संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८८ | * कूर्मपुराण * |
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ओष्ठयोः स्पन्दमात्रेण परस्याशब्दबोधकः ।
उपांशुरेष निर्दिष्टः साहस्त्रो वाचिकाज्जपः ॥ २५ ॥
यत्पदाक्षरसङ्गत्या परिस्पन्दनवर्जितम् ।
चिन्तनं सर्वशब्दानां मानसं तं जपं विदुः ॥ २६ ॥
यदृच्छालाभतो नित्यमलं पुंसो भवेदिति ।
या धीस्तामृषयः प्राहुः संतोषं सुखलक्षणम् ॥ २७ ॥
बाह्याभ्यन्तरं शौचं द्विधा प्रोक्तं द्विजोत्तमाः ।
मृज्जलाभ्यां स्मृतं बाह्यं मनःशुद्धिरथान्तरम् ॥ २८ ॥
स्तुतिस्मरणपूजाभिर्वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
सुनिश्चला शिवे भक्तिरेतदीश्वरपूजनम् ॥ २९ ॥
यमाः सनियमाः प्रोक्ताः प्राणायामं निबोधत ।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ॥ ३० ॥
उत्तमाधममध्यत्वात् त्रिधायं प्रतिपादितः ।
स एव द्विविधः प्रोक्तः सगर्भोऽगर्भ एव च ॥ ३१ ॥
मात्राद्वादशको मन्दश्चतुर्विंशतिमात्रिकः ।
मध्यमः प्राणसंरोधः षट्त्रिंशन्मात्रिकोत्तमः ॥ ३२ ॥
प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकत्वं यथाक्रमम् ।
मन्दमध्यममुख्यानामानन्दादुत्तमोत्तमः ॥ ३३ ॥
सगर्भमाहुः सजपमगर्भं विजपं बुधाः ।
एतद् वै योगिनामुक्तं प्राणायामस्य लक्षणम् ॥ ३४ ॥
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ ३५ ॥
रेचकः पूरकश्चैव प्राणायामोऽथ कुम्भकः ।
प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु योगिभिर्यतमानसैः ॥ ३६ ॥
| ओठोंमें केवल स्पन्दन होनेके कारण दूसरेको शब्दका बोध न करानेवाला स्वाध्याय 'उपांशु' कहा गया है। यह वाचिक जपसे हजार गुना श्रेष्ठ है। (अर्थात् वही स्वाध्याय उपांशु है जिसमें ओठोंमें मात्र स्पन्दन हो, शब्दोंका उच्चारण न हो।) स्पन्दनरहित अक्षर एवं उस पदकी संगतिके अनुसार सभी शब्दोंके चिन्तनको विद्वान् मानस जप कहते हैं (अर्थात् मानस जप (स्वाध्याय) वही है जिसमें स्वाध्यायके शब्दोंपर केवल मन केन्द्रित हो बाकी सर्वथा व्यापारशून्य हो)। पुरुषको जो यदृच्छापूर्वक मिल जाता है, उसे ही पर्याप्त समझने-वाली बुद्धिको ऋषिलोग नित्य सुख लक्षणवाला संतोष कहते हैं॥ २५-२७॥ <br><br> द्विजश्रेष्ठो! बाह्य और आभ्यन्तर-भेदसे शौच दो प्रकारका कहा गया है। मिट्टी और जलसे होनेवाला शौच बाह्य शौच और मनकी शुद्धि आभ्यन्तर शौच है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा स्तुति, स्मरण तथा पूजा करते हुए शिवमें अचल भक्ति रखना—यह ईश्वरका पूजन है। नियमोंके साथ यमोंको बतलाया गया, अब प्राणायामके विषयमें सुनो—अपनी देहसे उत्पन्न वायुको प्राण कहते हैं और उस वायुका निरोध करना आयाम है। उत्तम, मध्यम तथा अधमके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है। वही सगर्भ और अगर्भ-भेदसे दो प्रकारका है। द्वादश मात्रा (अर्थात् प्रणवका बारह बार जप करनेतक)-के कालको मन्द प्राणायाम, चौबीस मात्रा (-के प्राणनिरोध)-को मध्यम और छत्तीस मात्रातकके कालतक प्राणनिरोधको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है॥ २८-३२॥ <br><br> मन्द, मध्यम तथा मुख्य अर्थात् उत्तम नामके प्राणायामोंमें क्रमसे प्रस्वेद (पसीना) कम्पन तथा उत्थान होता है। इनसे तत्त्व-प्राप्तिमें क्रमशः आनन्दातिशयकी अनुभूति होती है। विद्वान् जपयुक्त प्राणायामको सगर्भ और जप-रहितको अगर्भ कहते हैं। योगियोंके प्राणायामका यही लक्षण कहा गया है। प्राणधारणपूर्वक व्याहृति (भूः, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्), प्रणव और शीर्षमन्त्रसहित गायत्रीका तीन बार जप (सगर्भ) प्राणायाम कहा जाता है। मनको संयत करनेवाले योगियोंने सभी शास्त्रोंमें रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायामका वर्णन किया है॥ ३३-३६॥ |
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