संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ * कूर्मपुराण *
हिरण्यगर्भो जगदन्तरात्मा
त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः।
संजायमानो भवता विसृष्टो
यथाविधानं सकलं ससर्ज॥ २५॥
त्वत्तो वेदाः सकलाः सम्प्रसूता-
स्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभन्ते।
पश्यामस्त्वां जगतो हेतुभूतं
नृत्यन्तं स्वे हृदये संनिविष्टम्॥ २६॥
त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रं
मायावी त्वं जगतामेकनाथः।
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्ना
योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम्॥ २७॥
पश्यामस्त्वां परमाकाशमध्ये
नृत्यन्तं ते महिमानं स्मरामः।
सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं
ब्रह्मानन्दमनुभूयानुभूय ॥ २८॥
जगत्के अन्तरात्मा-स्वरूप हिरण्यगर्भ पुराणपुरुष आपसे उत्पन्न हुए हैं। आपद्वारा उत्पन्न किये गये उस (पुराणपुरुष)-ने उत्पन्न होते ही यथाविधि सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि की। आपसे ही सभी वेद उत्पन्न हुए हैं और अन्तमें आपमें ही वे स्थिति पाते हैं। हम अपने हृदयमें स्थित जगत्के कारणरूप आपको नृत्य करते हुए देख रहे हैं। आपके द्वारा ही इस ब्रह्मचक्रको चलाया जाता है, आप मायावी और जगत्के एकमात्र स्वामी हैं। हम दिव्य नृत्य करनेवाले आप योगात्मा चित्पतिकी शरणमें आये हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं। परम आकाशके मध्यमें नृत्य कर रहे आपका हम दर्शन करते हैं और आपकी महिमाका स्मरण करते हैं। अनेक रूपोंमें स्थित सर्वात्मा ब्रह्मानन्दका हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं॥ २५-२८॥
ॐकारस्ते वाचको मुक्तिबीजं
त्वमक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम्।
तत्त्वां सत्यं प्रवदन्तीह सन्तः
स्वयम्प्रभं भवतो यत्प्रकाशम्॥ २९॥
स्तुवन्ति त्वां सततं सर्ववेदा
नमन्ति त्वामृषयः क्षीणदोषाः।
शान्तात्मानः सत्यसंधा वरिष्ठं
विशन्ति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः॥ ३०॥
आपका वाचक ओङ्कार मुक्तिका बीज है, आप अक्षर तथा प्रकृतिमें गूढरूपसे स्थित हैं। इसीलिये संतजन आपको सत्यस्वरूप और आपके प्रकाशको स्वयं प्रकाशित बताते हैं। सभी वेद सतत आपकी स्तुति करते हैं। दोषरहित ऋषिगण आपको नमस्कार करते हैं तथा शान्त-चित्त, सत्यसंध ब्रह्मनिष्ठ यतिजन आप सर्वश्रेष्ठमें प्रवेश करते हैं॥ २९-३०॥
एको वेदो बहुशाखो ह्यनन्त-
स्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम्।
वेद्यं त्वां शरणं ये प्रपन्ना-
स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३१॥
भवानीशोऽनादिमांस्तेजोराशि-
र्ब्रह्मा विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः।
स्वात्मानन्दमनुभूयाधिशेते
स्वयं ज्योतिरचलो नित्यमुक्तः॥ ३२॥
बहुत शाखाओंवाला एक अनन्त वेद आपके अद्वितीय एवं एकरूपका बोध कराता है। जो लोग जानने योग्य आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य किसीको नहीं। आप ईश, अनादि, तेजोराशि, ब्रह्मा, विश्वरूप, परमेष्ठी और वरिष्ठ हैं। नित्य मुक्त और स्वयं ज्योतिरूप अचल (योगी) स्वात्मानन्दका अनुभव कर (आपमें) प्रविष्ट होते हैं॥ ३१-३२॥
एको रुद्रस्त्वं करोषीह विश्वं
त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः।
त्वामेवान्ते निलयं विन्दतीदं
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्नाः॥ ३३॥
आप अद्वितीय रुद्र ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वरूप आप सबका पालन करते हैं और यह (विश्व) अन्तमें आपमें ही विलीन हो जाता है। हम आपको नमस्कार करते हैं और आपके शरणागत हैं॥ ३३॥