भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 295
* अध्याय १० *२८५
ये पुनः परमं तत्त्वमेकं वानेकमिश्वरम्।<br>भक्त्या मां सम्प्रपश्यन्ति विज्ञेयास्ते तदात्मकाः ॥ ८ ॥और जो दूसरे लोग पुनः एक या अनेक रूपोंमें परम तत्त्वरूप ईश्वरका भक्तिद्वारा साक्षात्कार करते हैं, उन्हें तदात्मक अर्थात् उस ब्रह्मका स्वरूप ही जानना चाहिये ॥ ८ ॥
साक्षादेव प्रपश्यन्ति स्वात्मानं परमेश्वरम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं सत्यरूपमिति स्थितिः ॥ ९ ॥वे वस्तुतः नित्यानन्दस्वरूप, निर्विकल्प तथा सत्यस्वरूप साक्षात् परमेश्वरको अपनी आत्मामें देखते हैं यह वस्तुस्थिति है। अपने अव्यक्त परम आत्मामें अवस्थित शान्त (योगीजन), श्रेष्ठ परम तत्त्वके परमानन्दस्वरूप, सर्वव्यापी तदात्मक तत्त्वकी उपासना करते हैं। यही परम मुक्ति है, विद्वान् इसे मेरा उत्तम सायुज्य (नामक मोक्ष), निर्वाण ब्रह्मके साथ ऐक्य और कैवल्यरूपसे जानते हैं। ये परम शिव आदि, मध्य और अन्तसे रहित अद्वितीय तत्त्व हैं। ये ही महादेव हैं, ईश्वर हैं, इसलिये इन्हें जाननेसे मुक्ति मिल जाती है ॥ ९—१२ ॥
भजन्ते परमानन्दं सर्वगं यत्तदात्मकम्।<br>स्वात्मन्यवस्थिताः शान्ताः परेऽव्यक्ते परस्य तु ॥ १० ॥
एषा विमुक्तिः परमा मम सायुज्यमुत्तमम्।<br>निर्वाणं ब्रह्मणा चैक्यं कैवल्यं कवयो विदुः ॥ ११ ॥
तस्मादनादिमध्यान्तं वस्त्वेकं परमं शिवम्।<br>स ईश्वरो महादेवस्तं विज्ञाय विमुच्यते ॥ १२ ॥
न तत्र सूर्यः प्रविभातीह चन्द्रो<br>न नक्षत्राणि तपनो नोत विद्युत्।<br>तद्भासेदमखिलं भाति नित्यं<br>तन्नित्यभासमचलं सद्दिभाति ॥ १३ ॥वहाँ (परम तत्त्व परमेश्वरमें) न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, न नक्षत्र, न अग्नि और न ही विद्युत्। उसीके प्रकाशसे सम्पूर्ण (विश्व) प्रकाशित होता है। वह नित्य प्रकाश अचल एवं सद्रूपसे प्रकाशित होता है। जो परम बृहत् विशुद्ध तत्त्व निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप और नित्य उदित हुआ ज्ञानसे ही प्रकाशित होता है, उसीमें ब्रह्मज्ञानी लोग जिस नित्य अचल तत्त्वका दर्शन करते हैं, वही ईश हैं ॥ १३–१४ ॥
नित्योदितं संविदा निर्विकल्पं<br>शुद्धं बृहन्तं परमं यदिभाति।<br>अत्रान्तरं ब्रह्मविदोऽथ नित्यं<br>पश्यन्ति तत्त्वमचलं यत् स ईशः ॥ १४ ॥
नित्यानन्दममृतं सत्यरूपं<br>शुद्धं वदन्ति पुरुषं सर्ववेदाः।<br>तमोमिति प्रणवेनेशितारं<br>ध्यायन्ति वेदार्थविनिश्चितार्थाः ॥ १५ ॥सभी वेद पुरुषको नित्य आनन्दरूप, अमृतरूप और विशुद्ध सत्यस्वरूप कहते हैं। वेदार्थका निश्चय किये हुए लोग 'ॐ' इस प्रणवके द्वारा उस नियामकका ध्यान करते हैं। परम आकाशके मध्यमें एकमात्र अद्वितीय देव शिव ही प्रकाशित होते हैं; वहाँ न भूमि है, न जल है, न मन है और न अग्नि ही है। इसी प्रकार प्राण, वायु, आकाश, बुद्धि तथा अन्य कोई चेतन-तत्त्व वहाँ नहीं है ॥ १५-१६ ॥
न भूमिरापो न मनो न वह्निः<br>प्राणोऽनिलो गगनं नोत बुद्धिः।<br>न चेतनोऽन्यत् परमाकाशमध्ये<br>विभाति देवः शिव एव केवलः ॥ १६ ॥
इत्येतदुक्तं परमं रहस्यं<br>ज्ञानामृतं सर्ववेदेषु गूढम्।<br>जानाति योगी विजनेऽथ देशे<br>युञ्जीत योगं प्रयतो ह्यजस्रम् ॥ १७ ॥यह मैंने सभी वेदोंमें निहित परम रहस्यमय ज्ञानरूपी अमृतका वर्णन किया। किसी निर्जन प्रदेशमें निरन्तर प्रयत्नपूर्वक साधना करनेवाला योगी ही इस ज्ञानको जानता है ॥ १७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ॥

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