भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

२८६ * कूर्मपुराण *


ग्यारहवाँ अध्याय

योगकी महिमा, अष्टाङ्गयोग, यम, नियम आदि योगसाधनोंका लक्षण, प्राणायामका विशेष प्रतिपादन, ध्यानके विविध प्रकार, पाशुपत-योगका वर्णन, वाराणसीमें प्राणत्यागकी महिमा, शिव-आराधनकी विधि, शिव और विष्णुके अभेदका प्रतिपादन, शिवज्ञान-योगकी परम्पराका वर्णन, ईश्वरगीताकी फलश्रुति तथा उपसंहार

ईश्वर उवाच**ईश्वरने कहा—**इसके अनन्तर उस परम दुर्लभ योगको कहता हूँ, जिससे सूर्यके समान ईश्वररूप आत्माका दर्शन होता है अर्थात् सूर्यका जैसे प्रत्यक्ष हो रहा है, वैसे ही ईश्वरका प्रत्यक्ष होता है॥ १ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।<br>येनात्मानं प्रपश्यन्ति भानुमन्तमिवेश्वरम्॥ १ ॥<br>योगाग्निर्दहति क्षिप्रमशेषं पापपञ्जरम्।<br>प्रसन्नं जायते ज्ञानं साक्षान्निर्वाणसिद्धिदम्॥ २ ॥<br><br>योगात् संजायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य प्रसीदति महेश्वरः॥ ३ ॥<br><br>एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।<br>ये युञ्जन्तीह मद्योगं ते विज्ञेया महेश्वराः॥ ४ ॥योगरूपी अग्नि शीघ्र ही सम्पूर्ण पापपञ्जरको भस्म कर देता है और (उसके बाद) साक्षात् मुक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाला प्रसन्न (निर्मल) ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित होता है। योग तथा ज्ञानसे सम्पन्न व्यक्तिपर महेश्वर प्रसन्न होते हैं। जो नित्य एक समय, दो समय या तीनों समय मेरे योगका साधन करते हैं, उन्हें महेश्वर समझना चाहिये॥ २—४॥
योगस्तु द्विविधो ज्ञेयो ह्यभावः प्रथमो मतः।<br>अपरस्तु महायोगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः॥ ५ ॥<br><br>शून्यं सर्वनिर्भासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते।<br>अभावयोगः स प्रोक्तो येनात्मानं प्रपश्यति॥ ६ ॥<br><br>यत्र पश्यति चात्मानं नित्यानन्दं निरञ्जनम्।<br>मयैक्यं स महायोगो भाषितः परमेश्वरः॥ ७ ॥योग दो प्रकारका समझना चाहिये, पहला अभावयोग है और दूसरा सभी योगोंमें उत्तमोत्तम महायोग कहलाता है। जिसमें सभी आभासोंसे रहित शून्यमय (निर्विकल्पक) स्वरूपका चिन्तन होता है और जिसके द्वारा आत्माका साक्षात्कार होता है, वह अभावयोग कहा गया है। जिसमें नित्यानन्दस्वरूप निरञ्जन आत्माका दर्शन होता है और मेरे साथ एकता होती है, वह परमेश्वररूप महायोग कहा गया है॥ ५—७॥
ये चान्ये योगिनां योगाः श्रूयन्ते ग्रन्थविस्तरे।<br>सर्वे ते ब्रह्मयोगस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ८ ॥<br><br>यत्र साक्षात् प्रपश्यन्ति विमुक्ता विश्वमीश्वरम्।<br>सर्वेषामेव योगानां स योगः परमो मतः॥ ९ ॥<br><br>सहस्रशोऽथ शतशो ये चेश्वरबहिष्कृताः।<br>न ते पश्यन्ति मामेकं योगिनो यतमानसाः॥ १० ॥अन्य जिन योगियोंके योगोंका ग्रन्थोंमें विस्तार हुआ है, वे सभी ब्रह्मयोगकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिस योगमें मुक्त पुरुष विश्वको साक्षात् ईश्वरके रूपमें देखते हैं, वह सभी योगोंमें श्रेष्ठ योग माना जाता है। जो सैकड़ों, हजारों अन्य प्रकारके मनको संयमित करनेवाले ईश्वरबहिष्कृत (वेदबाह्य) योगी हैं, वे मुझ अद्वितीयका दर्शन नहीं करते॥ ८—१०॥