं द्विजोत्तमाः।<br>न कर्ता न च भोक्ता वा न च प्रकृतिपूरुषौ।<br>न माया नैव च प्राणश्चैतन्यं परमार्थतः॥ ९ ॥जिस प्रकार प्रकाश और अन्धकारका कोई सम्बन्ध<br>नहीं हो सकता, उसी प्रकार (सांसारिक) प्रपञ्च और परमात्माका<br>भी कोई ऐक्य (अभेद आदि) सम्बन्ध नहीं हो सकता॥ १०॥
यथा प्रकाशतमसोः सम्बन्धो नोपपद्यते।<br>तद्वदैक्यं न सम्बन्धः प्रपञ्चपरमात्मनोः॥ १०॥जिस प्रकार संसारमें धूप और छाया एक-दूसरेसे<br>विलक्षण हैं, वैसे ही पुरुष तथा प्रपञ्च भी तत्त्वतः<br>एक-दूसरेसे भिन्न हैं। यदि आत्मा स्वभावसे मलिन,<br>अस्वस्थ तथा विकारयुक्त होता तो उसकी मुक्ति सैकड़ों<br>जन्मोंमें भी नहीं होती। योगयुक्त मुनिजन परमार्थतः<br>अपने विकाररहित, दुःखशून्य, आनन्दस्वरूप, अव्यय<br>आत्माका दर्शन करते हैं॥ ११-१३॥
छायातपौ यथा लोके परस्परविलक्षणौ।<br>तद्वत् प्रपञ्चपुरुषौ विभिन्नौ परमार्थतः॥ ११॥<br>यद्यात्मा मलिनोऽस्वस्थो विकारी स्यात् स्वभावतः।<br>नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि॥ १२॥<br>पश्यन्ति मुनयो युक्ताः स्वात्मानं परमार्थतः।<br>विकारहीनं निर्दुःखमानन्दात्मानमव्ययम्॥ १३॥मैं कर्ता हूँ, सुखी, दुःखी, कृश एवं स्थूल हूँ—<br>इस प्रकारकी जो बुद्धि है, वह मनुष्योंके द्वारा अहंकारके<br>कारण ही अपनी आत्मामें आरोपित है। वेदके विद्वान्<br>लोग (आत्माको) साक्षी, प्रकृतिसे परे, भोक्ता, अक्षर,<br>शुद्ध तथा सर्वत्र सम रूपसे व्याप्त बतलाते हैं। अतएव
अहं कर्ता सुखी दुःखी कृशः स्थूलेति या मतिः।<br>सा चाहंकारकर्तृत्वादात्मन्यारोप्यते जनैः॥ १४॥<br>वदन्ति वेदविद्वांसः साक्षिणं प्रकृतेः परम्।<br>भोक्तारमक्षरं शुद्धं सर्वत्र समवस्थितम्॥ १५॥

* 'अहम्' इस शब्दका प्रयोक्ता नहीं है, न 'अहम्' यह शब्द ही है।

२६२ * कूर्मपुराण *


तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम्।
अज्ञानादन्यथा ज्ञानं तच्च प्रकृतिसङ्गतम् ॥ १६ ॥

नित्योदितः स्वयं ज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः।
अहंकाराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते॥ १७॥

पश्यन्ति ऋषयोऽव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः ॥ १८ ॥

तेनायं संगतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरञ्जनः।
स्वात्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्येत तत्त्वतः ॥ १९ ॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद् दुःखं तथेतरम्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वे भ्रान्तिनिबन्धनाः॥ २०॥

कर्मण्यस्य भवेद् दोषः पुण्यापुण्यमिति स्थितिः।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः॥ २१॥

नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥ २२॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदो व्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥ २३॥

यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते ॥ २४ ॥

यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोऽमलः।
उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २५ ॥

ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद् विचक्षणाः।
अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः॥ २६॥

कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः।
दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २७॥


यह संसार सभी प्राणियोंके अज्ञानके कारण ही है। अज्ञानसे अन्यथा (विपरीत) ज्ञान होता है अर्थात् अज्ञानका नाश ज्ञानसे ही होता है और यह प्रकृतिसंगत (प्राणियोंके मूल स्वभावके सर्वथा अनुकूल शाश्वत शान्तिरूप) होता है॥ १४—१६॥

अहंकारसे उत्पन्न अविवेकके कारण स्वयं ज्योतिरूप, नित्य प्रकाशयुक्त सर्वव्यापी परम पुरुष अपनेको 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। ब्रह्मवादी ऋषिगण प्रधान, प्रकृति और कारणको समझकर सत् एवं असत्-स्वरूप, अव्यक्त नित्यतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं। कूटस्थ एवं निरञ्जन होते हुए भी यह आत्मा उस (प्रधान, प्रकृति आदि)-से संगत होकर स्वात्मस्वरूप अक्षर ब्रह्मका यथार्थरूपसे ज्ञान नहीं कर पाता॥ १७—१९॥

अनात्मतत्त्वमें आत्मविषयक विज्ञानसे ही दुःख होता है तथा इसी प्रकारकी भ्रान्तिके कारण ही राग, द्वेष आदि सभी दोष उत्पन्न होते हैं। इसके (भ्रान्त पुरुषके) कर्ममें ही दोष होता है, इसी कारण पाप-पुण्यकी स्थिति बनती है और उन कर्मोंके अनुसार ही सभी प्रकारके देहकी उत्पत्ति होती है। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ और दोषोंसे रहित है। यह अद्वितीय आत्मा मायारूप शक्तिके कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, स्वभावतः इसमें भेद नहीं है॥ २०—२२॥

इसी कारण मुनिजन आत्माको परमार्थतः अद्वैत ही कहते हैं। व्यक्त (महत्तत्त्व, अहंतत्त्व आदि)-के स्वभावसे जो भेद दिखलायी पड़ता है और यह भेद मूलतः माया (प्रकृति)-के कारण ही है तथा यह आत्मा (पुरुष)-के आश्रित होकर ही सब कुछ करती है। जैसे धुएँके सम्पर्कसे आकाश मलिन नहीं होता, वैसे ही अन्तःकरणसे उत्पन्न होनेवाले भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता। जैसे अद्वितीय शुद्ध स्फटिक अपनी आभासे प्रकाशित होता है, वैसे ही उपाधियोंसे रहित निर्मल आत्मा (अपने ही प्रकाशसे) प्रकाशित होता है। विद्वान् लोग इस संसारको ज्ञानस्वरूप ही कहते हैं, परंतु दूसरे कुत्सित दृष्टि रखनेवाले अज्ञानी लोग इसे अर्थस्वरूप (विषयस्वरूप) मानते हैं॥ २३—२६॥

भ्रान्त दृष्टिवाले पुरुषोंके द्वारा स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी और चैतन्य आत्मा अर्थरूपसे ही देखा जाता है। जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक गुञ्जा आदि

