भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८० * कूर्मपुराण *


सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रजो मिश्रमुदाहृतम्।
गुणानां बुद्धिवैषम्याद् वैषम्यं कवयो विदुः॥ २७॥

सत्त्वगुणको ज्ञानस्वरूप, तमोगुणको अज्ञानस्वरूप और रजोगुणको मिश्ररूप अर्थात् ज्ञान और अज्ञान दोनोंका मिश्रित रूप कहा गया है। बुद्धिकी विषमतासे गुणोंका भी वैषम्य होता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं॥ २७॥

धर्माधर्माविति प्रोक्तौ पाशौ द्वौ बन्धसंज्ञितौ।
मय्यर्पितानि कर्माणि निबन्धाय विमुक्तये॥ २८॥

अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं चाभिनिवेशकम्।
क्लेशाख्यानचलान् प्राहुः पाशानात्मनिबन्धनान्॥ २९॥

एतेषामेव पाशानां माया कारणमुच्यते।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सा शक्तिर्मयि तिष्ठति॥ ३०॥

बन्ध नामवाले दो पाशोंको धर्म और अधर्म कहा गया है। मुझे अर्पित किये गये कर्म बन्धनसे मुक्तिके लिये होते हैं। आत्माका बन्धन करनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश—इन क्लेश नामवाले पाँच अचल (दीर्घकालतक स्थायी-सा रहनेवाले) तत्त्वोंको पाश कहा गया है। मायाको इन (गाँठों) पाशोंका कारण कहा जाता है। अव्यक्त मूलप्रकृतिरूप शक्ति मुझमें प्रतिष्ठित रहती है॥ २८—३०॥

स एव मूलप्रकृतिः प्रधानं पुरुषोऽपि च।
विकारा महदादीनि देवदेवः सनातनः॥ ३१॥
स एव बन्धः स च बन्धकर्ता
स एव पाशः पशवः स एव।
स वेद सर्वं न च तस्य वेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥

यह मूल प्रकृति, प्रधान, पुरुष, महत्, अहंकार आदि विकारयुक्त तत्त्व—ये सब देवाधिदेव सनातनके ही रूप हैं। यही (सनातन पुरुष) बन्धन है, यही बन्धनमें डालनेवाला है। यही पाश और यही पशु है। यही सब कुछ जानता है, परंतु इसे जाननेवाला कोई नहीं है। इसे ही आदि पुराणपुरुष कहा जाता है*॥ ३१-३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

महेश्वरका अद्वितीय परमेश्वरके रूपमें निरूपण, सांख्य-सिद्धान्तसे तत्त्वोंका सृष्टिक्रम, महेश्वरके छः अङ्ग, महेश्वरके स्वरूपके ज्ञानसे परमपदकी प्राप्ति

ईश्वर उवाच
अन्यद् गुह्यतमं ज्ञानं वक्ष्ये ब्राह्मणपुंगवाः।
येनासौ तरते जन्तुर्घोरं संसारसागरम्॥ १॥

ईश्वर बोले— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं दूसरे गुह्यतम ज्ञानको बताता हूँ, जिससे यह प्राणी घोर संसार-सागरको पार कर लेता है॥ १॥

अहं ब्रह्ममयः शान्तः शाश्वतो निर्मलोऽव्ययः।
एकाकी भगवानुक्तः केवलः परमेश्वरः॥ २॥

मम योनिर्महद् ब्रह्म तत्र गर्भं दधाम्यहम्।
मूलं मायाभिधानं तु ततो जातमिदं जगत्॥ ३॥

प्रधानं पुरुषो ह्यात्मा महान् भूतादिरेव च।
तन्मात्राणि महाभूतानीन्द्रियाणि च जज्ञिरे॥ ४॥

मैं ब्रह्ममय, शान्त, शाश्वत, निर्मल, अव्यय, एकाकी, अद्वितीय परमेश्वर तथा भगवान् कहलाता हूँ। महद्ब्रह्म मेरी योनिरूप है, मैं उसमें मूल माया नामक गर्भ धारण करता हूँ और उससे यह संसार उत्पन्न हुआ है। (उसीसे) प्रधान, पुरुष, आत्मा, महत्तत्त्व, भूतादि (तामस अहंकार), तन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं॥ २—४॥


* यहाँ बन्धन आदिको सनातनपुरुषमें कल्पितमात्र बताकर अद्वैतभावकी प्रतिष्ठा की गयी है।