संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ९ * २४३
| अनन्ता शक्तयोऽव्यक्ते मायाद्याः संस्थिता ध्रुवाः।<br>तस्मिन् दिवि स्थितं नित्यमव्यक्तं भाति केवलम्॥ ७ ॥<br><br>याभिस्तल्लक्ष्यते भिन्नमभिन्नं तु स्वभावतः।<br>एकया मम सायुज्यमनादिनिधनं ध्रुवम्॥ ८ ॥<br><br>पुंसोऽभूदन्यया भूतिरन्यया तत्तिरोहितम्।<br>अनादिमध्यं तिष्ठन्तं युज्यतेऽविद्यया किल॥ ९ ॥<br><br>तदेतत् परं व्यक्तं प्रभामण्डलमण्डितम्।<br>तदक्षरं परं ज्योतिस्तद् विष्णोः परमं पदम्॥ १०॥<br><br>तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।<br>तदेव च जगत् कृत्स्नं तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ११॥<br>यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।<br>आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् बिभेति न कुतश्चन॥ १२॥<br>वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-<br>मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>तद् विज्ञाय परिमुच्येत विद्वान्<br>नित्यानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥ १३॥<br>यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्<br>यज्ज्योतिषां ज्योतिरेकं दिविस्थम्।<br>तदेवात्मानं मन्यमानोऽथ विद्वा-<br>नात्मानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥ १४॥<br>तदव्ययं कलिलं गूढदेहं<br>ब्रह्मानन्दममृतं विश्वधाम।<br>वदन्त्येवं ब्राह्मणा ब्रह्मनिष्ठा<br>यत्र गत्वा न निवर्तन्त भूयः॥ १५॥<br>हिरण्मये परमाकाशतत्त्वे<br>यदर्चिषि प्रभातीव तेजः।<br>तद्विज्ञाने परिपश्यन्ति धीरा<br>विभ्राजमानं विमलं व्योम धाम॥ १६॥<br><br>ततः परं परिपश्यन्ति धीरा<br>आत्मन्यात्मानमनुभूयानुभूय ।<br>स्वयम्प्रभः परमेष्ठी महीयान्<br>ब्रह्मानन्दी भगवानीश एषः॥ १७॥ | अव्यक्तमें ही माया आदि अनन्त ध्रुव शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं और वह अव्यक्त अकेले ही विशुद्ध शब्दतन्मात्रारूप आकाशतत्त्वमें स्थित रहते हुए सदा प्रकाशित रहता है। स्वभावतः वह अभिन्न (अव्यक्त) तत्त्व जिनके द्वारा अनेक रूपोंमें प्रतिभासित होता है, उनकी मूल एक (परम) शक्तिसे आदि और अन्तरहित मेरा ध्रुव सायुज्य प्राप्त होता है। पुरुषकी दूसरी शक्तिसे भूति (ऐश्वर्य)-की उत्पत्ति तथा अन्य शक्तिसे उसका (भूतिका) लोप होता है। आदि एवं मध्यरहित सर्वत्र विद्यमान (पुरुष) ही अविद्यासे (स्वेच्छाया) युक्त होता है। प्रभामण्डलसे मण्डित वह परम व्यक्त, अक्षर, परम ज्योतिरूप है और वह विष्णुका परमपद है। उसमें ही यह सारा जगत् ओतप्रोत है। वही सम्पूर्ण जगत् है। उसे जान लेनेसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ७-११॥<br><br>मनके साथ वाणी जिसे न पाकर लौट आती है, उस आनन्दस्वरूप ब्रह्माको जाननेवाला कहीं भयभीत नहीं होता। मैं इस तमोगुणसे परे आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशयुक्त महान् पुरुषको जानता हूँ, इसे जानकर विद्वान् मुक्त हो जाता है और नित्य आनन्दस्वरूप तथा ब्रह्ममय हो जाता है॥ १२-१३॥<br><br>जिससे परे और भिन्न कुछ भी नहीं है और जो द्युलोकमें स्थित सभी ज्योतियोंका एकमात्र प्रकाशक है, उसीको आत्मा माननेवाला विद्वान् नित्य आनन्द-स्वरूप ब्रह्ममय हो जाता है। ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण उसे अविनाशी, कलिल, गूढदेह, ब्रह्मानन्द, अमृत तथा विश्वधाम कहते हैं। वहाँ पहुँचनेपर फिर लौटना नहीं पड़ता॥ १४-१५॥<br><br>हिरण्मय प्रकाशयुक्त परम आकाशतत्त्वमें जो तेजके समान प्रतिभासित होता है, धीर जन (आत्मस्थ) विज्ञानमें उस प्रकाशमान निर्मल व्योम (ब्रह्म) एवं धाम (परम प्राप्तव्य)-का दर्शन करते हैं। तदनन्तर अपने आत्मामें आत्माका बार-बार अनुभव करके धीर पुरुष परम तत्त्वका दर्शन करते हैं और उन्हें यह ज्ञान होता है—यही (आत्मतत्त्व) स्वयं प्रकाशमान, परमेष्ठी, महान् ब्रह्मानन्दस्वरूप भगवान् ईशके रूपमें है॥ १६-१७॥ |