* अध्याय २ *२६३
यथा संलक्ष्यते रक्तः केवलः स्फटिको जनैः ।<br>रक्तिकाद्युपधानेन तद्वत् परमपूरुषः ॥ २८ ॥उपाधिके कारण लोगोंको लाल वर्णका-सा दिखलायी पड़ता है, वैसे ही परम पुरुष भी (मायाके द्वारा नाम-रूपात्मक उपाधियुक्त प्रतीत होनेके कारण अनेक रूपोंमें दिखलायी पड़ता) है। इस कारण मोक्षके अभिलाषियोंको अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी तथा अव्यय उस आत्माका श्रवण, मनन तथा उपासना करनी चाहिये। (जिससे माया (अज्ञान)-की निवृत्ति हो तथा शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो) योगीके मनमें जब सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला चैतन्य सदा प्रकाशित होता है, तब वह योगी बिना किसी व्यवधानके आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ॥ २७-३० ॥
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः ।<br>उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा ।<br>योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयंम् ॥ ३० ॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ।<br>सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१ ॥(योगी) जब सभी प्राणियोंको अपनी आत्मामें अच्छी प्रकार स्थित देख लेता है और सभी प्राणियोंमें अपनेको स्थित देखता है, तब उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है। जब (योगी) समाधिकी अवस्थामें किसी भी प्राणीको (अपनेसे भिन्न) नहीं देखता (अर्थात् समस्त प्रपञ्चमें आत्मदर्शन करता है), तब वह उस परतत्त्वसे एकात्मभाव प्राप्त कर लेता है और अद्वितीय हो जाता है। उसके हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ जब समाप्त हो जाती हैं तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर (परम) कल्याण प्राप्त कर लेता है। (योगी) जब प्राणियोंके पार्थक्यको एक तत्त्वमें स्थित देखता है और उसी (तत्त्व)-से उनका विस्तार होना समझता है, तब उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। जब वह परमार्थतः (सर्वत्र) केवल अद्वितीय आत्माको ही देखता है और सम्पूर्ण जगत्को मायामात्र समझता है, तब वह मुक्त हो जाता है ॥ ३१-३५ ॥
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति ।<br>एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ॥ ३२ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।<br>तदासावमृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः ॥ ३३ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।<br>तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३४ ॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः ।<br>मायामात्रं जगत् कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः ॥ ३५ ॥
यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम् ।<br>केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः ॥ ३६ ॥जब योगीको जन्म, जरा, दुःख और समस्त व्याधियोंके एकमात्र औषध अद्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, तब वह शिवरूप हो जाता है। जिस प्रकार संसारमें नद एवं नदियाँ सागरके साथ एकरूपताको प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार यह आत्मा (जीवात्मा) निष्कल अक्षर (ब्रह्म)-के साथ एकत्व प्राप्त करता है ॥ ३६-३७ ॥
यथा नदीनदा लोके सागरेणैकतां ययुः ।<br>तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत् ॥ ३७ ॥
तस्माद् विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ।<br>अज्ञानेनावृतं लोको विज्ञानं तेन मुह्यति ॥ ३८ ॥इसलिये विज्ञानका ही अस्तित्व है, प्रपञ्च और संसरणशील संसारका अस्तित्व नहीं है। विज्ञान अज्ञानसे आवृत रहता है, इसीसे संसार (जीव) मोहमें पड़ता है। ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्पक और अव्यय है, अज्ञानके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विज्ञान है—ऐसा मेरा मत है। यह आप लोगोंको सांख्य नामक परमोत्तम ज्ञान बतलाया। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है। इसमें चित्तकी एकाग्रता ही योग है ॥ ३८-४० ॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् ।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ॥ ३९ ॥
एतद् वः परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् ।<br>सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता ॥ ४० ॥

२६४ * कूर्मपुराण *

योगात् सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते ।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित् ॥ ४१ ॥<br><br>यदेव योगिनो यान्ति सांख्यैस्तदधिगम्यते ।<br>एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४२ ॥योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित (स्थिर) होता है। योग तथा ज्ञानसम्पन्न (पुरुष)-के लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। योगी जिसे प्राप्त करते हैं, सांख्यवेत्ताओंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योगको एक ही समझता है, वह तत्त्वज्ञानी होता है ॥ ४१-४२ ॥
अन्ये च योगिनो विप्रा ऐश्वर्यासक्तचेतसः ।<br>मज्जन्ति तत्र तत्रैव न त्वात्मैषामिति श्रुतिः ॥ ४३ ॥<br><br>यत्तत् सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् ।<br>ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥<br><br>एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः ।<br>कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ ४५ ॥विप्रो! ऐश्वर्य (आठ प्रकारकी सिद्धियों एवं अन्य वैभव आदि)-में आसक्तचित्त अन्य योगीजन उसीमें डूबे रहते हैं, अतएव उन्हें आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं होता—ऐसा श्रुतिवचन है। जो सर्वव्यापी, दिव्य ऐश्वर्यरूप, अचल और महत् (सर्वश्रेष्ठ) है, उसे ज्ञान और योगसम्पन्न पुरुष देहान्त होनेपर प्राप्त करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें सर्वात्मा, सर्वतोमुखके रूपमें प्रतिपादित, अव्यक्त, मायावी (मायाका अधिष्ठाता) तथा परमेश्वरस्वरूप मैं ही यह आत्मा हूँ ॥ ४३-४५ ॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः ।<br>सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः ॥ ४६ ॥<br><br>अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः ।<br>अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम् ॥ ४७ ॥<br><br>वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन ।<br>प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ४८ ॥<br><br>पश्यन्ति ऋषयो हेतुमात्मनः सूक्ष्मदर्शिनः ।<br>निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥<br><br>यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मम मायया ।<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः ॥ ५० ॥मैं अन्तर्यामी, सनातन, सर्वकाम, सर्वरस, सर्वगन्ध, अजर, अमर और सभी ओर हाथ-पैरवाला हूँ। हाथ और पैरके बिना भी मैं गति करने एवं ग्रहण करनेवाला हूँ। (सभी प्राणियोंके) हृदयमें स्थित हूँ। बिना नेत्रोंके भी देखता हूँ और बिना कानोंके भी मैं सुनता हूँ। मैं इस समस्त प्रपञ्चको जानता हूँ, परंतु मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी लोग मुझे अद्वितीय महान् पुरुष कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऋषि गुणरहित और विशुद्धरूप आत्माके हेतुस्वरूप उस श्रेष्ठ ऐश्वर्य (सर्वोत्कृष्ट ज्ञान)-का दर्शन (साक्षात्कार) करते हैं। ब्रह्मवादियो! मेरी मायासे मोहित होनेके कारण देवता भी जिस (तत्त्व)-को नहीं जानते उसे मैं कहता हूँ, आप लोग ध्यान लगाकर सुनें— ॥ ४६-५० ॥
नाहं प्रशास्ता सर्वस्य मायातीतः स्वभावतः ।<br>प्रेरयामि तथापीदं कारणं सूरयो विदुः ॥ ५१ ॥मायातीत मैं स्वभावतः सबका अनुशास्ता नहीं हूँ, तथापि इस जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, विद्वान् लोग इसका कारण जानते हैं (वह कारण अहैतुकी कृपा ही है।)।
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।<br>प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥मेरा जो अत्यन्त गुह्यतम तथा सर्वव्यापी देह है, तत्त्वदर्शी योगीजन उसमें प्रविष्ट होते हैं और मेरे अविनाशी सायुज्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं।
तेषां हि वशमापन्ना माया मे विश्वरूपिणी ।<br>लभन्ते परमां शुद्धिं निर्वाणं ते मया सह ॥ ५३ ॥मेरी विश्वरूपिणी माया उनके वशमें रहती है। वे मेरे साथ (मेरा सायुज्य प्राप्तकर) परम शुद्धि और निर्वाणको प्राप्त करते हैं।
* अध्याय ३ *२६५
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।<br>प्रसादान्मम योगीन्द्रा एतद् वेदानुशासनम्॥ ५४॥मेरी कृपासे सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता। योगीन्द्रो! यह वेदोंका अनुशासन है॥ ५१—५४॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं ब्रह्मवादिभिः।<br>मदुक्तमेतद् विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्॥ ५५॥ब्रह्मवादियोंको चाहिये कि वे मेरे द्वारा कहे गये इस सांख्य-योग-समन्वित विज्ञानको (अपने) पुत्र*, शिष्य एवं योगियोंके अतिरिक्त और किसी दूसरेको प्रदान न करें॥ ५५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

