भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७८ * कूर्मपुराण *

अहं हि भगवानीशः स्वयं ज्योतिः सनातनः ।<br>परमात्मा परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ ५१ ॥मैं ही भगवान्, ईश, स्वयं प्रकाश, सनातन और परमात्मा परम ब्रह्म हूँ, मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है॥ ५१ ॥
इत्येतत् परमं ज्ञानं युष्माकं कथितं मया।<br>ज्ञात्वा विमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ५२ ॥इस प्रकार यह परम ज्ञान मैंने आप लोगोंसे कहा, इसे जान लेनेसे प्राणी जन्म तथा संसारके बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ५२ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रभावं परमेष्ठिनः ।<br>यं ज्ञात्वा पुरुषो मुक्तो न संसारे पतेत् पुनः ॥ १ ॥ऋषियो! आप सभी परमेष्ठीके प्रभावको सुनें, जिसे जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है और फिर संसारमें नहीं गिरता ॥ १ ॥
परात् परतरं ब्रह्म शाश्वतं निष्कलं ध्रुवम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं तद्धाम परमं मम॥ २ ॥<br>अहं ब्रह्मविदां ब्रह्मा स्वयम्भूविश्वतोमुखः ।<br>मायाविनामहं देवः पुराणो हरिरव्ययः ॥ ३ ॥<br>योगिनामस्म्यहं शम्भुः स्त्रीणां देवी गिरीन्द्रजा।<br>आदित्यानामहं विष्णुर्वसूनामस्मि पावकः ॥ ४ ॥<br>रुद्राणां शंकरश्चाहं गरुडः पततामहम् ।<br>ऐरावतो गजेन्द्राणां रामः शस्त्रभृतामहम् ॥ ५ ॥जो परसे परतर, शाश्वत, निष्कल, ध्रुव, नित्यानन्द, निर्विकल्प ब्रह्म है, वह मेरा परम धाम है। मैं ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वतोमुख स्वयम्भू ब्रह्मा हूँ। मायावियोंमें मैं अव्यय पुराण देव हरि हूँ। योगियोंमें मैं शम्भु और स्त्रियोंमें गिरिराज पुत्री पार्वती हूँ। मैं (द्वादश) आदित्योंमें विष्णु तथा (अष्ट) वसुओंमें पावक हूँ। मैं रुद्रोंमें शंकर, उड़नेवाले पक्षियोंमें गरुड, गजेन्द्रोंमें ऐरावत तथा शस्त्रधारियोंमें परशुराम हूँ॥ २-५॥
ऋषीणां च वसिष्ठोऽहं देवानां च शतक्रतुः ।<br>शिल्पिनां विश्वकर्माहं प्रह्लादोऽस्म्यमरद्विषाम् ॥ ६ ॥<br>मुनीनामप्यहं व्यासो गणानां च विनायकः ।<br>वीराणां वीरभद्रोऽहं सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ ७ ॥<br>पर्वतानामहं मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमस्म्यहम् ॥ ८ ॥<br>अनन्तो भोगिनां देवः सेनानीनां च पावकः ।<br>आश्रमाणां च गार्हस्थ्यमीश्वराणां महेश्वरः ॥ ९ ॥<br>महाकल्पश्च कल्पानां युगानां कृतमस्म्यहम् ।<br>कुबेरः सर्वयक्षाणां गणेशानां च वीरकः ॥ १० ॥ऋषियोंमें मैं वसिष्ठ, देवताओंमें इन्द्र, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा और सुरद्वेषी राक्षसोंमें प्रह्लाद हूँ। मैं मुनियोंमें व्यास, गणोंमें विनायक, वीरोंमें वीरभद्र और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ। मैं पर्वतोंमें सुमेरु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, प्रहार करनेवाले शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य व्रत हूँ। मैं सर्पोंमें अनन्तदेव, सेनानियोंमें कार्तिकेय, आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम और ईश्वरोंमें महेश्वर हूँ। मैं कल्पोंमें महाकल्प, युगोंमें सत्ययुग, सभी यक्षोंमें कुबेर और गणेश्वरोंमें वीरक हूँ॥ ६-१०॥
प्रजापतीनां दक्षोऽहं निर्ऋतिः सर्वरक्षसाम् ।<br>वायुर्बलवतामस्मि द्वीपानां पुष्करोऽस्म्यहम् ॥ ११ ॥मैं प्रजापतियोंमें दक्ष, सभी राक्षसोंमें निर्ऋति, बलवानोंमें वायु और द्वीपोंमें पुष्कर द्वीप हूँ॥ ११॥