भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९२ * कूर्मपुराण *


अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।<br>सर्वारम्भपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥ ७८॥<br><br>तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित्।<br>अनिकेतः स्थिरमतिर्मद्भक्तो मामुपैष्यति॥ ७९॥<br><br>सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मत्परायणः।<br>मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं परमं पदम्॥ ८०॥जो किसी भी प्रकारकी अपेक्षा न रखनेवाला, पवित्र, कुशल (वेदशास्त्र-निषिद्धके त्यागमें सावधान) पक्षपातसे (शत्रु-मित्रभावसे) रहित, दुःखसे आक्रान्त होनेपर भी व्यथाका अनुभव न करनेवाला और सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग करनेवाला है, वह भक्तियुक्त पुरुष मेरा प्रिय है। जो निन्दा एवं स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस किसी भी पदार्थसे संतुष्ट रहनेवाला, गृहसे (गृहासक्तिसे) रहित है, वह स्थिर बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्राप्त करता है। मुझमें परायण रहनेवाला सभी कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत परमपद प्राप्त करता है॥ ७८–८०॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।<br>निराशीर्निर्ममो भूत्वा मामेकं शरणं व्रजेत्॥ ८१॥<br><br>त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।<br>कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव तेन निबध्यते॥ ८२॥<br><br>निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।<br>शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति तत्पदम्॥ ८३॥चित्तसे सभी कर्मोंको मुझमें अर्पितकर मत्परायण होते हुए आशा एवं ममताकी आसक्तिसे रहित होकर एकमात्र मेरी ही शरण ग्रहण करना चाहिये। कर्मफलकी आसक्तिका सर्वथा परित्यागकर नित्य संतुष्ट और (अन्य) आश्रयरहित (एकमात्र परमेश्वरको ही आश्रय समझनेवाला) व्यक्ति कर्मोंमें प्रवृत्त होते हुए भी उन कर्मोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। आशारहित, संयमित चित्तवाला, सब प्रकारके परिग्रहों (संचयों)-का परित्याग-कर केवल शरीर (रक्षा)-के निमित्त कर्म करते हुए भी (व्यक्ति) उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है॥ ८१–८३॥
यदृच्छालाभतुष्टस्य द्वन्द्वातीतास्य चैव हि।<br>कुर्वतो मत्प्रसादार्थं कर्म संसारनाशनम्॥ ८४॥<br><br>मन्मना मन्नमस्कारो मद्याजी मत्परायणः।<br>मामुपैष्यति योगीशं ज्ञात्वा मां परमेश्वरम्॥ ८५॥<br><br>मद्बुद्धयो मां सततं बोधयन्तः परस्परम्।<br>कथयन्तश्च मां नित्यं मम सायुज्यमाप्नुयुः॥ ८६॥<br><br>एवं नित्याभियुक्तानां मायेयं कर्मसान्वगम्।<br>नाशयामि तमः कृत्स्नं ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ८७॥अनायास जो उपलब्ध हो उसीमें संतुष्ट रहनेवाले और सभी प्रकारके सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित रहनेवाले पुरुषके द्वारा केवल मेरी प्रसन्नताके लिये किये गये कर्म संसार (रूपी बन्धन)-का विनाश करनेवाले हैं। मुझमें मन लगानेवाला, मुझे नमस्कार करनेवाला, मेरा पूजन करनेवाला और मुझे ही अपना परम अयन (आश्रय) समझनेवाला (योगी) मुझ योगके ईश परमेश्वरको जानकर मुझे प्राप्त कर लेता है। मुझमें बुद्धि रखनेवाले (साधक) सतत परस्पर मेरा बोध कराते हुए और नित्य मेरा वर्णन करते हुए मेरा सायुज्य प्राप्त करते हैं। इस प्रकार नित्य योगयुक्त पुरुषके माया (अज्ञान)-से उत्पन्न तथा उनसे भी उत्पन्न कर्मरूप समस्त अन्धकारका प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं नाश कर देता हूँ॥ ८४–८७॥