अव्यक्त शिवतत्त्वसे सृष्टिका कथन, परमात्माके स्वरूपका वर्णन तथा प्रधान, पुरुष एवं महदादि तत्त्वोंसे सृष्टिका क्रम-वर्णन, शिवस्वरूपका निरूपण

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
अव्यक्तादभवत् कालः प्रधानं पुरुषः परः।<br>तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥ १॥<br><br>सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २॥अव्यक्त (तत्त्व)-से काल, प्रधान तथा परम पुरुष उत्पन्न हुए। उन (कालादि)-से यह समस्त जगत् उत्पन्न हुआ, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है। जिसके हाथ और पैरका प्रसार सर्वत्र है, जिसके नेत्र, मस्तक, मुख एवं कर्ण सर्वत्र वर्तमान हैं एवं जो समस्त (विश्व)-को आवृत्तकर स्थित है, वही (ब्रह्म) है॥ १-२॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।<br>सर्वाधारं सदानन्दमव्यक्तं द्वैतवर्जितम्॥ ३॥<br><br>सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम्।<br>निर्विकल्पं निराभासं सर्वावासं परामृतम्॥ ४॥<br><br>अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्।<br>निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः॥ ५॥वह सभी इन्द्रियोंके गुणोंके आभासवाला है, अर्थात् सभी इन्द्रियोंके गुण उसमें प्रतीत होते हैं; किंतु सभी इन्द्रियोंसे रहित है। वह सभीका आधार है, सदा आनन्दस्वरूप, अव्यक्त और द्वैतसे रहित (अद्वैत तत्त्व) है। वह सभी उपमानोंसे रहित (निरुपमेय) इन्द्रियोंद्वारा प्रमाणोंसे ज्ञात न होने योग्य, निर्विकल्प, निराभास, सभीका आश्रय, परम अमृतस्वरूप, अभिन्न, भिन्नरूपसे स्थित (प्रतीत), शाश्वत, ध्रुव, अव्यय, निर्गुण और परम व्योमरूप है, उसे विद्वान् लोग जानते हैं॥ ३—५॥
स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यन्तरः परः।<br>सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः॥ ६॥<br><br>मया ततमिदं विश्वं जगद्व्यक्तमूर्तिना।<br>मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ ७॥<br><br>प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम्।<br>तयोरनादिरुद्दिष्टः कालः संयोजकः परः॥ ८॥वह सभी प्राणियोंका आत्मा है, वह बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला परम तत्त्व है। मैं (भी) वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ। मुझ अव्यक्त स्वरूपवालेके द्वारा ही इस विश्वका विस्तार हुआ है। सभी प्राणी मुझमें ही अवस्थित हैं, जो उसे जानता है, वह वेदज्ञ है प्रधान और पुरुष—ये ही दो तत्त्व कहे गये हैं। अनादि उत्कृष्ट कालको ही उन दोनोंका परम संयोजक कहा गया है॥ ६—८॥

* ब्रह्मवादीका पुत्र अनुशासित ही होगा, इसलिये पुत्रको ज्ञानका अधिकारी माना गया है।

२६६ * कूर्मपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रयमेतदनाद्यन्तमव्यक्ते समवस्थितम्।<br>तदात्मकं तदन्यत् स्यात् तद्रूपं मामकं विदुः॥ ९ ॥(प्रधान, पुरुष और काल—) ये तीनों तत्त्व अनादि, अन्तरहित, अव्यक्त (परम तत्त्व)-में स्थित हैं। वह (परम तत्त्व) तदात्मक (प्रधान आदिका प्रेरक होते हुए भी) तद्भिन्न (उनसे सर्वथा असंसृष्ट) है, वह (परम तत्त्व) मेरा ही रूप है, यह विद्वान् लोग ही जानते हैं।
महदाद्यं विशेषान्तं सम्प्रसूतेऽखिलं जगत्।<br>या सा प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ १० ॥<br>पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते यः प्राकृतान् गुणान्।<br>अहंकारविमुक्तत्वात् प्रोच्यते पञ्चविंशकः॥ ११ ॥जो महत् (तत्त्व)-से लेकर विशेषपर्यन्त समस्त संसारको उत्पन्न करती है, वह सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली प्रकृति कही गयी है। जो प्रकृतिस्थ होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है, वह पुरुष है। अहंकार (अहं-तत्त्व)-से विमुक्त होनेके कारण वह पुरुष पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है॥ ९—११॥
आद्यो विकारः प्रकृतेर्महानात्मेति कथ्यते।<br>विज्ञानशक्तिर्विज्ञाता ह्यहंकारस्तदुत्थितः॥ १२ ॥<br>एक एव महानात्मा सोऽहंकारोऽभिधीयते।<br>स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः॥ १३ ॥प्रकृतिके प्रथम विकारको महान् आत्मा (महत्तत्त्व) कहते हैं। उस विज्ञानशक्तिसे सम्पन्न विज्ञाता ('अहम्' अर्थात् अभिमानका मूल कारण) अहंकार उत्पन्न होता है। वही एक महान्* आत्मा 'अहंकार' कहलाता है। तत्त्वचिन्तकोंके द्वारा वह 'जीव' तथा 'अन्तरात्मा' इस नामसे कहा गया है॥ १२-१३॥
तेन वेद्यते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु।<br>स विज्ञानात्मकस्तस्य मनः स्यादुपकारकम्॥ १४ ॥<br>तेनाविवेकतस्तस्मात् संसारः पुरुषस्य तु।<br>स चाविवेकः प्रकृतौ सङ्गात् कालेन सोऽभवत्॥ १५ ॥<br>कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।<br>सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद् वशे॥ १६ ॥जीवनमें उसीके द्वारा सुख एवं दुःख आदि सभीका अनुभव होता है। वह विज्ञानस्वरूप (विविध सांसारिक ज्ञानका मूल) है। उस (अहंकार)-का उपकारक मन है। उससे अविवेक उत्पन्न होता है और फिर उस अविवेकसे पुरुषका संसार बनता है। 'प्रकृति' से कालका सम्पर्क होनेसे वह अविवेक उत्पन्न होता है। काल ही प्राणियोंकी सृष्टि करता है और काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं, काल किसीके वशमें नहीं है॥ १४–१६॥
सोऽन्तरा सर्वमेवेदं नियच्छति सनातनः।<br>प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषोत्तमः॥ १७ ॥<br>सर्वेन्द्रियेभ्यः परमं मन आहुर्मनीषिणः।<br>मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः॥ १८ ॥<br>महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।<br>पुरुषाद् भगवान् प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत्॥ १९ ॥<br>प्राणात् परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः।<br>सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः।<br>नास्ति मत्तः परं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते॥ २० ॥वह सनातन (काल) अन्तःप्रविष्ट होकर इस सम्पूर्ण (विश्व)-का नियमन करता है। इस कालको भगवान् प्राण, सर्वज्ञ तथा पुरुषोत्तम कहा जाता है। मनीषियोंने मनको सभी इन्द्रियोंसे उत्कृष्ट एवं मनसे अधिक उत्कृष्ट अहंकारको और अहंकारसे उत्कृष्ट महान्को (महत्तत्त्व) बतलाया है। महत्से उत्कृष्ट अव्यक्त, अव्यक्तसे उत्कृष्ट पुरुष तथा पुरुषसे उत्कृष्ट भगवान् प्राण हैं। यह सम्पूर्ण संसार उसीसे है। प्राणसे परतर व्योम है और व्योमसे अतीत अग्नि ईश्वर है। मैं वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानस्वरूप परमेश्वर हूँ। मुझसे उत्कृष्ट और कोई तत्त्व नहीं है। मुझे जान लेनेसे मुक्ति हो जाती है॥ १७–२०॥

