भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 289
  • अध्याय ७ * २७१

| मृगेन्द्राणां च सिंहोऽहं यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वेदानां सामवेदोऽहं यजुषां शतरुद्रियम्॥ १२॥<br>सावित्री सर्वजप्यानां गुह्यानां प्रणवोऽस्म्यहम्।<br>सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु॥ १३॥<br>सर्ववेदार्थविदुषां मनुः स्वायम्भुवोऽस्म्यहम्।<br>ब्रह्मावर्तस्तु देशानां क्षेत्राणामविमुक्तकम्॥ १४॥<br>विद्यानामात्मविद्याहं ज्ञानानामैश्वरं परम्।<br>भूतानामस्म्यहं व्योम सत्त्वानां मृत्युरेव च॥ १५॥<br>पाशानामस्म्यहं माया कालः कलयतामहम्।<br>गतीनां मुक्तिरेवाहं परेषां परमेश्वरः॥ १६॥<br>यच्चान्यदपि लोकेऽस्मिन् सत्त्वं तेजोबलाधिकम्।<br>तत्सर्वं प्रतिजानीध्वं मम तेजोविजृम्भितम्॥ १७॥<br>आत्मानः पशवः प्रोक्ताः सर्वे संसारवर्तिनः।<br>तेषां पतिरहं देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः॥ १८॥<br>मायापाशेन बध्नामि पशूनेतान् स्वलीलया।<br>मामेव मोचकं प्राहुः पशूनां वेदवादिनः॥ १९॥<br>मायापाशेन बद्धानां मोचकोऽन्यो न विद्यते।<br>मामृते परमात्मानं भूताधिपतिमव्ययम्॥ २०॥<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि माया कर्म गुणा इति।<br>एते पाशाः पशुपतेः क्लेशाश्च पशुबन्धनाः॥ २१॥<br>मनो बुद्धिरहंकारः खानिलाग्निजलानि भूः।<br>एता प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराश्च तथापरे॥ २२॥<br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पञ्चमम्।<br>पायूपस्थं करौ पादौ वाक् चैव दशमी मता॥ २३॥<br>शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्राकृतानि तु॥ २४॥<br>चतुर्विंशकमव्यक्तं प्रधानं गुणलक्षणम्।<br>अनादिमध्यनिधनं कारणं जगतः परम्॥ २५॥<br>सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयमुदाहृतम्।<br>साम्यावस्थितिमेतेषामव्यक्तं प्रकृतिं विदुः॥ २६॥ | मैं मृगेन्द्रोंमें सिंह, यन्त्रोंमें धनुष, वेदोंमें सामवेद और यजुर्मन्त्रोंमें शतरुद्रिय हूँ, मैं जपनीय सभी मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र, गोपनीयोंमें प्रणव, (वैदिक) सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, साममन्त्रोंमें ज्येष्ठसाम हूँ। मैं सभी वेदके अर्थको जाननेवाले विद्वानोंमें स्वायम्भुव मनु, देशोंमें ब्रह्मावर्त और क्षेत्रोंमें अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्र हूँ। मैं विद्याओंमें आत्मविद्या, ज्ञानोंमें परम ईश्वरीय ज्ञान, (पञ्च) भूतोंमें आकाश और सत्त्वोंमें मृत्यु¹ हूँ॥ १२–१५॥<br>मैं (बन्धनकारक) पाशोंमें माया, संहार करनेवालोंमें काल, गतियोंमें मुक्ति और उत्कृष्टोंमें परमेश्वर हूँ। इस संसारमें अन्य जो कुछ भी अधिक तेज और बलसे सम्पन्न सत्त्व पदार्थ हैं, उन सबको मेरे ही तेजसे सम्पन्न जानना चाहिये। संसारमें रहनेवाले सभी जीवोंको पशु² कहा गया है, मैं देव उनका पति (स्वामी) हूँ, इसलिये विद्वानोंद्वारा 'पशुपति' कहा जाता हूँ। मैं मायारूपी पाशके द्वारा अपनी लीलासे इन पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालता हूँ। वेदज्ञ लोग मुझे ही पशुओंको मुक्त करनेवाला मोचक कहते हैं। मायाके पाशसे आबद्ध जीवोंको मुक्त करनेवाला मुझ भूतोंके अधिपति अव्यय परमात्माको छोड़कर अन्य कोई नहीं है॥ १६–२०॥<br>(प्रकृति-महत्-अहंकार आदि) चौबीस तत्त्व, माया, कर्म तथा गुण—ये पशुपतिके पाश और पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालनेवाले क्लेश हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृति हैं और दूसरे सभी पदार्थ विकार या विकृति हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ तथा पाँचवीं नासिका, गुदा, जननेन्द्रिय, हाथ, पैर तथा दसवीं इन्द्रिय वाणी और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तेईस तत्त्व प्राकृत अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हैं॥ २१–२४॥<br>चौबीसवाँ तत्त्व अव्यक्त किंवा प्रधान है, वह गुणोंसे लक्षित होनेवाला आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित और जगत्‌का परम कारण है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण कहे गये हैं। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको अव्यक्त प्रकृति जानना चाहिये॥ २५–२६॥ |


१-यहाँ मृत्युसे यमराज या धर्मराजको समझना चाहिये, जो प्राणीमात्रकी अन्तिम गतिके कारण एवं निर्णायक हैं।
२-अज्ञानसे आवृत होनेके कारण जीव पशु हैं।