भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ८ *

२८१

ततोऽण्डमभवद्धैमं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>तस्मिन् जज्ञे महाब्रह्मा मच्छक्त्या चोपबृंहितः॥ ५ ॥तदनन्तर करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्डमें मेरी शक्तिसे उपबृंहित महाब्रह्मा उत्पन्न हुए। अन्य भी जो बहुतसे प्राणी हैं, वे सभी मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे पितामह-स्वरूपको नहीं देख पाते। सभी योनियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उनकी योनि परा माया है और मुझे ही पितृस्वरूप विद्वान् लोग जानते हैं। इस प्रकार जो मुझे ही बीजरूप पितृस्वरूप प्रभु जानता है, वह सभी लोकोंमें धीर होता है और मोहको प्राप्त नहीं होता॥ ५-८॥
ये चान्ये बहवो जीवा मन्मयाः सर्व एव ते।<br>न मां पश्यन्ति पितरं मायया मम मोहिताः॥ ६ ॥
याश्च योनिषु सर्वासु सम्भवन्ति हि मूर्तयः।<br>तासां माया परा योनिर्मामेव पितरं विदुः॥ ७ ॥
यो मामेवं विजानाति बीजिनं पितरं प्रभुम्।<br>स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति॥ ८ ॥
ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां परमेश्वरः।<br>ओङ्कारमूर्तिर्भगवानहं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ ९ ॥मैं ही सभी विद्याओंका स्वामी, प्राणियोंका परम ईश्वर, ओङ्कारमूर्ति, प्रजापति भगवान् ब्रह्मा हूँ। जो पुरुष विनष्ट होनेवाले सभी (चराचर) भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समानरूपसे देखता है, वह स्वयंद्वारा स्वयंको नष्ट नहीं करता; इस कारण वह परम गति प्राप्त करता है। सात सूक्ष्म तत्त्वों एवं छः अङ्गोंवाले महेश्वरको जानकर प्रधान तथा विनियोगको जाननेवाला परम ब्रह्मको प्राप्त करता है॥ ९-१२॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।<br>विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ १० ॥
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।<br>न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ ११ ॥
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्।<br>प्रधानविनियोगज्ञः परं ब्रह्माधिगच्छति॥ १२ ॥
सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः<br>स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः।<br>अनन्तशक्तिश्च विभोर्विदित्वा<br>षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ १३॥सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि ज्ञान, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त-शक्ति तथा अनन्तशक्ति—ये विभु महेश्वरके छः अङ्ग कहे गये हैं। पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), मन और आत्मा—ये सात सूक्ष्म तत्त्व कहे गये हैं। जो हेतुरूप प्रकृति है, वह प्रधान है और उससे होनेवाले बन्धनको ही विनियोग कहा जाता है। प्रकृतिमें लीन रहनेवाली जो शक्ति है, उसे वेदोंमें ब्रह्मयोनि और कारणरूप कहा गया है। अद्वितीय, परमेष्ठी, परात्पर, सत्यरूप महेश्वर उसके पुरुष हैं॥ १३-१५॥
तन्मात्राणि मन आत्मा च तानि<br>सूक्ष्माण्याहुः सप्त तत्त्वात्मकानि।<br>या सा हेतुः प्रकृतेः सा प्रधानं<br>बन्धः प्रोक्तो विनियोगोऽपि तेन॥ १४॥
या सा शक्तिः प्रकृतौ लीनरूपा<br>वेदेषूक्ता कारणं ब्रह्मयोनिः।<br>तस्या एकः परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः पुरुषः सत्यरूपः॥ १५॥
ब्रह्मा योगी परमात्मा महीयान्<br>व्योमव्यापी वेदवेद्यः पुराणः।<br>एको रुद्रो मृत्युरव्यक्तमेकं<br>बीजं विश्वं देव एकः स एव॥ १६॥वे ही अद्वितीय देव ब्रह्मा, योगी, परमात्मा, महीयान्, व्योमव्यापी, वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य, पुराण, पुरुष अद्वितीय रुद्र, मृत्यु, अव्यक्त, एक बीज और विश्वरूप हैं॥ १६॥