भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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  • अध्याय ११ * । २९३
मद्बुद्धयो मां सततं पूजयन्तीह ये जनाः।<br>तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ ८८॥<br><br>येऽन्ये च कामभोगार्थं यजन्ते ह्यान्यदेवताः।<br>तेषां तदन्तं विज्ञेयं देवतानुगतं फलम्॥ ८९॥<br><br>ये चान्यदेवताभक्ताः पूजयन्तीह देवताः।<br>मद्भावनासमायुक्ता मुच्यन्ते तेऽपि भावतः॥ ९०॥<br><br>तस्मादनीश्वरानन्यांस्त्यक्त्वा देवानशेषतः।<br>मामेव संश्रयेदीशं स याति परमं पदम्॥ ९१॥<br>त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निःशोको निष्परिग्रहः।<br>यजेच्चामरणालिङ्गे विरक्तः परमेश्वरम्॥ ९२॥<br><br>येऽर्चयन्ति सदा लिङ्गं त्यक्त्वा भोगानशेषतः।<br>एकेन जन्मना तेषां ददामि परमैश्वरम्॥ ९३॥<br><br>परानन्दात्मकं लिङ्गं केवलं सन्निराञ्जनम्।<br>ज्ञानात्मकं सर्वगतं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ ९४॥<br>ये चान्ये नियता भक्तो भावयित्वा विधानतः।<br>यत्र क्वचन तल्लिङ्गमर्चयन्ति महेश्वरम्॥ ९५॥<br><br>जले वा वह्निमध्ये वा व्योम्नि सूर्येऽथ वान्यतः।<br>रत्नादौ भावयित्वेशमर्चयेल्लिङ्गमेश्वरम्॥ ९६॥<br><br>सर्वं लिङ्गमयं ह्येतत् सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।<br>तस्माल्लिङ्गेऽर्चयेदीशं यत्र क्वचन शाश्वतम्॥ ९७॥मुझमें बुद्धि लगानेवाले जो मनुष्य सतत मेरी पूजा करते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंके योग-क्षेमका मैं निर्वाह करता हूँ और जो दूसरे लोग अभिलषित विषयोंके उपभोगके लिये ही भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं, उनका अन्त विषयभोगतक ही समझना चाहिये, क्योंकि देवताके अनुसार ही फल भी होता है¹। जो दूसरे देवोंके भक्त हैं, वे यदि मेरी भावनासे युक्त होकर (दूसरे)देवताओंकी पूजा करते हैं अर्थात् दूसरे देवोंमें मेरी ही भावना करते हैं तो वे भी (मुझमें) भावना करनेके कारण मुक्त हो जाते हैं। अतएव समस्त अनीश्वर² देवताओंका परित्यागकर जो मुझ ईशका ही आश्रय ग्रहण करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है॥ ८८-९१॥<br><br>पुत्र (स्त्री, गृह) आदिमें आसक्तिका परित्यागकर और शोकरहित होकर तथा अपरिग्रही होकर विरक्त पुरुषको मृत्युपर्यन्त (शिव-) लिङ्गमें परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। जो सम्पूर्ण भोगोंका परित्यागकर सर्वदा लिङ्गका पूजन करते रहते हैं, उन्हें मैं एक जन्ममें ही परम ऐश्वर-पद (मोक्ष) प्रदान करता हूँ। परम आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, सद्रूप, निरञ्जन, ज्ञानात्मक और सर्वत्र व्याप्त (शिव-) लिङ्ग योगियोंके हृदय-प्रदेशमें अवस्थित रहता है॥ ९२-९४॥<br><br>नियमपूर्वक भक्ति करनेवाले दूसरे लोग विधि-पूर्वक जहाँ-कहीं भी (शिवलिङ्गकी) भावना करते हुए उस महेश्वर-लिङ्गकी अर्चना करते हैं। जलमें, अग्निके मध्यमें, आकाशमें, सूर्यमें, रत्न आदिमें अथवा अन्यत्र कहीं भी ईशकी भावना करके लिङ्गरूप ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये। यह सब कुछ लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतएव जहाँ-कहीं भी लिङ्गरूपमें शाश्वत ईशका अर्चन करना चाहिये॥ ९५-९७॥

१-देवताके अनुसार फलका तात्पर्य यह है कि जैसी भावनासे देवताकी आराधना की जाती है, वैसी भावनाके अनुसार ही देवता फल देते हैं, जिस रूपमें हम देवताको समझेंगे, उसी रूपमें देवता हमें लाभ देंगे। तत्-तत् फलोंके अधिष्ठाता रूपमें ही देवताकी आराधना करनेपर फलमात्र देकर देवता विरत हो जाते हैं।
२-एक ही देवता पूजककी दृष्टिमें तबतक अनीश्वर है, जबतक पूजक उसे किसी तुच्छ फलका अधिष्ठाता मात्र समझता है। यदि उसी देवताको परमेश्वरके भावसे निष्काम होकर पूर्ण समर्पण-भावके साथ पूजा जाय तो वह देवता अनीश्वर नहीं है, सर्वथा सेवनीय है।

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