भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७६ * कूर्मपुराण *


यः स्वभासा जगत् कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा।
सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयम्भुवः॥ २१॥

योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः।
यज्वनां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २२॥

यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह।
यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगतः॥ २३॥

योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां सम्प्रदायकः।
सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा॥ २४॥

यः सर्वरक्षसां नाथस्तामसानां फलप्रदः।
मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा॥ २५॥

वेतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः।
ईशानः किल भक्तानां सोऽपि तिष्ठन्ममाज्ञया॥ २६॥

यो वामदेवोऽङ्गिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः।
रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २७॥

यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः।
विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात् किल॥ २८॥

योऽपि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः।
स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयम्भूविधिचोदितः॥ २९॥

ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः।
सृजन्ति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः॥ ३०॥

या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम्।
पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात्॥ ३१॥

वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती।
सापीश्वरनियोगेन चोदिता सम्प्रवर्तते॥ ३२॥

याशेषपुरुषान् घोरान्निरकात् तारयिष्यति।
सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी॥ ३३॥

पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी।
यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्वचनानुगा॥ ३४॥

योऽनन्तमहिमानन्तः शेषोऽशेषामरप्रभुः।
दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः॥ ३५॥


जो अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण संसारको सदा प्रकाशित करते हैं, वे सूर्यदेव भी स्वयम्भू (ईश्वर)-की आज्ञासे वृष्टिका विस्तार करते हैं। जो सारे संसारके शासक, सभी देवताओंके ईश्वर तथा यज्ञ करनेवालोंको फल प्रदान करनेवाले इन्द्रदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्रवृत्त होते हैं। जो दुष्टोंके शासक हैं और नियमके अनुसार व्यवहार करनेवाले विवस्वान्‌के पुत्र यमदेव हैं, वे भी देवाधिदेव (शंकर)-के निर्देशसे व्यवहार करते हैं। जो सभी प्रकारके सम्पत्तियोंके स्वामी और धन प्रदान करनेवाले कुबेर हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे ही सदा प्रवृत्त होते हैं। जो सभी राक्षसोंके स्वामी हैं तथा तमोगुणियोंको (अपने कर्मका) फल प्रदान करनेवाले हैं, वे निर्ऋतिदेव मेरे ही निर्देशसे सदा प्रवर्तित होते हैं॥ २१–२५॥

जो बेतालगणों और भूतोंके स्वामी और भक्तोंको भोगरूपी फल प्रदान करनेवाले ईशानदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञामें स्थित रहते हैं। जो अङ्गिराके शिष्य, रुद्रदेवके गणोंमें अग्रगण्य और योगियोंके रक्षक हैं, वे वामदेव भी मेरी ही आज्ञाद्वारा नित्य व्यवहार करते हैं। जो सम्पूर्ण संसारके पूज्य, विघ्नकारक धर्मनेता विनायक हैं, वे भी मेरे आदेशसे चलते हैं। जो ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, देवोंके सेनापति स्वयम्भू प्रभु स्कन्द हैं, वे भी नित्य विधिकी प्रेरणासे प्रेरित होते हैं। जो प्रजाओंके पति मरीचि आदि महर्षि हैं, वे भी परात्पर (परमेश्वर)-की आज्ञासे ही विविध लोकोंकी सृष्टि करते हैं॥ २६–३०॥

जो सभी प्राणियोंकी श्री (शोभा) हैं और विपुल ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वे नारायणकी पत्नी (लक्ष्मी) मेरे ही अनुग्रहसे व्यवहार करती हैं। जो सरस्वतीदेवी विपुल वाणी प्रदान करती हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित होकर प्रवर्तित होती हैं। जो सभी पुरुषोंको घोर नरकोंसे तारनेवाली सावित्रीदेवी कही गयी हैं, वे भी देवकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली हैं। ध्यान करनेपर ब्रह्मविद्याको प्रदान करनेवाली जो श्रेष्ठ पार्वती-देवी हैं, वे भी विशेषरूपसे मेरे ही वचनोंका पालन करती हैं॥ ३१–३४॥

अनन्त महिमावाले और सभी देवताओंके स्वामी जो अनन्त शेष हैं, वे भी देव (शंकर)-के निर्देशसे ही संसारको सिरपर धारण करते हैं॥ ३५॥