संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ११ * २९७
| भवत्प्रसादादचला शरण्ये गोवृषध्वजे ।<br>इदानीं जायते भक्तिर्या देवैरपि दुर्लभा ॥ १३८ ॥<br><br>कथयस्व मुनिश्रेष्ठ कर्मयोगमनुत्तमम् ।<br>येनासौ भगवानीशः समाराध्यो मुमुक्षुभिः ॥ १३९ ॥<br><br>त्वत्संनिधावेष सूतः शृणोतु भगवद्वचः ।<br>तद्गदाखिललोकानां रक्षणं धर्मसंग्रहम् ॥ १४० ॥<br><br>यदुक्तं देवदेवेन विष्णुना कूर्मरूपिणा ।<br>पृष्टेन मुनिभिः पूर्वं शक्रेणामृतमन्थने ॥ १४१ ॥ | (भगवन् !) आपकी ही कृपासे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोवृषध्वज (भगवान् शंकर)-की वह अविचल भक्ति हमें प्राप्त हो गयी है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। मुनिश्रेष्ठ ! आप श्रेष्ठ कर्मयोग हमें बतलायें, जिसके द्वारा मोक्षार्थी लोग इन भगवान् ईशकी आराधना करते हैं*। आप (वेदव्यास)-की संनिधिमें ही श्रीसूतजी भगवान् (महेश्वर)-के वचनोंको सुन लें, जो वचन समस्त लोकोंके रक्षक हैं और जिनमें समस्त धर्मोंका संग्रह हुआ है। अतः इनका वर्णन करें। इसके अतिरिक्त आप वह भी बतायें, जो पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय इन्द्रके द्वारा तथा मुनियोंके द्वारा पूछे जानेपर कूर्मरूपी देवाधिदेव श्रीविष्णुने कहा था (आप उसी कर्मयोगका वर्णन करें) ॥ १३८-१४१ ॥ | | श्रुत्वा सत्यवतीसूनुः कर्मयोगं सनातनम् ।<br>मुनीनां भाषितं कृष्णः प्रोवाच सुसमाहितः ॥ १४२ ॥ | इस प्रकार मुनियोंने जो कहा उसे सुनकर सत्यवतीके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजीने समाहित होकर (मुनियोंको) सनातन कर्मयोग बतलाया ॥ १४२ ॥ | | य इमं पठते नित्यं संवादं कृत्तिवाससः ।<br>सनत्कुमारप्रमुखैः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४३ ॥ | श्रीसनत्कुमार आदि प्रमुख मुनियों एवं भगवान् कृत्तिवासा (शंकर)-के मध्य सम्पन्न इस संवादको जो नित्य पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। | | श्रावयेद् वा द्विजान् शुद्धान् ब्रह्मचर्यपरायणान् ।<br>यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम् ॥ १४४ ॥ | अथवा जो ब्रह्मचर्यपरायण विशुद्ध द्विजोंको इस (संवाद)-को सुनाता है, या जो इस संवादके अर्थका अनुसंधान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है। | | यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः ।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ १४५ ॥ | जो दृढ़व्रती भक्ति-सम्पन्न होकर इस (संवाद)-को नित्य सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होते हुए ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १४३-१४५ ॥ | | तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः ।<br>श्रोतव्यश्चाथ मन्तव्यो विशेषाद् ब्राह्मणैः सदा ॥ १४६ ॥ | इसलिये विद्वानोंको सभी प्रयत्नोंके द्वारा नित्य इसका पठन, श्रवण एवं विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको इसका सदा मनन करना चाहिये ॥ १४६ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
(ईश्वरगीता समाप्त)
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ११ ॥
(ईश्वरगीता समाप्त)
* इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि वेद-शास्त्र-प्रतिपादित अपने कर्मोंका फलासक्तिरहित होकर सविधि अनुष्ठान ईशकी आराधनाका प्रमुख अङ्ग है।