भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ११ *२९५
मयैतद् भाषितं ज्ञानं हितार्थं ब्रह्मवादिनाम्।<br>दातव्यं शान्तचित्तेभ्यः शिष्येभ्यो भवता शिवम्॥ १०८॥<br><br>उक्त्वैवमथ योगीन्द्रानब्रवीद् भगवानजः।<br>हिताय सर्वभक्तानां द्विजातीनां द्विजोत्तमाः॥ १०९॥<br><br>भवन्तोऽपि हि मज्ज्ञानं शिष्याणां विधिपूर्वकम्।<br>उपदेक्ष्यन्ति भक्तानां सर्वेषां वचनान्मम॥ ११०॥मैंने ब्रह्मवादियोंके कल्याणार्थ इस ज्ञानको कहा है। आप इस कल्याणकारी ज्ञानको शान्तचित्त शिष्योंको प्रदान करें। अजन्मा भगवान् (शंकर)-ने ऐसा कहनेके उपरान्त श्रेष्ठ योगियोंसे कहा—द्विजोत्तमो! सभी द्विजाति भक्तोंके कल्याणके लिये आप लोग भी मेरे कहनेसे सभी भक्त शिष्योंको मेरे ज्ञानका विधिपूर्वक उपदेश करें॥ १०८—११०॥
अयं नारायणो योऽहमीश्वरो नात्र संशयः।<br>नान्तरं ये प्रपश्यन्ति तेषां देयमिदं परम्॥ १११॥<br><br>ममैषा परमा मूर्तिर्नारायणसमाह्वया।<br>सर्वभूतात्मभूतस्था शान्ता चाक्षरसंज्ञिता॥ ११२॥<br><br>ये त्वन्यथा प्रपश्यन्ति लोके भेददृशो जनाः।<br>न ते मां सम्प्रपश्यन्ति जायन्ते च पुनः पुनः॥ ११३॥<br><br>ये त्विमं विष्णुमव्यक्तं मां वा देवं महेश्वरम्।<br>एकीभावेन पश्यन्ति न तेषां पुनरुद्भवः॥ ११४॥<br><br>तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम्।<br>मामेव सम्प्रपश्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि॥ ११५॥जो ये नारायण हैं, वह मैं ईश्वर ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है। जो (हम दोनोंमें) कोई भेद नहीं देखता, उसीको यह परम (ज्ञान) देना चाहिये। नारायण नामवाली तथा शान्त अक्षर-संज्ञक मेरी यह परम मूर्ति सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित है। लोकमें जो भेददृष्टिवाले लोग इसके विपरीत समझते हैं, वे मेरा दर्शन नहीं करते हैं और बार-बार (संसारमें) जन्म लेते हैं। जो इन अव्यक्त विष्णु अथवा मुझ देव महेश्वरको एकीभावसे देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिये अनादिनिधन (आदि और अन्तसे रहित) आत्मरूप अव्यय विष्णु मुझे ही समझो और फिर वैसे ही पूजा भी करो॥ १११—११५॥
येऽन्यथा मां प्रपश्यन्ति मत्वेमं देवतान्तरम्।<br>ते यान्ति नरकान् घोरान् नाहं तेषु व्यवस्थितः॥ ११६॥<br><br>मूर्खं वा पण्डितं वापि ब्राह्मणं वा मदाश्रयम्।<br>मोचयामि श्वपाकं वा न नारायणनिन्दकम्॥ ११७॥<br><br>तस्मादेष महायोगी मद्द्भक्तैः पुरुषोत्तमः।<br>अर्चनीयो नमस्कार्यो मत्प्रीतिजननाय हि॥ ११८॥जो लोग इन (विष्णु)-को दूसरा देवता मानकर मुझे दूसरा देवता समझकर देखते हैं, वे घोर नरकोंमें जाते हैं, मैं उनमें स्थित नहीं रहता हूँ। मूर्ख हो, पण्डित हो, ब्राह्मण हो अथवा चाण्डाल हो, मेरे आश्रित रहनेवाले (प्रत्येक)-को मैं मुक्त कर देता हूँ, किंतु जो नारायणकी निन्दा करनेवाला है, उसे मैं मुक्त नहीं करता। इसीलिये मेरे भक्त मुझमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये इन महायोगी पुरुषोत्तमकी अर्चना अवश्य करें और इन्हें नमस्कार अवश्य करें॥ ११६—११८॥
एवमुक्त्वा समालिङ्ग्य वासुदेवं पिनाकधृक्।<br>अन्तर्हितोऽभवत् तेषां सर्वेषामेव पश्यताम्॥ ११९॥<br><br>नारायणोऽपि भगवांस्तापसं वेषमुत्तमम्।<br>जग्राह योगिनः सर्वांस्त्यक्त्वा वै परमं वपुः॥ १२०॥ऐसा कहकर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर वासुदेवका आलिंगन करके उन सभीके देखते-देखते अन्तर्हित हो गये। भगवान् नारायणने भी अपने पारमार्थिक विग्रहका त्यागकर उत्तम तपस्वीका वेष धारण किया और सभी योगियोंसे कहा—॥ ११९—१२०॥
ज्ञातं भवद्भिरमलं प्रसादात् परमेष्ठिनः।<br>साक्षादेव महेशस्य ज्ञानं संसारनाशनम्॥ १२१॥<br><br>गच्छध्वं विज्वराः सर्वे विज्ञानं परमेष्ठिनः।<br>प्रवर्तयध्वं शिष्येभ्यो धार्मिकेभ्यो मुनीश्वराः॥ १२२॥आप लोगोंने परमेष्ठी (महेश्वर)-की कृपासे संसार (बन्धन)-को नष्ट करनेवाला उन्हीं साक्षात् महेशका निर्मल ज्ञान प्राप्त किया है। इसलिये मुनीश्वरो! विगतज्वर होकर आप सभी जायें और धार्मिक शिष्योंमें परमेष्ठीके ज्ञानको प्रवर्तित करें॥ १२१-१२२॥