भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 506 में से

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पृष्ठ 297
  • अध्याय ११ * | २८७ ---|---

प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।<br>समाधिश्च मुनिश्रेष्ठा यमो नियम आसनम् ॥ ११ ॥<br>मय्येकचित्ततायोगो वृत्त्यन्तरनिरोधतः ।<br>तत्साधनान्यष्टधा तु युष्माकं कथितानि तु ॥ १२ ॥<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ<br>यमाः संक्षेपतः प्रोक्ताश्चित्तशुद्धिप्रदा नृणाम् ॥ १३ ॥<br><br>कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा ।<br>अक्लेशजननं प्रोक्तं त्वहिंसा परमर्षिभिः ॥ १४ ॥<br><br>अहिंसायाः परो धर्मो नास्त्यहिंसा परं सुखम् ।<br>विधिना या भवेद्धिंसा त्वहिंसैव प्रकीर्तिता ॥ १५ ॥<br><br>सत्येन सर्वमाप्नोति सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।<br>यथार्थकथनाचारः सत्यं प्रोक्तं द्विजातिभिः ॥ १६ ॥<br><br>परद्रव्यापहरणं चौर्याद् वाथ बलेन वा ।<br>स्तेयं तस्यानाचरणादस्तैयं धर्मसाधनम् ॥ १७ ॥<br><br>कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।<br>सर्वत्र मैथुनत्यागं ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥ १८ ॥<br>द्रव्याणामप्यनादानमापद्यपि यथेच्छया ।<br>अपरिग्रह इत्याहुस्तं प्रयत्नेन पालयेत् ॥ १९ ॥<br><br>तपःस्वाध्यायसंतोषाः शौचमीश्वरपूजनम् ।<br>समासान्नियमाः प्रोक्ता योगसिद्धिप्रदायिनः ॥ २० ॥<br><br>उपवासपराकादिकृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।<br>शरीरशोषणं प्राहुस्तापसास्तप उत्तमम् ॥ २१ ॥<br>वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजपं बुधाः ।<br>सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्यायं परिचक्षते ॥ २२ ॥<br><br>स्वाध्यायस्य त्रयो भेदा वाचिकोपांशुमानसाः ।<br>उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः ॥ २३ ॥<br><br>यः शब्दबोधजननः परेषां शृण्वतां स्फुटम् ।<br>स्वाध्यायो वाचिकः प्रोक्त उपांशोरथ लक्षणम् ॥ २४ ॥ | मुनिश्रेष्ठो ! अन्य वृत्तियोंका निरोधकर मेरेमें एकचित्तता ही योग है और इस योगके जो आठ साधन मैंने आप लोगोंको बताये हैं वे ये हैं—प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, समाधि, यम, नियम तथा आसन* ॥ ११-१२ ॥<br>अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—संक्षेपमें इन्हें यम कहा गया है। ये मनुष्योंके चित्तकी शुद्धि करनेवाले हैं। मन, वाणी तथा कर्मसे सभी प्राणियोंको सर्वदा किसी भी प्रकारका क्लेश प्रदान न करना—इसे श्रेष्ठ ऋषियोंने अहिंसा कहा है। अहिंसासे श्रेष्ठ (कोई) धर्म नहीं है और अहिंसासे बढ़कर कोई सुख नहीं है। वेदविहित हिंसाको अहिंसा ही कहा गया है। सत्यके द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है, सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। द्विजातियोंके द्वारा यथार्थ कथनके आचारको सत्य कहा गया है। चोरीसे अथवा बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है, उसका (स्तेयका) आचरण न करना अस्तेय है, यह धर्मका साधन है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा सभी अवस्थाओंमें सर्वदा सर्वत्र मैथुनका त्याग करना ब्रह्मचर्य कहलाता है ॥ १३—१८ ॥<br>आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्योंका ग्रहण न करना 'अपरिग्रह' कहा गया है। प्रयत्नपूर्वक उस अपरिग्रहका पालन करना चाहिये। तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच तथा ईश्वरका पूजन—संक्षेपमें नियम बतलाये गये हैं, ये योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपस्वियोंने पराक आदि उपवासों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि (व्रतों)-के द्वारा शरीरके शोषणको उत्तम तप कहा है ॥ १९—२१ ॥<br>विद्वान् लोगोंने वेदान्तशास्त्र, शतरुद्रिय और प्रणव आदिके जपको पुरुषोंके लिये सत्त्वकी शुद्धि करनेवाला 'स्वाध्याय' कहा है। स्वाध्यायके तीन भेद हैं—वाचिक, उपांशु और मानस। वेदार्थ जाननेवालोंने इन तीनोंमें उत्तरोत्तरका वैशिष्ट्य कहा है अर्थात् वाचिक स्वाध्यायसे उपांशु स्वाध्याय श्रेष्ठ और उपांशु स्वाध्यायसे मानस स्वाध्याय श्रेष्ठ है। दूसरे सुननेवालेको स्पष्टरूपसे शब्दका ज्ञान उत्पन्न करानेवाला स्वाध्याय 'वाचिक' कहलाता है। (अर्थात् वह स्वाध्याय वाचिक है जो दूसरोंको स्पष्ट सुनायी पड़े।) अब उपांशुका लक्षण बतलाया जाता है ॥ २२—२४ ॥


* यद्यपि अष्टाङ्गयोगके साधन ऊपर निर्दिष्ट क्रमसे ही मूलमें वर्णित हैं, पर यह वर्णन छन्दकी दृष्टिसे है। वास्तवमें साधनोंका क्रम इस प्रकार है—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि।

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