* सृष्टिमें अहंकारका महत्त्वपूर्ण स्थान होनेसे उसके लिये 'महान् आत्मा' यह लाक्षणिक प्रयोग है।

  • अध्याय ४ * | २६७ ---|---
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।<br>ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम्॥ २१॥<br><br>सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत्।<br>मायी मायामयो देवः कालेन सह सङ्गतः॥ २२॥<br><br>मत्संनिधावेष कालः करोति सकलं जगत्।<br>नियोजयत्यनन्तात्मा ह्येतद् वेदानुशासनम्॥ २३॥इस संसारमें एकमात्र मुझ अव्यक्त, व्योमरूप महेश्वरको छोड़कर कोई भी स्थावर-जंगमात्मक तत्त्व नित्य नहीं है अर्थात् महेश्वरको छोड़कर सब कुछ अनित्य है। वही मैं मायावी तथा मायामय देव कालके संसर्गसे सम्पूर्ण (संसार)-की सदा सृष्टि करता हूँ और (फिर) संहार करता हूँ। मेरे सांनिध्यमें ही यह काल (तत्त्व) सम्पूर्ण जगत्‌की (सृष्टि) करता है। वेदका यह कथन है कि अनन्तात्मा ही उस (काल)-को (इस कार्यमें) नियोजित करता है॥ २१—२३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

शिव-भक्तिका माहात्म्य, शिवोपासनाकी सुगमता, ज्ञानरूप शिवस्वरूपका वर्णन, शिवकी तीन प्रकारकी शक्तियोंका प्रतिपादन, शिवके परम तत्त्वका निरूपण

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य येनेदं सम्प्रवर्तते॥ १॥हे ब्रह्मवादियो! आपलोग ध्यान लगाकर सुनें। जिससे यह सभी प्रवर्तित होता है, उस देवाधिदेवके माहात्म्यको मैं बताता हूँ॥ १॥
नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन न चेज्यया।<br>शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम्॥ २॥मैं न तो विविध प्रकारके तपसे, न दानसे और न यज्ञोंसे ही जानने योग्य हूँ। बिना उत्तम भक्तिके मनुष्य मुझे जान नहीं सकता। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला मैं सभी भावोंके अन्तःमें प्रविष्ट रहता हूँ। परंतु मुनीश्वरो! मुझ सर्वसाक्षीको संसार जान नहीं पाता। जिसके भीतर यह सब प्रतिष्ठित है और जो परम तत्त्व सभीके अन्तःमें स्थित है, मैं वही धाता, विधाता, काल, अग्नि तथा सभी ओर मुखवाला हूँ। सभी मुनि, देवता, ब्रह्मा, मनु, इन्द्र और जो अत्यन्त तेजस्वी हैं, वे भी मुझे नहीं देख पाते॥ २—५॥
अहं हि सर्वभावानामन्तस्तिष्ठामि सर्वगः।<br>मां सर्वसाक्षिणं लोको न जानाति मुनीश्वराः॥ ३॥
यस्यान्तरा सर्वमिदं यो हि सर्वान्तरः परः।<br>सोऽहं धाता विधाता च कालोऽग्निर्विश्वतोमुखः॥ ४॥
न मां पश्यन्ति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः।<br>ब्रह्मा च मनवः शक्रो ये चान्ये प्रथितौजसः॥ ५॥
गृणन्ति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम्।<br>यजन्ति विविधैरग्निं ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः॥ ६॥वेद मुझ अद्वितीय परमेश्वरकी निरन्तर स्तुति किया करते हैं। ब्राह्मण अनेक प्रकारके वैदिक यज्ञोंके द्वारा अग्निरूप मेरा यजन करते हैं। सभी लोक तथा लोकपितामह ब्रह्मा मुझे नमस्कार करते हैं। योगी जन सभी प्राणियोंके अधिपति (मुझ) ईश्वर देवका ध्यान करते हैं। सबकी आत्मा और सर्वव्यापी मैं ही सभी देवोंके शरीरोंको धारण कर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता एवं सभी फलोंका प्रदाता हूँ॥ ६—८॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ध्यायन्ति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम्॥ ७॥
अहं हि सर्वहविषां भोक्ता चैव फलप्रदः।<br>सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्थितः॥ ८॥

