भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ५ *२७३
त्वामेकमाहुः कविमेकरुद्रं<br>  प्राणं बृहन्तं हरिमग्निमीशम्।<br>इन्द्रं मृत्युमनिलं चेकितानं<br>  धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ ३४ ॥<br>त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं<br>  त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।<br>त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता<br>  सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ ३५ ॥<br>त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं<br>  त्वमेव रुद्रो भगवानधीशः।<br>त्वं विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा<br>  सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ ३६ ॥आपको अद्वितीय, कवि, एक रुद्र, प्राण, बृहत्, हरि, अग्नि, ईश, इन्द्र, मृत्यु, अनिल, चेकितान, धाता, आदित्य, और अनेकरूप कहा जाता है। आप अविनाशी और परम जानने योग्य हैं। आप ही इस विश्वके परम आश्रय हैं। आप अव्यय, शाश्वत धर्मरक्षक, सनातन और पुरुषोत्तम हैं। आप ही विष्णु और आप ही चतुर्मुख ब्रह्मा हैं। आप ही प्रधान स्वामी भगवान् रुद्र हैं। आप विश्वकी नाभि, प्रकृति, प्रतिष्ठा, सर्वेश्वर और परम ईश्वर हैं॥ ३४–३६॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>  मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>चिन्मात्रमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>  खं ब्रह्म शून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ ३७ ॥<br>यदन्तरा सर्वमिदं विभाति<br>  यदव्ययं निर्मलमेकरूपम्।<br>किमप्यचिन्त्यं तव रूपमेतत्<br>  तदन्तरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ ३८ ॥आपको अद्वितीय, पुराणपुरुष, आदित्यके समान वर्णवाला, तमोगुणसे अतीत, चिन्मात्र, अव्यक्त, अचिन्त्यरूप, आकाश, ब्रह्म, शून्य, प्रकृति और निर्गुण कहते हैं। जिसके भीतर यह सम्पूर्ण (जगत्) प्रकाशित होता है तथा जो विकाररहित निर्मल और अद्वितीय रूप है, वह आपका रूप अचिन्त्य है और उसके भीतर समस्त तत्त्व प्रतीत होते हैं॥ ३७-३८॥
योगेश्वरं रुद्रमनन्तशक्तिं<br>  परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम्।<br>नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां<br>  प्रसीद भूताधिपते महेश ॥ ३९ ॥<br>त्वत्पादपद्मस्मरणादशेष-<br>  संसारबीजं विलयं प्रयाति।<br>मनो नियम्य प्रणिधाय कायं<br>  प्रसादयामो वयमेकमीशम् ॥ ४० ॥<br>नमो भवायास्तु भवोद्भवाय<br>  कालाय सर्वाय हराय तुभ्यम्।<br>नमोऽस्तु रुद्राय कपर्दिने ते<br>  नमोऽग्नये देव नमः शिवाय ॥ ४१ ॥<br><br>ततः स भगवान् देवः कपर्दी वृषवाहनः।<br>संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवद् भवः ॥ ४२ ॥हम सभी योगेश्वर, अनन्तशक्ति रुद्र, उत्कृष्ट आश्रयस्वरूप पवित्र ब्रह्ममूर्ति (आप)-को नमस्कार करते हैं। भूतोंके अधिपति महेश! प्रसन्न होइये, हम आपकी शरणमें हैं। आपके चरणकमलका स्मरण करनेसे सम्पूर्ण संसारका बीज (अर्थात् कर्म) नष्ट हो जाता है। मनका नियमन कर, शरीरको संयमित कर हम सभी अद्वितीय ईश्वर आपको प्रसन्न करते हैं। भव, भवोद्भव, काल, सर्व तथा हर आपको नमस्कार है। जटाधारी आप रुद्रको नमस्कार है। अग्निरूप देव शिव! आपको नमस्कार है, इस प्रकार स्तुति करनेपर उन भगवान् कपर्दी वृषवाहन देव भवने (अपने उस) उत्कृष्ट (विराट्)-रूपको समेट लिया और वे अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गये॥ ३९–४२॥