संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ६ * | २७५ ---|---
| एकांशेन जगत् कृत्स्नं करोमि मुनिपुंगवाः।<br>संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव तु॥ ७ ॥<br><br>आदिमध्यान्तनिर्मुक्तो मायातत्त्वप्रवर्तकः।<br>क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ॥ ८ ॥<br><br>ताभ्यां संजायते विश्वं संयुक्ताभ्यां परस्परम्।<br>महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृम्भते॥ ९ ॥<br><br>यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः।<br>हिरण्यगर्भो मार्तण्डः सोऽपि मद्देहसम्भवः॥ १० ॥<br><br>तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम्।<br>दत्तवानात्मजान् वेदान् कल्पादौ चतुरो द्विजाः॥ ११ ॥<br><br>स मन्नियोगतो देवो ब्रह्मा मद्भावभावितः।<br>दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम्॥ १२ ॥<br><br>स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित्।<br>भूत्वा चतुर्मुखः सर्गं सृजत्येवात्मसम्भवः॥ १३ ॥<br><br>योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः।<br>ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम्॥ १४ ॥<br><br>योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः।<br>मदाज्ञयासौ सततं संहरिष्यति मे तनुः॥ १५ ॥<br><br>हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।<br>पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः॥ १६ ॥<br><br>भुक्तमाहारजातं च पचते तदहर्निशम्।<br>वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियोगतः॥ १७ ॥<br><br>योऽपि सर्वाम्भसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः।<br>सोऽपि संजीवयेत् कृत्स्नमीशस्यैव नियोगतः॥ १८ ॥<br><br>योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवः प्रभञ्जनः।<br>मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि॥ १९ ॥<br><br>योऽपि संजीवनो नृणां देवानाममृताकरः।<br>सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते॥ २० ॥ | मुनिश्रेष्ठो! मैं एक अंशसे सम्पूर्ण संसारकी रचना करता हूँ और दूसरे रूप (अंश)-से संहार करता हूँ—इस प्रकारकी ये दोनों अवस्थाएँ मेरी ही हैं। आदि, मध्य और अन्तरहित माया-तत्त्वका प्रवर्तन करनेवाला मैं सृष्टिके आरम्भमें प्रधान तथा पुरुष—दोनोंको क्षुब्ध (प्रेरित) करता हूँ। उन दोनोंके परस्पर संयोगसे विश्व उत्पन्न होता है। महत्-तत्त्वादिके क्रमसे मेरा ही तेज विस्तारको प्राप्त होता है। जो सारे संसारके साक्षी और कालचक्रको चलानेवाले हिरण्यगर्भ मार्तण्ड (सूर्य) हैं, वे भी मेरे ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं॥ ७-१०॥<br><br>द्विजो! कल्पके आदिमें मैंने ही उन्हें अपना दिव्य, ऐश्वर्यमय सनातन ज्ञानयोग और अपनेसे उत्पन्न चारों वेद प्रदान किये। वे मेरे भावसे भावित देव ब्रह्मा मेरे आदेशसे मेरे उस दिव्य ऐश्वर्यको स्वयं सदा वहन करते हैं। सभी लोकोंका निर्माण करनेवाले और सब कुछ जाननेवाले आत्मसम्भव (मुझसे ही उत्पन्न) वे (ब्रह्मा) मेरे निर्देशसे चार मुखवाले होकर सृष्टिकी रचना करते हैं। जो लोकोंको उत्पन्न करनेवाले अव्यय अनन्त नारायण हैं और जगत्का परिपालन करते हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं॥ ११-१४॥<br><br>सभी प्राणियोंका संहार करनेवाले जो प्रभु कालात्मक रुद्र हैं, वे मेरी ही आज्ञासे निरन्तर संहार करते रहते हैं, वे भी मेरी मूर्ति हैं॥ १५॥<br><br>जो देवताओंको हव्य (हवनीय द्रव्य) पहुँचाते हैं और कव्य ग्रहण करनेवाले पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं तथा जो पाकमें (सब कुछ पचा लेनेमें) समर्थ हैं, वे अग्निदेव भी मेरी ही शक्तिसे प्रेरित होकर यह सब करते हैं। ईश्वर (शंकर)-के निर्देशसे ही भगवान् वैश्वानर अग्नि रात-दिन ग्रहण किये गये आहारको पचाते रहते हैं॥ १६-१७॥<br><br>सम्पूर्ण जलके मूल कारण जो देवश्रेष्ठ वरुण हैं, वे भी ईश्वरके ही निर्देशसे सम्पूर्ण विश्वको जीवन (जल) प्रदान करते हैं, जो प्राणियोंके भीतर और बाहर वर्तमान रहनेवाले वायुदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं। मनुष्योंको जीवित रखनेवाले जो देवताओंके अमृतके निधान सोमदेव (चन्द्रमा) हैं, वे भी मेरे ही निर्देशसे प्रेरित होकर कार्य करते हैं॥ १८—२०॥ |