२६८ * कूर्मपुराण *

मां पश्यन्तीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः।<br>तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्त्या मामुपासते॥ ९॥धार्मिक वेदनिष्ठ विद्वान् मेरा दर्शन करते हैं। जो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, मैं नित्य उनके समीपमें रहता हूँ। धार्मिक ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य मेरी उपासना करते हैं। मैं उन्हें आनन्दस्वरूप परमपद नामक स्थान प्रदान करता हूँ॥ ९-१०॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते।<br>तेषां ददामि तत् स्थानमानन्दं परमं पदम्॥ १०॥<br>अन्येऽपि ये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीचजातयः।<br>भक्तिमन्तः प्रमुच्यन्ते कालेन मयि संगताः॥ ११॥अन्य भी जो विपरीत कर्म करनेके कारण शूद्र आदि निम्न जातियोंमें हैं, भक्तिपरायण होनेपर वे भी मुक्त हो जाते हैं और यथासमय मुझमें लीन हो जाते हैं। मेरे भक्त विनाशको प्राप्त नहीं होते, मेरे भक्त पापोंसे रहित हो जाते हैं। मैंने प्रारम्भमें ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि मेरे भक्तका विनाश नहीं होता। जो उस (भक्त)-की निन्दा करता है, वह मूढ देवाधिदेव (शंकर)-की ही निन्दा करता है और जो उस (भक्त)-की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, (समझो कि) वह सदा मेरी ही पूजा करता है। मेरी आराधनाके लिये जो नियमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल तथा जल मुझे प्रदान करता है, वह मेरा प्रिय भक्त है, ऐसा समझना चाहिये॥ ११-१४॥
न मद्भक्ता विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः।<br>आदावेतत् प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति॥ १२॥
यो वै निन्दति तं मूढो देवदेवं स निन्दति।<br>यो हि तं पूजयेद् भक्त्या स पूजयति मां सदा॥ १३॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकारणात्।<br>यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः॥ १४॥<br>अहं हि जगतामादौ ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>विधाय दत्तवान् वेदानशेषानात्मनिःसृतान्॥ १५॥मैंने ही संसारकी सृष्टिके प्रारम्भमें परमेष्ठी ब्रह्माकी सृष्टिकर अपनेसे प्रादुर्भूत सम्पूर्ण वेदोंको उन्हें प्रदान किया। मैं ही सभी योगियोंका अव्यय गुरु, धार्मिक जनोंका रक्षक तथा वेदसे द्वेष रखनेवालोंको विनष्ट करनेवाला हूँ॥ १५-१६॥
अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः।<br>धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम्॥ १६॥<br>अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह।<br>संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः॥ १७॥मैं ही योगियोंको समस्त संसारसे मुक्त करनेवाला हूँ। मैं ही संसारका कारण और सम्पूर्ण संसारसे विवर्जित (असंसृष्ट) हूँ। मैं ही संहार करनेवाला और मैं ही सृष्टि तथा पालन करनेवाला मायावी हूँ। मेरी शक्ति माया है, वह संसारको मोहित करनेवाली है॥ १७-१८॥
अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः।<br>मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी॥ १८॥<br>ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते।<br>नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः॥ १९॥मेरी ही जो पराशक्ति है, वह 'विद्या' इस नामसे कही जाती है। योगियोंके हृदयमें रहते हुए मैं उस मायाको नष्ट कर देता हूँ। सभी शक्तियोंका प्रवर्तन करनेवाला तथा निवर्तन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं सभीका आधार और अमृतका आश्रय-स्थान हूँ। मुझमें अधिष्ठित और मेरी स्वरूपभूता जो सबके अन्तरमें स्थित अद्वितीय शक्ति है, वह ब्रह्माका रूप धारणकर विविध प्रकारके संसारकी सृष्टि करती है और जो मेरी दूसरी विपुल शक्ति है, वह अनन्त, जगन्नाथ, जगन्मय और नारायणका रूप धारणकर संसारकी स्थापना (पालन आदि कार्य) करती है॥ १९-२२॥
अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च॥ २०॥
एका सर्वान्तरा शक्तिः करोति विविधं जगत्।<br>आस्थाय ब्रह्मणो रूपं मन्मयी मदधिष्ठिता॥ २१॥
अन्या च शक्तिर्विपुला संस्थापयति मे जगत्।<br>भूत्वा नारायणोऽनन्तो जगन्नाथो जगन्मयः॥ २२॥
* अध्याय ४ *२६९
तृतीया महती शक्तिर्निहन्ति सकलं जगत्।<br>तामसी मे समाख्याता कालाख्या रुद्ररूपिणी॥ २३॥<br>ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे।<br>अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे॥ २४॥<br><br>सर्वेषामेव भक्तानामिष्टः प्रियतरो मम।<br>यो हि ज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा॥ २५॥<br><br>अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकाङ्क्षिणः।<br>तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः॥ २६॥<br><br>मया ततमिदं कृत्स्नं प्रधानपुरुषात्मकम्।<br>मय्येव संस्थितं विश्वं मया सम्प्रेर्यते जगत्॥ २७॥मेरी तीसरी जो रुद्ररूपिणी काल नामक महती तामसी शक्ति है, वह समस्त जगत्का संहार करती है कुछ लोग ध्यानद्वारा, कुछ दूसरे लोग ज्ञानद्वारा, कुछ भक्तियोगके द्वारा और कुछ कर्मयोगके द्वारा मेरा दर्शन करते हैं। जो किसी अन्य प्रकारसे नहीं, अपितु केवल ज्ञानद्वारा नित्य मेरी आराधना करता है, वह सभी भक्तोंमें मुझे प्रिय है, प्रियतर है अर्थात् अत्यन्त प्रिय है। अन्य भी जो मेरी आराधना करनेके अभिलाषी तीन (प्रकारके) भक्त हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता। मेरे द्वारा ही यह सम्पूर्ण प्रधान और पुरुषरूप संसार व्याप्त है। यह विश्व मुझमें ही स्थित है और मेरे द्वारा ही संसार प्रेरित किया जाता है॥ २३—२७॥
नाहं प्रेरयिता विप्राः परमं योगमाश्रितः।<br>प्रेरयामि जगत्कृत्स्नमेतद्यो वेद सोऽमृतः॥ २८॥<br><br>पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभावतः।<br>करोति कालो भगवान् महायोगेश्वरः स्वयंम्॥ २९॥<br><br>योगः सम्प्रोच्यते योगी माया शास्त्रेषु सूरिभिः।<br>योगेश्वरोऽसौ भगवान् महादेवो महान् प्रभुः॥ ३०॥हे विप्रो! परम योगमें ही सदा निरत रहनेवाला मैं प्रेरक नहीं हूँ, तथापि सम्पूर्ण जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, इस (रहस्य)-को जो जानता है, वह अमर हो जाता* है। अपने स्वभाववश प्रवर्तमान समस्त जगत्का मैं साक्षीमात्र हूँ। महायोगेश्वर भगवान् काल स्वयं ही (जगत्की सृष्टि) करते हैं। विद्वानोंने शास्त्रोंमें जिसे योग, योगी और माया कहा है, वह सब प्रभु महादेव भगवान् महायोगेश्वर ही हैं अर्थात् योगेश्वर महादेवमें ही यह सब कल्पित है॥ २८—३०॥
महत्त्वं सर्वतत्त्वानां परत्वात् परमेष्ठिनः।<br>प्रोच्यते भगवान् ब्रह्मा महान् ब्रह्ममयोऽमलः॥ ३१॥<br><br>यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ ३२॥<br><br>सोऽहं प्रेरयिता देवः परमानन्दमाश्रितः।<br>नृत्यामि योगी सततं यस्तद् वेद स वेदवित्॥ ३३॥<br><br>इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निश्चितम्।<br>प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिकायाहिताग्नये॥ ३४॥परमेष्ठी सभी तत्त्वोंसे परे हैं अतः सभी तत्त्वोंका महत्त्व ही भगवान् ब्रह्माके रूपमें प्रसिद्ध है और ये भगवान् ब्रह्मा ब्रह्ममय एवं अमल हैं। जो मुझे ही महायोगेश्वरोंका भी ईश्वर समझता है, वह निर्विकल्प (समाधि)-योगसे युक्त होता है, इसमें संदेह नहीं। परमानन्दका आश्रयण करनेवाला वही मैं प्रेरित करनेवाला देवता हूँ। मैं योगी निरन्तर नृत्य करता (प्राणिमात्रके हृदयमें सदा विद्यमान) रहता हूँ, जो ऐसा जानता है वह वेदज्ञ है यह अत्यन्त गुह्य ज्ञान सभी वेदोंमें प्रतिष्ठित है। इसे प्रसन्नचित्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्रीको प्रदान करना चाहिये॥ ३१—३४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकृष्णपुराणसंहिताके उपविभागमें (ईश्वरगीताका) चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥ ४॥


* इसका आशय यह है कि महेश्वर प्रेरक होते हुए भी प्रेरणाकी आसक्तिसे सर्वथा रहित हैं। अहैतुकी कृपावश ही प्रेरक बनते हैं।

