संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ११ २८९
| रेचकोऽजस्रनिःश्वासात् पूरकस्तन्निरोधतः ।<br>साम्येन संस्थितिर्या सा कुम्भकः परिगीयते ॥ ३७॥ | वायुके सतत बाहर निकालनेको रेचक और उसके रोकनेको पूरक तथा बादकी सम अवस्थाकी जो स्थिति है, उसे कुम्भक कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो ! सज्जनोंने |
| इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावतः ।<br>निग्रहः प्रोच्यते सद्भिः प्रत्याहारस्तु सत्तमाः ॥ ३८ ॥ | स्वभावतः विषयोंमें विचरण करनेवाली इन्द्रियोंके निग्रहको प्रत्याहार कहा है। हृदयकमल, नाभिदेश, मूर्धा तथा |
| हृत्पुण्डरीके नाभ्यां वा मूर्ध्नि पर्वतमस्तके ।<br>एवमादिषु देशेषु धारणा चित्तबन्धनम् ॥ ३९ ॥ | पर्वतशिखर आदि स्थानोंमें चित्तके बन्धनको धारणा कहा जाता है। किसी देश (स्थान)-विशेषका अवलम्बनकर |
| देशावस्थितिमालम्ब्य बुद्धेर्या वृत्तिसंततिः ।<br>वृत्त्यन्तरैरसंमृष्टा तद्ध्यानं सूरयो विदुः ॥ ४० ॥ | उसमें बुद्धिकी जो एकतान वृत्ति बनी रहती है और दूसरी वृत्तियोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है, उसे |
| एकाकारः समाधिः स्याद् देशालम्बनवर्जितः ।<br>प्रत्ययो ह्यर्थमात्रेण योगसाधनमुत्तमम् ॥ ४१ ॥ | विद्वानोंने ध्यान कहा है। किसी देश या अन्य आलम्बनसे रहित चित्तकी एकाकारता समाधि है। इसमें ध्येयमात्रका भान होता है। यह योगका उत्तम साधन है। बारह |
| धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणाः ।<br>ध्यानं द्वादशकं यावत् समाधिरभिधीयते ॥ ४२ ॥ | प्राणायामपर्यन्त धारणा, बारह धारणापर्यन्त ध्यान और बारह ध्यानपर्यन्त समाधि कही जाती है ॥ ३७-४२ ॥ |
| आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा ।<br>साधनानां च सर्वेषामेतत्साधनमुत्तमम् ॥ ४३ ॥ | स्वस्तिकासन, पद्मासन तथा अर्धासन-भेदसे आसन (तीन प्रकारका) कहा गया है। सभी साधनोंमें यह साधन उत्तम है। विप्रेन्द्रो ! अपने दोनों ऊरुओंके ऊपर |
| ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्राः कृत्वा पादतले उभे ।<br>समासीतात्मनः पद्ममेतदासनमुत्तमम् ॥ ४४ ॥ | दोनों पादतलोंको रखकर बैठनेको उत्तम पद्म नामक आसन कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो ! एक पैरको दूसरे |
| एकं पादमथैकस्मिन् विन्यस्योरुणि सत्तमाः ।<br>आसीतार्धासनमिदं योगसाधनमुत्तमम् ॥ ४५ ॥ | जाँघके ऊपर रखकर बैठनेको अर्धासन कहा जाता है। यह योगका उत्तम साधन है। दोनों पैरोंको जानुओं |
| उभे कृत्वा पादतले जानूर्वोरन्तरेण हि ।<br>समासीतात्मनः प्रोक्तमासनं स्वस्तिकं परम् ॥ ४६ ॥ | एवं ऊरुओंके भीतर करके बैठनेको श्रेष्ठ स्वस्तिक नामक आसन कहा जाता है ॥ ४३-४६ ॥ |
| अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते ।<br>अग्न्यभ्याशे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा ॥ ४७ ॥ | विपरीत देश (स्थान) और विपरीत कालमें योगतत्त्वका दर्शन भी नहीं होता। अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरके मध्य, जन्तुओंसे भरे स्थानमें, श्मशानमें, |
| जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे ।<br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसंचये ॥ ४८ ॥ | पुराने गोष्ठमें, चौराहेमें, कोलाहल और भययुक्त स्थानमें, चैत्यके समीप, दीमकोंसे पूर्ण स्थान, अशुभ |
| अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते ।<br>नाचरेद् देहबाधे वा दौर्मनस्यादिसम्भवे ॥ ४९ ॥ | स्थान, दुर्जनोंसे व्याप्त और मच्छर आदिसे भरे स्थान तथा देह-सम्बन्धी कष्ट और मनकी अस्वस्थताकी दशामें योग-साधन नहीं करना चाहिये। अच्छी प्रकार |
| सुगुप्ते सुशुभे देशे गुहायां पर्वतस्य तु ।<br>नद्यास्तीरे पुण्यदेशे देवतायतने तथा ॥ ५० ॥ | रक्षित, शुभ स्थान, पर्वतकी गुफा, नदीके किनारे, पुण्यदेश, देवमन्दिर, घर, शुभ, रमणीय, जनशून्य, |
| गृहे वा सुशुभे रम्ये विजने जन्तुवर्जिते ।<br>युञ्जीत योगी सततमात्मानं मत्परायणः ॥ ५१ ॥ | जन्तुओंसे रहित स्थानोंमें योगीको सतत अपनेको मेरे परायण रखते हुए योग-साधना करनी चाहिये। |
| नमस्कृत्य तु योगीन्द्रान् सशिष्यांश्च विनायकम् ।<br>गुरुं चैवाथ मां योगी युञ्जीत सुसमाहितः ॥ ५२ ॥ | योगीको चाहिये कि वह शिष्योंसहित श्रेष्ठ योगियों, विनायक, गुरु तथा मुझे प्रणाम करके समाहित-मन होकर योग-साधना करे ॥ ४७-५२ ॥ |