भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ५ *२७१

| उमापतिं विरूपाक्षं योगानन्दमयं परम्।<br>ज्ञानवैराग्यनिलयं ज्ञानयोगं सनातनम्॥ १४॥<br>शाश्वतैश्वर्यविभवं धर्माधारं दुरासदम्।<br>महेन्द्रोपेन्द्रनमितं महर्षिगणवन्दितम्॥ १५॥<br>आधारं सर्वशक्तीनां महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>योगिनां परमं ब्रह्म योगिनां योगवन्दितम्।<br>योगिनां हृदि तिष्ठन्तं योगमायासमावृतम्॥ १६॥<br>क्षणेन जगतो योनिं नारायणमनामयम्।<br>ईश्वरेणैकतापन्नमपश्यन् ब्रह्मवादिनः॥ १७॥<br>दृष्ट्वा तदैश्वरं रूपं रुद्रनारायणात्मकम्।<br>कृतार्थं मेनिरे सन्तः स्वात्मानं ब्रह्मवादिनः॥ १८॥<br>सनत्कुमारः सनको भृगुश्च<br>सनातनश्चैव सनन्दनश्च।<br>रुद्रोऽङ्गिरा वामदेवोऽथ शुक्नो<br>महर्षिरत्रिः कपिलो मरीचिः॥ १९॥<br>दृष्ट्वाथ रुद्रं जगदीशितारं<br>तं पद्मनाभाश्रितवामभागम्।<br>ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना<br>बद्ध्वाञ्जलिं स्वेषु शिरःसु भूयः॥ २०॥<br>ओङ्कारमुच्चार्य विलोक्य देव-<br>मन्तःशरीरे निहितं गुहायाम्।<br>समस्तुवन् ब्रह्ममयैर्वचोभि-<br>रानन्दपूर्णायतमानसास्ते ॥ २१॥ | उमापति, विरूपाक्ष, परम योगानन्दमय, ज्ञान-वैराग्यके<br>निधान, सनातन ज्ञानयोग, शाश्वत ऐश्वर्य एवं विभवरूप,<br>धर्मके आधार, दुरासद (दुष्प्राप्य), महेन्द्र तथा उपेन्द्र<br>(विष्णु)-द्वारा नमस्कृत, महर्षिगणोंद्वारा वन्दित, सभी<br>शक्तियोंके आधार, महायोगेश्वरोंके भी ईश्वर, योगियोंके<br>परम ब्रह्म, योगियोंके योगद्वारा वन्दित, योगियोंके हृदयमें<br>स्थित, योगमायासे समावृत, जगत्के योनिरूप तथा<br>अनामय नारायणको क्षणमात्रमें ईश्वर अर्थात् शंकरके साथ<br>एकाकार होते हुए देखा॥ १२—१७॥<br>रुद्रके उस ऐश्वर्यमय नारायणात्मक रूपको देखकर<br>ब्रह्मवादी संतोंने अपने-आपको कृतार्थ माना। सनत्कुमार,<br>सनक, भृगु, सनातन, सनन्दन, रुद्र, अंगिरा, वामदेव,<br>शुक्र, महर्षि अत्रि, कपिल तथा मरीचि—इन ऋषियोंने<br>पद्मनाभ विष्णुको वामभागमें विराजित किये हुए उन<br>जगत्के नियामक रुद्रका दर्शन किया और हृदयमें<br>स्थित उनका ध्यान करके सिरसे विनयपूर्वक प्रणामकर<br>पुनः अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रणाम<br>किया॥ १८–२०॥<br>ओंकारका उच्चारण करनेके उपरान्त अपने शरीरके<br>भीतर (हृदयरूपी) गुहामें निहित उन देवका दर्शन<br>करके आनन्दसे परिपूर्ण विस्तृत आत्मावाले वे (मुनिगण)<br>वैदिक मन्त्रोंके द्वारा (उन देवकी) स्तुति करने लगे॥ २१॥ | | <div align="center">मुनय ऊचुः</div>त्वामेकमीशं पुरुषं पुराणं<br>प्राणेश्वरं रुद्रमनन्तयोगम्।<br>नमाम सर्वे हृदि संनिविष्टं<br>प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम्॥ २२॥<br>त्वां पश्यन्ति मुनयो ब्रह्मयोनिं<br>दान्ताः शान्ता विमलं रुक्मवर्णम्।<br>ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे शरीरे<br>कविं परेभ्यः परमं तत्परं च॥ २३॥<br>त्वत्तः प्रसूता जगतः प्रसूतिः<br>सर्वात्मभूस्त्वं परमाणुभूतः।<br>अणोरणीयान् महतो महीयां-<br>स्त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः॥ २४॥ | **मुनियोंने कहा—**आप एकमात्र ईश्वर, पुराणपुरुष,<br>प्राणेश्वर, अनन्त योगरूप, हृदयमें संनिविष्ट, प्रचेता,<br>पवित्र एवं ब्रह्ममय रुद्रको हम सभी प्रणाम करते हैं।<br>इन्द्रियोंका दमन करनेवाले तथा शान्त मुनिगण ध्यानके<br>द्वारा अपने ही शरीरमें अचल, निर्मल, स्वर्णके समान<br>वर्णवाले, ब्रह्मयोनि, उत्कृष्टसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट<br>(प्राणिमात्रके हृदयमें विद्यमान) आप कविका दर्शन<br>करते हैं। संसारकी सृष्टि आपसे ही हुई है। आप<br>सभीके आत्मरूप और परम अणुरूप हैं। महापुरुष<br>आपको ही सब कुछ और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा<br>महान्‌से भी महान् कहते हैं॥ २२-२४॥ |