२७०* कूर्मपुराण *

पाँचवाँ अध्याय

ऋषियोंको दिव्य नृत्य करते हुए भगवान् शंकरका आकाशमें दर्शन, मुनियोंद्वारा महेश्वरकी भावपूर्ण स्तुति करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एतावदुक्त्वा भगवान् योगिनां परमेश्वरः।<br>ननर्त परमं भावमैश्वरं सम्प्रदर्शयन्॥ १॥<br>तं ते ददृशुरीशानं तेजसां परमं निधिम्।<br>नृत्यमानं महादेवं विष्णुना गगनेऽमले॥ २॥<br>यं विदुर्योगतत्त्वज्ञा योगिनो यतमानसाः।<br>तमीशं सर्वभूतानामाकाशे ददृशुः किल॥ ३॥<br>यस्य मायामयं सर्वं येनेदं प्रेर्यते जगत्।<br>नृत्यमानः स्वयं विप्रैर्विश्वेशः खलु दृश्यते॥ ४॥<br>यत्पादपङ्कजं स्मृत्वा पुरुषोऽज्ञानजं भयम्।<br>जहाति नृत्यमानं तं भूतेशं ददृशुः किल॥ ५॥इतना कहकर योगियोंके परमेश्वर भगवान् (शिव) परम ऐश्वर्यमय भाव प्रदर्शित करते हुए नृत्य करने लगे। उन मुनियोंने परम तेजोनिधि ईशान महादेवको विष्णुके साथ नृत्य करते हुए स्वच्छ आकाशमें देखा। योगके तत्त्वको जाननेवाले संयतचित्त योगी ही जिन्हें जान पाते हैं, उन सभी प्राणियोंके ईशको आकाशमें मुनियोंने देखा। यह (सम्पूर्ण जगत्) जिनकी मायासे निर्मित है और जिनके द्वारा यह जगत् प्रेरित होता है, उन साक्षात् विश्वेशको विप्रोंने नृत्य करते हुए देखा। जिनके चरण-कमलका स्मरण करके पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न भयसे छुटकारा पा लेता है, उन्हीं भूतेशको मुनियोंने नृत्य करते हुए देखा॥ १-५॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः शान्ता भक्तिसमन्विताः।<br>ज्योतिर्मयं प्रपश्यन्ति स योगी दृश्यते किल॥ ६॥<br>योऽज्ञानान्मोचयेत् क्षिप्रं प्रसन्नो भक्तवत्सलः।<br>तमेव मोचकं रुद्रमाकाशे ददृशुः परम्॥ ७॥<br>सहस्रशिरसं देवं सहस्रचरणाकृतिम्।<br>सहस्रबाहुं जटिलं चन्द्रार्धकृतशेखरम्॥ ८॥<br>वसानं चर्म वैयाघ्रं शूलासक्तमहाकरम्।<br>दण्डपाणिं त्रयीनेत्रं सूर्यसोमाग्निलोचनम्॥ ९॥<br>ब्रह्माण्डं तेजसा स्वेन सर्वमावृत्य च स्थितम्।<br>दंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं सूर्यकोटिसमप्रभम्॥ १०॥<br>अण्डस्थं चाण्डबाह्यस्थं बाह्यमभ्यन्तरं परम्।<br>सृजन्तमनलज्वालं दहन्तमखिलं जगत्।<br>नृत्यन्तं ददृशुर्देवं विश्वकर्माणमीश्वरम्॥ ११॥निद्रारहित, श्वासजयी, शान्त और भक्तिपरायण लोग जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, (विप्रजनोंको) वे ही योगी दिखलायी पड़े। जो भक्तवत्सल (देव) प्रसन्न होनेपर शीघ्र ही अज्ञानसे मुक्त कर देते हैं, उन्हीं मुक्त करनेवाले परम रुद्रको (उन्होंने) आकाशमें देखा। (ब्राह्मणोंने) हजारों सिरवाले, हजारों चरणोंकी आकृतिसे युक्त, हजारों बाहुवाले, जटायुक्त, अर्धचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले, व्याघ्रके चर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, महान् भुजामें त्रिशूल धारण करनेवाले, हाथमें दण्ड धारण किये, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले, सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप नेत्रधारी, अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको आवृतकर स्थित हुए, भयंकर दाढ़ोंवाले, दुर्धर्ष, करोड़ों सूर्योंके समान आभावाले, अण्डके अंदर स्थित और अण्डके बाहर स्थित, परम (सर्वोत्कृष्ट), बाहर-भीतर सर्वत्र व्यास, अग्निज्वाला उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्को जलानेवाले विश्वकर्मा (समस्त कर्मोंके अधिष्ठाता) देवको नृत्य करते हुए देखा॥ ६-११॥
महादेवं महायोगं देवानापि दैवतम्।<br>पशूनां पतीमीशानं ज्योतिषां ज्योतिरव्ययम्॥ १२॥<br>पिनाकिनं विशालाक्षं भेषजं भवरोगिणाम्।<br>कालात्मानं कालकालं देवदेवं महेश्वरम्॥ १३॥ब्रह्मवादी मुनियोंने महादेव, महायोगस्वरूप, देवोंके भी देव, पशुपति ईशान, ज्योतियोंके भी अविनाश्र्वर ज्योतिःस्वरूप, पिनाकी, विशालाक्ष, भव-रोगियोंके औषध, कालात्मा, कालके भी काल, देवाधिदेव, महेश्वर,
* अध्याय ५ *२७१

| उमापतिं विरूपाक्षं योगानन्दमयं परम्।<br>ज्ञानवैराग्यनिलयं ज्ञानयोगं सनातनम्॥ १४॥<br>शाश्वतैश्वर्यविभवं धर्माधारं दुरासदम्।<br>महेन्द्रोपेन्द्रनमितं महर्षिगणवन्दितम्॥ १५॥<br>आधारं सर्वशक्तीनां महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>योगिनां परमं ब्रह्म योगिनां योगवन्दितम्।<br>योगिनां हृदि तिष्ठन्तं योगमायासमावृतम्॥ १६॥<br>क्षणेन जगतो योनिं नारायणमनामयम्।<br>ईश्वरेणैकतापन्नमपश्यन् ब्रह्मवादिनः॥ १७॥<br>दृष्ट्वा तदैश्वरं रूपं रुद्रनारायणात्मकम्।<br>कृतार्थं मेनिरे सन्तः स्वात्मानं ब्रह्मवादिनः॥ १८॥<br>सनत्कुमारः सनको भृगुश्च<br>सनातनश्चैव सनन्दनश्च।<br>रुद्रोऽङ्गिरा वामदेवोऽथ शुक्नो<br>महर्षिरत्रिः कपिलो मरीचिः॥ १९॥<br>दृष्ट्वाथ रुद्रं जगदीशितारं<br>तं पद्मनाभाश्रितवामभागम्।<br>ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना<br>बद्ध्वाञ्जलिं स्वेषु शिरःसु भूयः॥ २०॥<br>ओङ्कारमुच्चार्य विलोक्य देव-<br>मन्तःशरीरे निहितं गुहायाम्।<br>समस्तुवन् ब्रह्ममयैर्वचोभि-<br>रानन्दपूर्णायतमानसास्ते ॥ २१॥ | उमापति, विरूपाक्ष, परम योगानन्दमय, ज्ञान-वैराग्यके<br>निधान, सनातन ज्ञानयोग, शाश्वत ऐश्वर्य एवं विभवरूप,<br>धर्मके आधार, दुरासद (दुष्प्राप्य), महेन्द्र तथा उपेन्द्र<br>(विष्णु)-द्वारा नमस्कृत, महर्षिगणोंद्वारा वन्दित, सभी<br>शक्तियोंके आधार, महायोगेश्वरोंके भी ईश्वर, योगियोंके<br>परम ब्रह्म, योगियोंके योगद्वारा वन्दित, योगियोंके हृदयमें<br>स्थित, योगमायासे समावृत, जगत्के योनिरूप तथा<br>अनामय नारायणको क्षणमात्रमें ईश्वर अर्थात् शंकरके साथ<br>एकाकार होते हुए देखा॥ १२—१७॥<br>रुद्रके उस ऐश्वर्यमय नारायणात्मक रूपको देखकर<br>ब्रह्मवादी संतोंने अपने-आपको कृतार्थ माना। सनत्कुमार,<br>सनक, भृगु, सनातन, सनन्दन, रुद्र, अंगिरा, वामदेव,<br>शुक्र, महर्षि अत्रि, कपिल तथा मरीचि—इन ऋषियोंने<br>पद्मनाभ विष्णुको वामभागमें विराजित किये हुए उन<br>जगत्के नियामक रुद्रका दर्शन किया और हृदयमें<br>स्थित उनका ध्यान करके सिरसे विनयपूर्वक प्रणामकर<br>पुनः अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रणाम<br>किया॥ १८–२०॥<br>ओंकारका उच्चारण करनेके उपरान्त अपने शरीरके<br>भीतर (हृदयरूपी) गुहामें निहित उन देवका दर्शन<br>करके आनन्दसे परिपूर्ण विस्तृत आत्मावाले वे (मुनिगण)<br>वैदिक मन्त्रोंके द्वारा (उन देवकी) स्तुति करने लगे॥ २१॥ | | <div align="center">मुनय ऊचुः</div>त्वामेकमीशं पुरुषं पुराणं<br>प्राणेश्वरं रुद्रमनन्तयोगम्।<br>नमाम सर्वे हृदि संनिविष्टं<br>प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम्॥ २२॥<br>त्वां पश्यन्ति मुनयो ब्रह्मयोनिं<br>दान्ताः शान्ता विमलं रुक्मवर्णम्।<br>ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे शरीरे<br>कविं परेभ्यः परमं तत्परं च॥ २३॥<br>त्वत्तः प्रसूता जगतः प्रसूतिः<br>सर्वात्मभूस्त्वं परमाणुभूतः।<br>अणोरणीयान् महतो महीयां-<br>स्त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः॥ २४॥ | **मुनियोंने कहा—**आप एकमात्र ईश्वर, पुराणपुरुष,<br>प्राणेश्वर, अनन्त योगरूप, हृदयमें संनिविष्ट, प्रचेता,<br>पवित्र एवं ब्रह्ममय रुद्रको हम सभी प्रणाम करते हैं।<br>इन्द्रियोंका दमन करनेवाले तथा शान्त मुनिगण ध्यानके<br>द्वारा अपने ही शरीरमें अचल, निर्मल, स्वर्णके समान<br>वर्णवाले, ब्रह्मयोनि, उत्कृष्टसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट<br>(प्राणिमात्रके हृदयमें विद्यमान) आप कविका दर्शन<br>करते हैं। संसारकी सृष्टि आपसे ही हुई है। आप<br>सभीके आत्मरूप और परम अणुरूप हैं। महापुरुष<br>आपको ही सब कुछ और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा<br>महान्‌से भी महान् कहते हैं॥ २२-२४॥ |

