भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 506 में से

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पृष्ठ 287

* अध्याय ६ * २७७

योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः।<br>पिबत्यखिलमम्भोधीमीश्वरस्य नियोगतः॥ ३६॥<br>ये चतुर्दश लोकेऽस्मिन् मनवः प्रथितौजसः।<br>पालयन्ति प्रजाः सर्वास्तेऽपि तस्य नियोगतः॥ ३७॥<br>आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ।<br>अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छास्त्रेणैव धिष्ठिताः॥ ३८॥<br>गन्धर्वा गरुडा ऋक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयम्भुवः॥ ३९॥<br>कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>ऋतवः पक्षमासाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापतेः॥ ४०॥जो संवर्तक अग्नि नित्य वडवाके रूपमें स्थित हैं, वे भी ईश्वरकी आज्ञासे ही सम्पूर्ण समुद्रको पीते रहते हैं। इस संसारमें अत्यन्त तेजस्वी जो चौदह मनु हैं, वे सभी मुझ (ईश्वर)–के आदेशसे सभी प्रजाओंका पालन करते हैं। आदित्य, वसुगण, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा अन्य सभी देवता मेरी ही आज्ञामें प्रतिष्ठित हैं। गन्धर्व, गरुड, ऋक्ष, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच—ये सभी स्वयम्भूकी आज्ञामें ही स्थित हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतुएँ, पक्ष तथा मास—ये मुझ प्रजापति (शिव)–के शासनमें स्थित हैं॥ ३६—४०॥
युगमन्वन्तराण्येव मम तिष्ठन्ति शासने।<br>पराश्चैव परार्धाश्च कालभेदास्तथा परे॥ ४१॥<br>चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।<br>नियोगादेव वर्तन्ते देवस्य परमात्मनः॥ ४२॥<br>पातालानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात्।<br>ब्रह्माण्डानि च वर्तन्ते सर्वाण्येव स्वयम्भुवः॥ ४३॥<br>अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि ममाज्ञया।<br>प्रवृत्तानि पदार्थौघैः सहितानि समन्ततः॥ ४४॥<br>ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मगैः।<br>वहिष्यन्ति सदैवाज्ञां परस्य परमात्मनः॥ ४५॥<br>भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।<br>भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगे मम वर्तते॥ ४६॥युग, मन्वन्तर, पर तथा परार्ध—ये सभी तथा अन्य कालके सभी भेद मेरे ही शासनमें स्थित रहते हैं। (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—ये) चार प्रकारके प्राणी और स्थावर–जंगमात्मक जगत् मुझ परमात्मा देवके निर्देशसे ही प्रवर्तित होते हैं। सभी पाताल और भुवन, सभी ब्रह्माण्ड स्वयम्भू परमेश्वरकी आज्ञासे प्रवर्तित हैं। बीते हुए भी जो पदार्थोंके समूहोंसहित असंख्य ब्रह्माण्ड थे, वे मेरी ही आज्ञासे सर्वत्र प्रवृत्त थे। आगे भी जो ब्रह्माण्ड होंगे, वे भी सदैव परात्पर परमात्माकी आज्ञाका आत्मगत (अपने अधीन) वस्तुओंके^१ द्वारा पालन करेंगे। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, भूतादि^२ (तामस अहंकार) और आदि प्रकृति—ये सभी मेरी आज्ञासे कार्य करते हैं॥ ४१—४६॥
याशेषजगतो योनिर्मोहिनी सर्वदेहिनाम्।<br>माया विवर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः॥ ४७॥<br>यो वै देहभृतां देवः पुरुषः पठ्यते परः।<br>आत्मासौ वर्तते नित्यमीश्वरस्य नियोगतः॥ ४८॥जो सम्पूर्ण संसारकी योनि और सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली माया है, वह भी ईश्वरके निर्देशसे ही नित्य (विभिन्न रूपोंमें) विवर्तित होती रहती है। जो देहधारियोंके आत्मस्वरूप परात्पर पुरुष देव कहे जाते हैं, वे भी नित्य ईश्वरके नियोगसे ही कार्य करते हैं॥ ४७-४८॥
विधूय मोहकलिलं यया पश्यति तत् पदम्।<br>सापि विद्या महेशस्य नियोगवशवर्तिनी॥ ४९॥<br>बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत्।<br>मयैव प्रेर्यते कृत्स्नं मय्येव प्रलयं व्रजेत्॥ ५०॥जिसके द्वारा मोहरूपी कल्मषको धोकर उस परमपदका दर्शन होता है, वह विद्या भी महेशकी आज्ञाके वशमें रहनेवाली है। इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय, यह संसार मेरी ही शक्तिसे शक्तिमान् है। मेरे द्वारा ही सम्पूर्ण (जगत्) प्रेरित किया जाता है और मुझमें ही उसका लय भी हो जाता है॥ ४९-५०॥

१-अपने अधीन जो भी सामग्री होगी, उसमें पूर्ण समर्पणभावसे आज्ञापालन करना यहाँ अभिप्रेत है।
२-तामस अहंकारकी भूतादि संज्ञा सांख्यशास्त्रमें प्रसिद्ध है—‘भूतादेस्तन्मात्र........’। (सांख्यकारिका २५)

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