भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९४ * कूर्मपुराण *


अग्नौ क्रियावतामप्सु व्योम्नि सूर्ये मनीषिणाम् ।<br>काष्ठादिष्वेव मूर्खाणां हृदि लिङ्गं तु योगिनाम् ॥ ९८ ॥<br><br>यद्यनुत्पन्नविज्ञानो विरक्तः प्रीतिसंयुतः ।<br>यावज्जीवं जपेद् युक्तः प्रणवं ब्रह्मणो वपुः ॥ ९९ ॥<br><br>अथवा शतरुद्रीयं जपेदामरणाद् द्विजः ।<br>एकाकी यतचित्तात्मा स याति परमं पदम् ॥ १०० ॥<br><br>वसेद् वामरणाद् विप्रो वाराणस्यां समाहितः ।<br>सोऽपीश्वरप्रसादेन याति तत् परमं पदम् ॥ १०१ ॥<br><br>तत्रोत्क्रमणकाले हि सर्वेषामेव देहिनाम् ।<br>ददाति तत् परं ज्ञानं येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १०२ ॥<br><br>वर्णाश्रमविधिं कृत्स्नं कुर्वाणो मत्परायणः ।<br>तेनैव जन्मना ज्ञानं लब्ध्वा याति शिवं पदम् ॥ १०३ ॥<br><br>येऽपि तत्र वसन्तीह नीचा वा पापयोनयः ।<br>सर्वे तरन्ति संसारमीश्वरानुग्रहाद् द्विजाः ॥ १०४ ॥<br><br>किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसाम् ।<br>धर्मं समाश्रयेत् तस्मान्मुक्तये नियतं द्विजाः ॥ १०५ ॥<br><br>एतद् रहस्यं वेदानां न देयं यस्य कस्यचित् ।<br>धार्मिकायैव दातव्यं भक्ताय ब्रह्मचारिणे ॥ १०६ ॥<br><br>व्यास उवाच<br>इत्येतदुक्त्वा भगवानात्मयोगमनुत्तमम् ।<br>व्याजहार समासीनं नारायणमनामयम् ॥ १०७ ॥क्रियाशीलोंका^१ (लिङ्ग) अग्निमें, मनीषियोंका^२ जल, आकाश और सूर्यमें, अज्ञानियोंका^३ काष्ठ आदिमें और योगियोंका^४ लिङ्ग हृदयमें स्थित रहता है। यदि (ब्रह्म) विज्ञान उत्पन्न न हुआ हो तो विरक्त होकर (द्विजको) अत्यन्त प्रीतिसे ब्रह्मके प्रणवरूपी शरीरका यावज्जीवन जप करते हुए रहना चाहिये। अथवा एकाकी एवं संयत-चित्तवाले द्विजको मरणपर्यन्त शतरुद्रियका जप करना चाहिये, इससे उसे परम पद प्राप्त होता है। अथवा विप्रको^५ चाहिये कि मरणपर्यन्त समाहितचित्त होकर वाराणसीमें निवास करे। वह भी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे उत्कृष्ट परमपदको प्राप्त करता है। वहाँ (वाराणसीमें) सभी प्राणियोंको उनके प्राण निकलते समय (भगवान् शंकर) उस परम ज्ञानको प्रदान करते हैं, जिससे वे (पुनर्जन्मके) बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ९८-१०२ ॥<br><br>सम्पूर्ण वर्णाश्रम-विधिका पालन करते हुए मेरे परायण रहनेवाला अपने उसी जन्ममें (जिस जन्ममें वर्णाश्रम-धर्मका पालन कर रहा है) ज्ञान प्राप्तकर शिवपदको प्राप्त करता है। द्विजो! नीच अथवा पापयोनिवाले भी जो प्राणी वहाँ (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे सभी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे संसारको पार कर लेते हैं, किंतु जो पापाक्रान्त चित्तवाले हैं, उन्हें बहुत विघ्न होते हैं। इसलिये द्विजो! मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। यह वेदोंका रहस्य है, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये। धार्मिक तथा ब्रह्मचारी भक्तको ही प्रदान करना चाहिये ॥ १०३-१०६ ॥<br><br>व्यासजी बोले— इस प्रकार उत्तम आत्मयोगका वर्णन करके भगवान् (शंकर)-ने वहीं बैठे हुए प्रसन्नचित्त नारायणसे कहा— ॥ १०७ ॥

१-'क्रियाशील' से उन द्विजोंको समझना चाहिये जो श्रौत-स्मार्त क्रियाओंमें दत्तचित्त हैं। इनका प्रमुख आराध्य अग्नि होता है।
२-'मनीषी' से उन्हें समझना चाहिये जो यथाविधि श्रौत-स्मार्त क्रियाओंके अनुष्ठानसे शुद्धान्तःकरण होकर ब्रह्मनिष्ठाकी ओर अग्रसर हैं।
३-'अज्ञानी' शब्दसे उन्हें समझना चाहिये जो वेद-शास्त्रके प्रति निष्ठावान् हैं, पर ऐहलौकिक विविध ऐश्वर्योंके प्रति आसक्त हैं, इन्हें प्राप्त करनेके लिये उत्कण्ठित हैं।
४-'योगी' शब्दसे ब्रह्मनिष्ठको समझना चाहिये। ब्रह्मनिष्ठ होनेके पूर्व संयत एवं एकाग्रचित्त अनासक्त साधककी एक भूमिका होती है। इस भूमिकाके लोग भी यहाँ 'योगी' समझे जा सकते हैं।
५-सर्वप्रमुख होनेसे यहाँ 'विप्र' मात्रका उल्लेख है। यह 'विप्र' शब्द प्राणिमात्रका उपलक्षक है।