संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २७४ | * कूर्मपुराण * |
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| ते भवं भूतभव्येशं पूर्ववत् समवस्थितम्।<br>दृष्ट्वा नारायणं देवं विस्मिता वाक्यमब्रुवन्॥ ४३ ॥ | मुनियोंने पहलेके समान स्थित भूतभव्येश भव और नारायणदेवको देखकर आश्चर्यचकित होकर यह वाक्य कहा— ॥ ४३ ॥ |
| भगवन् भूतभव्येश गोवृषाङ्कितशासन।<br>दृष्ट्वा ते परमं रूपं निर्वृताः स्म सनातन॥ ४४ ॥ | भगवन्! भूतभव्येश! गोवृषाङ्कितशासन! सनातन! आपके परम रूपका दर्शन कर हमलोग संतुष्टचित्त हो गये हैं। आपकी कृपासे हम सभीको निर्मल, परात्पर, परमेश्वरस्वरूप आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति उत्पन्न हुई है। शंकर! इस समय हमलोग आप परमेष्ठीके उस माहात्म्यको एवं जो नित्य यथार्थस्वरूप है (उसे) पुनः सुनना चाहते हैं॥ ४४–४६ ॥ |
| भवत्प्रसादादमले परस्मिन् परमेश्वरे।<br>अस्माकं जायते भक्तिस्त्वय्येवाव्यभिचारिणी॥ ४५ ॥ | |
| इदानीं श्रोतुमिच्छामो माहात्म्यं तव शंकर।<br>भूयोऽपि तव यन्नित्यं याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥ ४६ ॥ | |
| स तेषां वाक्यमाकर्ण्य योगिनां योगसिद्धिदः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा समालोक्य च माधवम्॥ ४७ ॥ | योगसिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उन्होंने (महेश्वरने) उन योगियोंका वचन सुनकर तथा विष्णुकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें कहा— ॥ ४७ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५॥
छठा अध्याय
ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना
| ईश्वर उवाच<br>शृणुध्वमृषयः सर्वे यथावत् परमेष्ठिनः।<br>वक्ष्यामीशस्य माहात्म्यं यत्तद्वेदविदो विदुः॥ १॥ | ईश्वरने कहा—हे ऋषिगणो! आप सभी सुनें। मैं परमेष्ठी ईशके उस माहात्म्यका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ, जिसे वेदज्ञ लोग जानते हैं॥ १॥ |
| सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः॥ २॥ | मैं सनातन सर्वात्मा सभी लोकोंका एकमात्र निर्माण करनेवाला, सभी लोकोंका एक अद्वितीय रक्षक और सभी लोकोंका एकमात्र संहार करनेवाला हूँ। सभी वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता मैं ही हूँ। मध्य तथा अन्त सब कुछ मुझमें स्थित है, किंतु मैं सर्वत्र स्थित नहीं हूँ अर्थात् मेरी कोई सीमा नहीं है॥ २-३॥ |
| सर्वेषामेव वस्तूनामन्तर्यामी पिता ह्यहम्।<br>मध्ये चान्तः स्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः॥ ३॥ | |
| भवद्द्भिरद्भुतं दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम्।<br>ममैषा ह्युपमा विप्रा मायया दर्शिता मया॥ ४॥ | विप्रो! आप लोगोंने मेरे जिस अद्भुत रूपको देखा है, वह केवल मेरी उपमा (प्रतीक) है, जिसे मैंने (अपनी) मायाद्वारा दिखलाया। मैं सभी पदार्थोंके भीतर स्थित (व्यास) रहते हुए सम्पूर्ण जगत्को प्रेरित करता हूँ। यह मेरी क्रियाशक्ति है। यह विश्व जिसके द्वारा चेष्टा करता है और जिसके स्वभावका अनुसरण करता है, कालरूप वही मैं सम्पूर्ण कलात्मक (अपने अंशरूप) जगत्को प्रेरित करता हूँ॥ ४–६॥ |
| सर्वेषामेव भावानामान्तरा समवस्थितः।<br>प्रेरयामि जगत् कृत्स्नं क्रियाशक्तिरियं मम॥ ५॥ | |
| ययेदं चेष्टते विश्वं तत्स्वभावानुवर्ति च।<br>सोऽहं कालो जगत् कृत्स्नं प्रेरयामि कलात्मकम्॥ ६॥ |