संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२९० * कूर्मपुराण *
| आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धमथापि वा।<br>नासिकाग्रे समां दृष्टिमीषदन्मीलितेक्षणः॥ ५३॥<br><br>कृत्वाथ निर्भयः शान्तस्त्यक्त्वा मायामयं जगत्।<br>स्वात्मन्यवस्थितं देवं चिन्तयेत् परमेश्वरम्॥ ५४॥ | स्वस्तिक, पद्म अथवा अर्धासन बाँधकर नासिकाके अग्रभागमें कुछ-कुछ खुली हुई आँखोंसे दृष्टिको स्थिर करके निर्भय तथा शान्त होकर मायामय संसार (-के चिन्तन)-का परित्यागकर अपने आत्मामें स्थित परमेश्वर देवका चिन्तन करना चाहिये॥ ५३-५४॥ |
| शिखाग्रे द्वादशाङ्गुल्ये कल्पयित्वाथ पङ्कजम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ५५॥<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>चिन्तयेत् परमं कोशं कर्णिकायां हिरण्मयम्॥ ५६॥<br><br>सर्वशक्तिमयं साक्षाद् यं प्राहुर्दिव्यमव्ययम्।<br>ओंकारवाच्यमव्यक्तं रश्मिजालसमाकुलम्॥ ५७॥<br><br>चिन्तयेत् तत्र विमलं परं ज्योतिर्यदक्षरम्।<br>तस्मिन् ज्योतिषि विन्यस्य स्वात्मानं तदभेदतः॥ ५८॥<br><br>ध्यायीताकाशमध्यस्थमीशं परमकारणम्।<br>तदात्मा सर्वगो भूत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥ ५९॥ | शिखाके अग्रभागमें बारह अंगुलके प्रदेशमें धर्मस्वरूप कन्दसे प्रादुर्भूत, ज्ञानरूप नालवाले, ऐश्वर्यरूप आठ दलोंवाले, वैराग्यरूपी कर्णिकासे युक्त अत्यन्त श्वेत एवं सुन्दर कमलकी कल्पना करे और उस कमलकी कर्णिकामें हिरण्मय श्रेष्ठ कोशका ध्यान करे। उस (कोश)-में विशुद्ध अविनाशी साक्षात् परम ज्योतिका ध्यान करे, जिसे सर्वशक्तिसम्पन्न, दिव्य, अव्यय, ओंकारसे वाच्य, अव्यक्त और प्रकाशकी किरण-मालाओंसे व्यास कहा गया है। उस ज्योतिमें अपने आत्माकी अभेदभावना कर आकाशके मध्यमें स्थित परम कारणस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करे और परमेश्वररूप एवं सर्वव्यापी होकर किसी भी अन्य वस्तुका चिन्तन न करे॥ ५५-५९॥ |
| एतद् गुह्यतमं ध्यानं ध्यानान्तरमथोच्यते।<br>चिन्तयित्वा तु पूर्वोक्तं हृदये पद्ममुत्तमम्॥ ६०॥<br><br>आत्मानमथ कर्तारं तत्रानलसमत्विषम्।<br>मध्ये वह्निशिखाकारं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥ ६१॥<br><br>चिन्तयेत् परमात्मानं तन्मध्ये गगनं परम्।<br>ओंकारबोधितं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्॥ ६२॥ | यह अत्यन्त गुह्य ध्यान है। अब दूसरा ध्यान कहा जाता है। अपने हृदयदेशमें पूर्वमें कहे गये उत्तम कमलका चिन्तनकर उस कमलमें अग्निके समान तेजस्वी, कर्तारूप, पचीसवें तत्त्व पुरुषात्मक परमात्मरूप आत्माका चिन्तन करना चाहिये। उस परमात्माके भीतर परम आकाश (अवकाश) है (क्योंकि परमेश्वर विभु विराट् हैं)। ओंकारसे बोधित सनातन तत्त्व अच्युत शिव कहलाता है॥ ६०-६२॥ |
| अव्यक्तं प्रकृतौ लीनं परं ज्योतिरनुत्तमम्।<br>तदन्तः परमं तत्त्वमात्माधारं निरञ्जनम्॥ ६३॥<br><br>ध्यायीत तन्मयो नित्यमेकरूपं महेश्वरम्।<br>विशोध्य सर्वतत्त्वानि प्रणवेनाथवा पुनः॥ ६४॥<br><br>संस्थाप्य मयि चात्मानं निर्मले परमे पदे।<br>प्लावयित्वात्मनो देहं तेनैव ज्ञानवारिणा॥ ६५॥<br><br>मदात्मा मन्मयो भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>तेनोद्धृत्य तु सर्वाङ्गमग्निरित्यादिमन्त्रतः।<br>चिन्तयेत् स्वात्मनीशानं परं ज्योतिःस्वरूपिणम्॥ ६६॥ | उसके भीतर अव्यक्त, प्रकृतिमें लीन, उत्तम परम ज्योति, परम तत्त्व, आत्माधार, निरञ्जन, नित्य, एकरूप महेश्वरका तन्मय होकर ध्यान करना चाहिये। अथवा प्रणवके द्वारा पुनः सभी तत्त्वोंका शोधनकर विशुद्ध परमपदरूप मुझमें अपने आत्माको स्थापित करे और उसी ज्ञानरूपी जलसे अपनी देहको आप्लावित करके मुझमें चित्त आसक्त करे तथा मेरे परायण होकर अग्निहोत्रका भस्म ग्रहण करे और 'अग्नि०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा भस्मसे अपने सम्पूर्ण शरीरको उपलिप्त कर अपने आत्मामें परम ज्योतिस्वरूप ईशानका चिन्तन करे॥ ६३-६६॥ |