२७२ * कूर्मपुराण *


हिरण्यगर्भो जगदन्तरात्मा
त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः।
संजायमानो भवता विसृष्टो
यथाविधानं सकलं ससर्ज॥ २५॥

त्वत्तो वेदाः सकलाः सम्प्रसूता-
स्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभन्ते।
पश्यामस्त्वां जगतो हेतुभूतं
नृत्यन्तं स्वे हृदये संनिविष्टम्॥ २६॥

त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रं
मायावी त्वं जगतामेकनाथः।
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्ना
योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम्॥ २७॥

पश्यामस्त्वां परमाकाशमध्ये
नृत्यन्तं ते महिमानं स्मरामः।
सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं
ब्रह्मानन्दमनुभूयानुभूय ॥ २८॥

जगत्के अन्तरात्मा-स्वरूप हिरण्यगर्भ पुराणपुरुष आपसे उत्पन्न हुए हैं। आपद्वारा उत्पन्न किये गये उस (पुराणपुरुष)-ने उत्पन्न होते ही यथाविधि सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि की। आपसे ही सभी वेद उत्पन्न हुए हैं और अन्तमें आपमें ही वे स्थिति पाते हैं। हम अपने हृदयमें स्थित जगत्के कारणरूप आपको नृत्य करते हुए देख रहे हैं। आपके द्वारा ही इस ब्रह्मचक्रको चलाया जाता है, आप मायावी और जगत्के एकमात्र स्वामी हैं। हम दिव्य नृत्य करनेवाले आप योगात्मा चित्पतिकी शरणमें आये हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं। परम आकाशके मध्यमें नृत्य कर रहे आपका हम दर्शन करते हैं और आपकी महिमाका स्मरण करते हैं। अनेक रूपोंमें स्थित सर्वात्मा ब्रह्मानन्दका हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं॥ २५-२८॥


ॐकारस्ते वाचको मुक्तिबीजं
त्वमक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम्।
तत्त्वां सत्यं प्रवदन्तीह सन्तः
स्वयम्प्रभं भवतो यत्प्रकाशम्॥ २९॥

स्तुवन्ति त्वां सततं सर्ववेदा
नमन्ति त्वामृषयः क्षीणदोषाः।
शान्तात्मानः सत्यसंधा वरिष्ठं
विशन्ति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः॥ ३०॥

आपका वाचक ओङ्कार मुक्तिका बीज है, आप अक्षर तथा प्रकृतिमें गूढरूपसे स्थित हैं। इसीलिये संतजन आपको सत्यस्वरूप और आपके प्रकाशको स्वयं प्रकाशित बताते हैं। सभी वेद सतत आपकी स्तुति करते हैं। दोषरहित ऋषिगण आपको नमस्कार करते हैं तथा शान्त-चित्त, सत्यसंध ब्रह्मनिष्ठ यतिजन आप सर्वश्रेष्ठमें प्रवेश करते हैं॥ २९-३०॥


एको वेदो बहुशाखो ह्यनन्त-
स्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम्।
वेद्यं त्वां शरणं ये प्रपन्ना-
स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३१॥

भवानीशोऽनादिमांस्तेजोराशि-
र्ब्रह्मा विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः।
स्वात्मानन्दमनुभूयाधिशेते
स्वयं ज्योतिरचलो नित्यमुक्तः॥ ३२॥

बहुत शाखाओंवाला एक अनन्त वेद आपके अद्वितीय एवं एकरूपका बोध कराता है। जो लोग जानने योग्य आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य किसीको नहीं। आप ईश, अनादि, तेजोराशि, ब्रह्मा, विश्वरूप, परमेष्ठी और वरिष्ठ हैं। नित्य मुक्त और स्वयं ज्योतिरूप अचल (योगी) स्वात्मानन्दका अनुभव कर (आपमें) प्रविष्ट होते हैं॥ ३१-३२॥


एको रुद्रस्त्वं करोषीह विश्वं
त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः।
त्वामेवान्ते निलयं विन्दतीदं
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्नाः॥ ३३॥

आप अद्वितीय रुद्र ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वरूप आप सबका पालन करते हैं और यह (विश्व) अन्तमें आपमें ही विलीन हो जाता है। हम आपको नमस्कार करते हैं और आपके शरणागत हैं॥ ३३॥

