भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 280
२७०* कूर्मपुराण *

पाँचवाँ अध्याय

ऋषियोंको दिव्य नृत्य करते हुए भगवान् शंकरका आकाशमें दर्शन, मुनियोंद्वारा महेश्वरकी भावपूर्ण स्तुति करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एतावदुक्त्वा भगवान् योगिनां परमेश्वरः।<br>ननर्त परमं भावमैश्वरं सम्प्रदर्शयन्॥ १॥<br>तं ते ददृशुरीशानं तेजसां परमं निधिम्।<br>नृत्यमानं महादेवं विष्णुना गगनेऽमले॥ २॥<br>यं विदुर्योगतत्त्वज्ञा योगिनो यतमानसाः।<br>तमीशं सर्वभूतानामाकाशे ददृशुः किल॥ ३॥<br>यस्य मायामयं सर्वं येनेदं प्रेर्यते जगत्।<br>नृत्यमानः स्वयं विप्रैर्विश्वेशः खलु दृश्यते॥ ४॥<br>यत्पादपङ्कजं स्मृत्वा पुरुषोऽज्ञानजं भयम्।<br>जहाति नृत्यमानं तं भूतेशं ददृशुः किल॥ ५॥इतना कहकर योगियोंके परमेश्वर भगवान् (शिव) परम ऐश्वर्यमय भाव प्रदर्शित करते हुए नृत्य करने लगे। उन मुनियोंने परम तेजोनिधि ईशान महादेवको विष्णुके साथ नृत्य करते हुए स्वच्छ आकाशमें देखा। योगके तत्त्वको जाननेवाले संयतचित्त योगी ही जिन्हें जान पाते हैं, उन सभी प्राणियोंके ईशको आकाशमें मुनियोंने देखा। यह (सम्पूर्ण जगत्) जिनकी मायासे निर्मित है और जिनके द्वारा यह जगत् प्रेरित होता है, उन साक्षात् विश्वेशको विप्रोंने नृत्य करते हुए देखा। जिनके चरण-कमलका स्मरण करके पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न भयसे छुटकारा पा लेता है, उन्हीं भूतेशको मुनियोंने नृत्य करते हुए देखा॥ १-५॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः शान्ता भक्तिसमन्विताः।<br>ज्योतिर्मयं प्रपश्यन्ति स योगी दृश्यते किल॥ ६॥<br>योऽज्ञानान्मोचयेत् क्षिप्रं प्रसन्नो भक्तवत्सलः।<br>तमेव मोचकं रुद्रमाकाशे ददृशुः परम्॥ ७॥<br>सहस्रशिरसं देवं सहस्रचरणाकृतिम्।<br>सहस्रबाहुं जटिलं चन्द्रार्धकृतशेखरम्॥ ८॥<br>वसानं चर्म वैयाघ्रं शूलासक्तमहाकरम्।<br>दण्डपाणिं त्रयीनेत्रं सूर्यसोमाग्निलोचनम्॥ ९॥<br>ब्रह्माण्डं तेजसा स्वेन सर्वमावृत्य च स्थितम्।<br>दंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं सूर्यकोटिसमप्रभम्॥ १०॥<br>अण्डस्थं चाण्डबाह्यस्थं बाह्यमभ्यन्तरं परम्।<br>सृजन्तमनलज्वालं दहन्तमखिलं जगत्।<br>नृत्यन्तं ददृशुर्देवं विश्वकर्माणमीश्वरम्॥ ११॥निद्रारहित, श्वासजयी, शान्त और भक्तिपरायण लोग जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, (विप्रजनोंको) वे ही योगी दिखलायी पड़े। जो भक्तवत्सल (देव) प्रसन्न होनेपर शीघ्र ही अज्ञानसे मुक्त कर देते हैं, उन्हीं मुक्त करनेवाले परम रुद्रको (उन्होंने) आकाशमें देखा। (ब्राह्मणोंने) हजारों सिरवाले, हजारों चरणोंकी आकृतिसे युक्त, हजारों बाहुवाले, जटायुक्त, अर्धचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले, व्याघ्रके चर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, महान् भुजामें त्रिशूल धारण करनेवाले, हाथमें दण्ड धारण किये, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले, सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप नेत्रधारी, अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको आवृतकर स्थित हुए, भयंकर दाढ़ोंवाले, दुर्धर्ष, करोड़ों सूर्योंके समान आभावाले, अण्डके अंदर स्थित और अण्डके बाहर स्थित, परम (सर्वोत्कृष्ट), बाहर-भीतर सर्वत्र व्यास, अग्निज्वाला उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्को जलानेवाले विश्वकर्मा (समस्त कर्मोंके अधिष्ठाता) देवको नृत्य करते हुए देखा॥ ६-११॥
महादेवं महायोगं देवानापि दैवतम्।<br>पशूनां पतीमीशानं ज्योतिषां ज्योतिरव्ययम्॥ १२॥<br>पिनाकिनं विशालाक्षं भेषजं भवरोगिणाम्।<br>कालात्मानं कालकालं देवदेवं महेश्वरम्॥ १३॥ब्रह्मवादी मुनियोंने महादेव, महायोगस्वरूप, देवोंके भी देव, पशुपति ईशान, ज्योतियोंके भी अविनाश्र्वर ज्योतिःस्वरूप, पिनाकी, विशालाक्ष, भव-रोगियोंके औषध, कालात्मा, कालके भी काल, देवाधिदेव, महेश्वर,