संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२८४ * कूर्मपुराण *
| एको देवः सर्वभूतेषु गूढः<br>सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।<br>तमेवैकं येऽनुपश्यन्ति धीरा-<br>स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १८ ॥ | सभी प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वव्यापी एक देव ही सभी प्राणियोंमें छिपे हुए हैं। जो धीर पुरुष उन एक अद्वितीयका दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। वे भगवान् सभी ओर मुख, सिर तथा ग्रीवावाले, सभी प्राणियोंके (हृदयरूपी) गुहामें स्थित और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। उनसे भिन्न कुछ नहीं है॥ १८-१९॥ |
| सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः।<br>सर्वव्यापी च भगवान् न तस्मादन्यदिष्यते ॥ १९ ॥ | |
| इत्येतदैश्वरं ज्ञानमुक्तं वो मुनिपुंगवाः।<br>गोपनीयं विशेषेण योगिनामपि दुर्लभम् ॥ २० ॥ | मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार यह आपको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान बतलाया। यह विशेषरूपसे गोपनीय है और योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २०॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) नवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
ईश्वरद्वारा परम तत्त्व तथा परम ज्ञानके स्वरूपका निरूपण और उसकी प्राप्तिके साधनका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
|---|---|
| अलिङ्गमेकमव्यक्तं लिङ्गं ब्रह्मेति निश्चितम्।<br>स्वयंज्योतिः परं तत्त्वं परे व्योम्नि व्यवस्थितम् ॥ १ ॥ | अलिङ्ग (चिह्नरहित), अद्वितीय, अव्यक्त, लिङ्गको ब्रह्म कहा गया है। वह स्वयं प्रकाशरूप परम तत्त्व परम व्योममें अवस्थित है। जो निर्गुण, विशुद्ध विज्ञानरूप, अक्षर और अव्यक्त कारण-रूप है, उस परमपदका विद्वान् लोग साक्षात्कार करते हैं। जिसे वेदमें तल्लिङ्ग अर्थात् हेतुरूप कहा गया है, उस परम ब्रह्मका शान्तसंकल्पवाले, तत्परायण और नित्य उनके भावसे भावित लोग साक्षात्कार करते हैं॥ १–३॥ |
| अव्यक्तं कारणं यत्तदक्षरं परमं पदम्।<br>निर्गुणं शुद्धविज्ञानं तद् वै पश्यन्ति सूरयः ॥ २ ॥ | |
| तन्निष्ठाः शान्तसंकल्पा नित्यं तद्भावभाविताः।<br>पश्यन्ति तत् परं ब्रह्म यत्तल्लिङ्गमिति श्रुतिः ॥ ३ ॥ | |
| अन्यथा नहि मां द्रष्टुं शक्यं वै मुनिपुंगवाः।<br>नहि तद् विद्यते ज्ञानं यतस्तज्ज्ञायते परम् ॥ ४ ॥ | मुनिश्रेष्ठो! अन्य किसी प्रकार मेरा दर्शन नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जिससे उस परम तत्त्वको जाना जा सके। इस परम ज्ञानको केवल विद्वान् ही जानते हैं। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अज्ञानस्वरूप है, जिससे यह मायामय जगत् (उत्पन्न) है॥ ४-५॥ |
| एतत्त्परमं ज्ञानं केवलं कवयो विदुः।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं यस्मान्मायामयं जगत् ॥ ५ ॥ | |
| यज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम्।<br>ममात्मासौ तदेवेदमिति प्राहुर्विपश्चितः ॥ ६ ॥ | जो निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प तथा अव्यय ज्ञान है, वही मेरा आत्मरूप है—ऐसा विद्वानोंका कहना है। जो उसे (उस परम तत्त्वको) अनेक रूपसे देखते हैं, वे भी परम निष्ठा (भक्ति)-का आश्रय ग्रहणकर अद्वितीय अविनाशी तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर उसी परम तत्त्वको देखते हैं ॥ ६-७ ॥ |
| येऽप्यनेकं प्रपश्यन्ति तेऽपि पश्यन्ति तत्परम्।<br>आश्रिताः परमां निष्ठां बुद्ध्वैकं तत्त्वमव्ययम् ॥ ७ ॥ |