* अध्याय ५ *२७३
त्वामेकमाहुः कविमेकरुद्रं<br>  प्राणं बृहन्तं हरिमग्निमीशम्।<br>इन्द्रं मृत्युमनिलं चेकितानं<br>  धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ ३४ ॥<br>त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं<br>  त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।<br>त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता<br>  सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ ३५ ॥<br>त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं<br>  त्वमेव रुद्रो भगवानधीशः।<br>त्वं विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा<br>  सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ ३६ ॥आपको अद्वितीय, कवि, एक रुद्र, प्राण, बृहत्, हरि, अग्नि, ईश, इन्द्र, मृत्यु, अनिल, चेकितान, धाता, आदित्य, और अनेकरूप कहा जाता है। आप अविनाशी और परम जानने योग्य हैं। आप ही इस विश्वके परम आश्रय हैं। आप अव्यय, शाश्वत धर्मरक्षक, सनातन और पुरुषोत्तम हैं। आप ही विष्णु और आप ही चतुर्मुख ब्रह्मा हैं। आप ही प्रधान स्वामी भगवान् रुद्र हैं। आप विश्वकी नाभि, प्रकृति, प्रतिष्ठा, सर्वेश्वर और परम ईश्वर हैं॥ ३४–३६॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>  मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>चिन्मात्रमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>  खं ब्रह्म शून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ ३७ ॥<br>यदन्तरा सर्वमिदं विभाति<br>  यदव्ययं निर्मलमेकरूपम्।<br>किमप्यचिन्त्यं तव रूपमेतत्<br>  तदन्तरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ ३८ ॥आपको अद्वितीय, पुराणपुरुष, आदित्यके समान वर्णवाला, तमोगुणसे अतीत, चिन्मात्र, अव्यक्त, अचिन्त्यरूप, आकाश, ब्रह्म, शून्य, प्रकृति और निर्गुण कहते हैं। जिसके भीतर यह सम्पूर्ण (जगत्) प्रकाशित होता है तथा जो विकाररहित निर्मल और अद्वितीय रूप है, वह आपका रूप अचिन्त्य है और उसके भीतर समस्त तत्त्व प्रतीत होते हैं॥ ३७-३८॥
योगेश्वरं रुद्रमनन्तशक्तिं<br>  परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम्।<br>नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां<br>  प्रसीद भूताधिपते महेश ॥ ३९ ॥<br>त्वत्पादपद्मस्मरणादशेष-<br>  संसारबीजं विलयं प्रयाति।<br>मनो नियम्य प्रणिधाय कायं<br>  प्रसादयामो वयमेकमीशम् ॥ ४० ॥<br>नमो भवायास्तु भवोद्भवाय<br>  कालाय सर्वाय हराय तुभ्यम्।<br>नमोऽस्तु रुद्राय कपर्दिने ते<br>  नमोऽग्नये देव नमः शिवाय ॥ ४१ ॥<br><br>ततः स भगवान् देवः कपर्दी वृषवाहनः।<br>संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवद् भवः ॥ ४२ ॥हम सभी योगेश्वर, अनन्तशक्ति रुद्र, उत्कृष्ट आश्रयस्वरूप पवित्र ब्रह्ममूर्ति (आप)-को नमस्कार करते हैं। भूतोंके अधिपति महेश! प्रसन्न होइये, हम आपकी शरणमें हैं। आपके चरणकमलका स्मरण करनेसे सम्पूर्ण संसारका बीज (अर्थात् कर्म) नष्ट हो जाता है। मनका नियमन कर, शरीरको संयमित कर हम सभी अद्वितीय ईश्वर आपको प्रसन्न करते हैं। भव, भवोद्भव, काल, सर्व तथा हर आपको नमस्कार है। जटाधारी आप रुद्रको नमस्कार है। अग्निरूप देव शिव! आपको नमस्कार है, इस प्रकार स्तुति करनेपर उन भगवान् कपर्दी वृषवाहन देव भवने (अपने उस) उत्कृष्ट (विराट्)-रूपको समेट लिया और वे अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गये॥ ३९–४२॥
२७४* कूर्मपुराण *
ते भवं भूतभव्येशं पूर्ववत् समवस्थितम्।<br>दृष्ट्वा नारायणं देवं विस्मिता वाक्यमब्रुवन्॥ ४३ ॥मुनियोंने पहलेके समान स्थित भूतभव्येश भव और नारायणदेवको देखकर आश्चर्यचकित होकर यह वाक्य कहा— ॥ ४३ ॥
भगवन् भूतभव्येश गोवृषाङ्कितशासन।<br>दृष्ट्वा ते परमं रूपं निर्वृताः स्म सनातन॥ ४४ ॥भगवन्! भूतभव्येश! गोवृषाङ्कितशासन! सनातन! आपके परम रूपका दर्शन कर हमलोग संतुष्टचित्त हो गये हैं। आपकी कृपासे हम सभीको निर्मल, परात्पर, परमेश्वरस्वरूप आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति उत्पन्न हुई है। शंकर! इस समय हमलोग आप परमेष्ठीके उस माहात्म्यको एवं जो नित्य यथार्थस्वरूप है (उसे) पुनः सुनना चाहते हैं॥ ४४–४६ ॥
भवत्प्रसादादमले परस्मिन् परमेश्वरे।<br>अस्माकं जायते भक्तिस्त्वय्येवाव्यभिचारिणी॥ ४५ ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामो माहात्म्यं तव शंकर।<br>भूयोऽपि तव यन्नित्यं याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥ ४६ ॥
स तेषां वाक्यमाकर्ण्य योगिनां योगसिद्धिदः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा समालोक्य च माधवम्॥ ४७ ॥योगसिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उन्होंने (महेश्वरने) उन योगियोंका वचन सुनकर तथा विष्णुकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें कहा— ॥ ४७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५॥


छठा अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना

ईश्वर उवाच<br>शृणुध्वमृषयः सर्वे यथावत् परमेष्ठिनः।<br>वक्ष्यामीशस्य माहात्म्यं यत्तद्वेदविदो विदुः॥ १॥ईश्वरने कहा—हे ऋषिगणो! आप सभी सुनें। मैं परमेष्ठी ईशके उस माहात्म्यका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ, जिसे वेदज्ञ लोग जानते हैं॥ १॥
सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः॥ २॥मैं सनातन सर्वात्मा सभी लोकोंका एकमात्र निर्माण करनेवाला, सभी लोकोंका एक अद्वितीय रक्षक और सभी लोकोंका एकमात्र संहार करनेवाला हूँ। सभी वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता मैं ही हूँ। मध्य तथा अन्त सब कुछ मुझमें स्थित है, किंतु मैं सर्वत्र स्थित नहीं हूँ अर्थात् मेरी कोई सीमा नहीं है॥ २-३॥
सर्वेषामेव वस्तूनामन्तर्यामी पिता ह्यहम्।<br>मध्ये चान्तः स्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः॥ ३॥
भवद्द्भिरद्भुतं दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम्।<br>ममैषा ह्युपमा विप्रा मायया दर्शिता मया॥ ४॥विप्रो! आप लोगोंने मेरे जिस अद्भुत रूपको देखा है, वह केवल मेरी उपमा (प्रतीक) है, जिसे मैंने (अपनी) मायाद्वारा दिखलाया। मैं सभी पदार्थोंके भीतर स्थित (व्यास) रहते हुए सम्पूर्ण जगत्‌को प्रेरित करता हूँ। यह मेरी क्रियाशक्ति है। यह विश्व जिसके द्वारा चेष्टा करता है और जिसके स्वभावका अनुसरण करता है, कालरूप वही मैं सम्पूर्ण कलात्मक (अपने अंशरूप) जगत्‌को प्रेरित करता हूँ॥ ४–६॥
सर्वेषामेव भावानामान्तरा समवस्थितः।<br>प्रेरयामि जगत् कृत्स्नं क्रियाशक्तिरियं मम॥ ५॥
ययेदं चेष्टते विश्वं तत्स्वभावानुवर्ति च।<br>सोऽहं कालो जगत् कृत्स्नं प्रेरयामि कलात्मकम्॥ ६॥