संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२९६ * कूर्मपुराण *
| इदं भक्ताय शान्ताय धार्मिकायाहिताग्नये ।<br>विज्ञानमैश्वरं देयं ब्राह्मणाय विशेषतः ॥ १२३ ॥ | इस ईश्वर-सम्बन्धी विशिष्ट ज्ञानको विशेष रूपसे शान्त भक्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्री ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा कहकर योगियोंमें परम श्रेष्ठ वे महायोगी विश्वात्मा नारायण स्वयं अन्तर्हित हो गये ॥ १२३-१२४ ॥ |
| एवमुक्त्वा स विश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ।<br>नारायणो महायोगी जगामादर्शनं स्वयं ॥ १२४ ॥ | |
| तेऽपि देवादिदेवेशं नमस्कृत्य महेश्वरम् ।<br>नारायणं च भूतादिं स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥ १२५ ॥ | वे (मुनिगण) भी देवोंके आदिदेवेश्वर महेश्वरको और भूतादि (समस्त प्रपञ्चके मूलकारण) नारायणको नमस्कार कर अपने स्थानोंकी ओर चले गये। महामुनि भगवान् सनत्कुमारने संवर्तको ईश्वरीय ज्ञान (शिवज्ञानका उपदेश) प्रदान किया। उन्होंने भी (वह ज्ञान) सत्यव्रतको दिया। योगीन्द्र सनन्दनने महर्षि पुलहको और प्रजापति पुलहने गौतमको ईश्वरीय ज्ञान प्रदान किया। अङ्गिराने वेदोंके ज्ञाता भरद्वाजको और कपिलने जैगीषव्य तथा पञ्चशिखको (वह ज्ञान) दिया। सभी तत्त्वोंके द्रष्टा मेरे पिता पराशरने भी वह परम ज्ञान सनकसे प्राप्त किया और उनसे वाल्मीकिने प्राप्त किया। प्राचीन कालमें अर्धनारीश्वर भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न महायोगी वामदेवजीने मुझसे कहा, जो साक्षात् पिनाकधारी रुद्रस्वरूप हैं ॥ १२५-१३० ॥ |
| सनत्कुमारो भगवान् संवर्ताय महामुनिः ।<br>दत्तवानैश्वरं ज्ञानं सोऽपि सत्यव्रताय तु ॥ १२६ ॥ | |
| सनन्दनोऽपि योगीन्द्रः पुलहाय महर्षये ।<br>प्रददौ गौतमायाथ पुलहोऽपि प्रजापतिः ॥ १२७ ॥ | |
| अङ्गिरा वेदविदुषे भरद्वाजाय दत्तवान् ।<br>जैगीषव्याय कपिलस्तथा पञ्चशिखाय च ॥ १२८ ॥ | |
| पराशरोऽपि सनकात् पिता मे सर्वतत्त्वदृक् ।<br>लेभे तत्परमं ज्ञानं तस्माद् वाल्मीकिराप्तवान् ॥ १२९ ॥ | |
| मामुवाच पुरा देवः सतीदेहभवाङ्गजः ।<br>वामदेवो महायोगी रुद्रः किल पिनाकधृक् ॥ १३० ॥ | |
| नारायणोऽपि भगवान् देवकीतनयो हरिः ।<br>अर्जुनाय स्वयं साक्षात् दत्तवानिदमुत्तमम् ॥ १३१ ॥ | देवकीके पुत्र हरि भगवान् नारायणने भी स्वयं साक्षात् अर्जुनको यह उत्तम ज्ञान प्रदान किया। जब मैंने वामदेव रुद्रसे इस श्रेष्ठ ज्ञानको प्राप्त किया, तभीसे मेरी गिरिशमें विशेष भक्ति हो गयी। मैंने शरणागतोंके रक्षक, शरण (प्राणिमात्रके आश्रय), भूतोंके ईश, गिरिश, स्थाणु, देवाधिदेव त्रिशूली रुद्रकी विशेषरूपसे शरण ग्रहण की है। पत्नी तथा पुत्रोंके साथ आप सब लोग भी उन गोवृषवाहन<sup>१</sup>, कल्याणकारी भगवान् शम्भुकी शरणमें जायें। उनकी कृपासे कर्मयोगके द्वारा व्यवहार<sup>२</sup> करें और विभूतिभूषण गोपति (इन्द्रियोंके पति) महादेव शंकरकी पूजा करें ॥ १३१-१३५ ॥ |
| यदहं लब्धवान् रुद्राद् वामदेवाददुत्तमम् ।<br>विशेषाद् गिरिशे भक्तिस्तस्मादारभ्य मेऽभवत् ॥ १३२ ॥ | |
| शरण्यं शरणं रुद्रं प्रपन्नोऽहं विशेषतः ।<br>भूतेशं गिरिशं स्थाणुं देवदेवं त्रिशूलिनम् ॥ १३३ ॥ | |
| भवन्तोऽपि हि तं देवं शम्भुं गोवृषवाहनम् ।<br>प्रपद्यध्वं सपत्नीकाः सपुत्राः शरणं शिवम् ॥ १३४ ॥ | |
| वर्तध्वं तत्प्रसादेन कर्मयोगेन शंकरम् ।<br>पूजयध्वं महादेवं गोपतिं भूतिभूषणम् ॥ १३५ ॥ | |
| एवमुक्तेऽथ मुनयः शौनकाद्या महेश्वरम् ।<br>प्रणेमुः शाश्वतं स्थाणुं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ १३६ ॥ | ऐसा कहे जानेपर उन शौनक आदि (महर्षियों)-ने पुनः शाश्वत स्थाणु सनातन महेश्वर एवं सत्यवतीके पुत्र व्यासको प्रणाम किया और प्रसन्नमन होकर वे सभी लोकोंके महेश्वर, साक्षात् हृषीकेश, प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यास)-से कहने लगे - ॥ १३६-१३७ ॥ |
| अब्रुवन् हृष्टमनसः कृष्णद्वैपायनं प्रभुम् ।<br>साक्षाद्देव हृषीकेशं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ १३७ ॥ |
१- 'गोवृषवाहन' — धर्मस्वरूप, गोजातिके वृषको महेश्वरने अपने वाहनके रूपमें स्वीकार किया है। इसलिये महेश्वरको 'गोवृषवाहन' कहा गया है।
२- 'कर्मयोगके द्वारा व्यवहार' का तात्पर्य है — अनासक्त-भावसे (कर्मफलकी कामनाके बिना) कर्तव्यबुद्धिसे अधिकारानुसार वेदादि शास्त्रोक्त कर्मोंका पालन करना।