संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय ११ * २९१
| एष पाशुपतो योगः पशुपाशविमुक्तये।<br>सर्ववेदान्तसारोऽयमत्याश्रममिति श्रुतिः॥ ६७॥<br><br>एतत् परतरं गुह्यं मत्सायज्योपपादकम्।<br>द्विजातीनां तु कथितं भक्तानां ब्रह्मचारिणाम्॥ ६८॥<br><br>ब्रह्मचर्यमहिंसा च क्षमा शौचं तपो दमः।<br>संतोषः सत्यमास्तिक्यं व्रताङ्गानि विशेषतः॥ ६९॥<br><br>एकेनाप्यथ हीनेन व्रतमस्य तु लुप्यते।<br>तस्मादात्मगुणोपेतो मद्व्रतं वोढुमर्हति॥ ७०॥ | जीवको बन्धनरूप पाशसे मुक्त करनेके लिये यह पाशुपत नामक योग कहा गया है। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है और श्रुतिमें इस योगकी अवस्थाको सभी आश्रमोंकी अवस्थासे अतीत अवस्था (उत्कृष्ट अवस्था) बतलाया गया है। इसे अत्यन्त गुह्य और द्विजातियों, भक्तों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये मेरा सायुज्य प्रदान करनेवाला कहा गया है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, क्षमा, शौच, तप, दम, संतोष, सत्य तथा आस्तिकता—ये सभी (इस पाशुपत) व्रतके विशेष अङ्ग हैं। इनमेंसे एक (अङ्ग)-के भी न होनेसे इस (योग)-का व्रत लुप्त हो जाता है। इसलिये इन आत्मगुणों (ब्रह्मचर्य, अहिंसा आदि नौ व्रतके अङ्गों)-से युक्त साधक ही मेरा (पाशुपत) व्रत धारण कर सकता है॥ ६७-७०॥ |
| वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।<br>बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः॥ ७१॥<br><br>ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।<br>ज्ञानयोगेन मां तस्माद् यजेत परमेश्वरम्॥ ७२॥<br><br>अथवा भक्तियोगेन वैराग्येण परेण तु।<br>चेतसा बोधयुक्तेन पूजयेन्मां सदा शुचिः॥ ७३॥<br><br>सर्वकर्माणि संन्यस्य भिक्षाशी निष्परिग्रहः।<br>प्राप्नोति मम सायुज्यं गुह्यमेतन्मयोदितम्॥ ७४॥ | राग, भय और क्रोधसे रहित, मत्परायण और मेरे आश्रित अनेक लोग इस (पाशुपत) योगके द्वारा मेरा भाव प्राप्तकर पवित्र हो गये हैं। जो जिस प्रकार मेरे पास आते हैं, मैं भी उसी प्रकार उन्हें स्वीकार करता हूँ। इसलिये ज्ञानयोगके द्वारा मुझ परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। अथवा भक्तियोग, परम वैराग्य एवं ज्ञानयुक्त चित्तके द्वारा पवित्रतापूर्वक सदा मेरा पूजन करना चाहिये। सभी कर्मोंका परित्यागकर, भिक्षाका अन्न ग्रहण करते हुए अन्य कुछ भी संग्रह न करते हुए (साधना करनेवाला) साधक मेरा सायुज्य (नामक मोक्ष) प्राप्त करता है। यह मैंने गुह्य बात बतलायी॥ ७१-७४॥ |
| अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।<br>निर्ममो निरहंकारो यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ७५॥<br><br>संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।<br>मय्यर्पितमनो बुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ७६॥<br><br>यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।<br>हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स हि मे प्रियः॥ ७७॥ | जो सभी प्राणियोंसे द्वेष न करनेवाला, मित्रता करनेवाला, करुणायुक्त, ममतारहित और अहंकारसे रहित है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जो संतुष्ट रहनेवाला, निरन्तर योग-साधना करनेवाला, संयमित-चित्त, दृढ़निश्चयी और मुझमें मन तथा बुद्धि अर्पण करनेवाला है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जिससे किसी भी प्राणीको उद्वेग प्राप्त नहीं होता और किसी भी प्राणीसे जो उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे होनेवाले उद्वेगोंसे रहित है, वह मुझे प्रिय है॥ ७५-७७॥ |