भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८२ * कूर्मपुराण *


तमेवैकं प्राहुरन्येऽप्यनेकं
त्वेकात्मानं केचिदन्यत्तथाहुः।
अणोरणीयान् महतोऽसौ महीयान्
महादेवः प्रोच्यते वेदविद्भिः॥ १७॥
एवं हि यो वेद गुहाशयं परं
प्रभुं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम्।
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं
स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति॥ १८॥

उन्हें ही कोई एक और कोई अनेक कहते हैं। दूसरे कुछ लोग उन्हें ही अद्वितीय आत्मा कहते हैं। वेदज्ञ लोग उन्हें अणुसे अणुतर और महान्‌से भी महत्तर महादेव कहते हैं। हृदयरूप गुहामें स्थित, परात्पर, पुराणपुरुष, विश्वरूप, हिरण्मय और बुद्धिमानोंकी परमगति प्रभुको जो इस प्रकार जानता है, वह बुद्धिमान् पुरुष बुद्धिको पार कर जाता है अर्थात् परमपद प्राप्त करता है॥ १७-१८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें (ईश्वरगीताका) आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८॥


नवाँ अध्याय

महादेवके विश्वरूपत्वका वर्णन तथा ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका प्रतिपादन

ऋषय ऊचुः
निष्कलो निर्मलो नित्यो निष्क्रियः परमेश्वरः।
तन्नो वद महादेव विश्वरूपः कथं भवान्॥ १॥

**ऋषियोंने पूछा—**महादेव! आप परमेश्वर निष्कल, निर्मल, नित्य तथा निष्क्रिय होनेपर भी विश्वरूप कैसे हैं, इसे हम लोगोंको बतलायें॥ १॥

ईश्वर उवाच
नाहं विश्वो न विश्वं च मामृते विद्यते द्विजाः।
मायानिमित्तमत्रास्ति सा चात्मानमपाश्रिता॥ २॥

अनादिनिधना शक्तिर्मायाव्यक्तसमाश्रया।
तन्निमित्तः प्रपञ्चोऽयमव्यक्तादभवत् खलु॥ ३॥

अव्यक्तं कारणं प्राहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम्।
अहमेव परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते॥ ४॥

तस्मान्मे विश्वरूपत्वं निश्चितं ब्रह्मवादिभिः।
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्॥ ५॥

अहं तत् परं ब्रह्म परमात्मा सनातनः।
अकारणं द्विजाः प्रोक्तो न दोषो ह्यात्मनस्तथा॥ ६॥

**ईश्वर बोले—**द्विजो! मैं विश्व नहीं हूँ और मुझसे अतिरिक्त विश्व भी नहीं है। यह सब मायाके निमित्तसे है और वह माया भी आत्माको आश्रित कर रहती है। आदि और अन्तसे रहित शक्तिरूप माया अव्यक्त (परमात्मा)-के आश्रित है, उसी (माया)-के कारण अव्यक्तसे यह प्रपञ्चरूप संसार उत्पन्न हुआ है। (मुझ) अव्यक्तको कारण कहा जाता है। मैं ही आनन्दस्वरूप, प्रकाशरूप, अक्षर परम ब्रह्म हूँ। मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी कारण ब्रह्मवादियोंने मेरा विश्वरूपत्व निश्चित किया है। एक रूप तथा भिन्नरूपके विषयमें इस उदाहरणका* वर्णन किया गया है। द्विजो! मैं कारणरहित, सनातन, परम ब्रह्म परमात्मा हूँ, अतः मुझमें कोई दोष नहीं है। तात्पर्य यह है कि जगत्‌में विषमता, क्रूरता आदि दोषोंका असाधारण कारण मनुष्यकृत कर्म है, ईश्वर नहीं। ईश्वर तो सामान्य कारण है, अतः वह दोषरहित है॥ २-६॥


* विवर्त विश्वकी दृष्टिसे महादेव अनेक रूप हैं तथा परमार्थतः एक होनेसे एक रूप हैं।