भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 506 में से

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पृष्ठ 308

२९८ * कूर्मपुराण *

बारहवाँ अध्याय

ब्रह्मचारीका धर्म, यज्ञोपवीत आदिके सम्बन्धमें विविध विवरण, अभिवादनकी विधि, माता-पिता एवं गुरुकी महिमा, ब्रह्मचारीके सदाचारका वर्णन

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
शृणुध्वमृषयः सर्वे वक्ष्यमाणं सनातनम्।<br>कर्मयोगं ब्राह्मणानामात्यन्तिकफलप्रदम्॥ १ ॥ऋषियो! आप लोग ब्राह्मणोंको आत्यन्तिक (शाश्वत) फल प्रदान करनेवाले, अभी कहे जा रहे सनातन कर्मयोगको सुनें॥ १ ॥
आम्नायसिद्धमखिलं ब्रह्मणानुप्रदर्शितम्।<br>ऋषीणां शृण्वतां पूर्वं मनुराह प्रजापतिः॥ २ ॥<br><br>सर्वपापहरं पुण्यमृषिभिश्चैर्निषेवितम्।<br>समाहितधियो यूयं शृणुध्वं गदतो मम॥ ३ ॥<br><br>कृतोपनयनो वेदानधीयीत द्विजोत्तमः।<br>गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे स्वसूत्रोक्तविधानतः॥ ४ ॥<br><br>दण्डी च मेखली सूत्री कृष्णाजिनधरो मुनिः।<br>भिक्षाहारो गुरुहितो वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्॥ ५ ॥पूर्वकालमें प्रजापति मनुने सुननेकी इच्छा रखनेवाले ऋषियोंको समस्त वेदोंमें प्रसिद्ध, ब्रह्माद्वारा बतलाये गये, सभी पापोंको दूर करनेवाले तथा पवित्र ऋषि-समूहोंद्वारा सेवित इस सम्पूर्ण कर्मयोगको बतलाया था। मेरे द्वारा कहे जानेवाले इस कर्मयोगको समाहितबुद्धि होकर आप लोग भी सुनें द्विजोत्तमो! गर्भसे आठवें अथवा (जन्मसे) आठवें वर्षकी अवस्थामें अपने-अपने गृह्यसूत्रोक्त विधानके अनुसार यज्ञोपवीत-संस्कारसे युक्त होकर दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत तथा कृष्णमृगचर्म धारणकर मुनिवृत्तिवाले (ब्राह्मण-बालक)-को चाहिये कि वह भिक्षान्न ग्रहण करते हुए, गुरुके हितमें तत्पर रहकर गुरुके समीपमें उनकी ओर देखते हुए वेदोंका अध्ययन करे॥ २–५॥
कार्पासमुपवीतार्थं निर्मितं ब्रह्मणा पुरा।<br>ब्राह्मणानां त्रिवृत् सूत्रं कौशं वा वास्त्रमेव वा॥ ६ ॥<br><br>सदोपवीती चैव स्यात् सदा बद्धशिखो द्विजः।<br>अन्यथा यत् कृतं कर्म तद् भवत्ययथाकृतम्॥ ७ ॥प्राचीन कालमें ब्रह्माने यज्ञोपवीतके लिये कपासका निर्माण किया। ब्राह्मणोंका यज्ञोपवीत तिहरा होना चाहिये, वह कुशका हो अथवा वस्त्रका हो। द्विजको सदा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये तथा शिखा बाँधे रखना चाहिये। अन्यथा (वह) जो कर्म करता है, वह न किये हुएके ही समान है अर्थात् निष्फल है॥ ६-७॥
वसेदविकृतं वासः कार्पासं वा कषायकम्।<br>तदेव परिधानीय शुक्लमच्छिद्रमुत्तमम्॥ ८ ॥<br><br>उत्तरं तु समाख्यातं वासः कृष्णाजिनं शुभम्।<br>अभावे दिव्यमजिनं रौरवं वा विधीयते॥ ९ ॥कपास या रेशमका बना हुआ विकाररहित (जला-कटा न हो) वस्त्र पहनना चाहिये। ऐसे ही स्वच्छ, छिद्ररहित तथा उत्तम (शास्त्रविधिके अनुसार) वस्त्रको धारण करना चाहिये। उत्तरीय वस्त्रके रूपमें कृष्णमृगचर्म शुभ कहा गया है। इसके अभावमें दिव्य चर्म अथवा रुरु मृगके चर्मका विधान किया गया है॥ ८-९॥
उद्धृत्य दक्षिणं बाहुं सव्ये बाहौ समर्पितम्।<br>उपवीतं भवेन्नित्यं निवीतं कण्ठसज्जने॥ १०॥<br><br>सव्यं बाहुं समुद्धृत्य दक्षिणे तु धृतं द्विजाः।<br>प्राचीनावीतमित्युक्तं पित्र्ये कर्मणि योजयेत्॥ ११॥दाहिना हाथ उठाकर बायें हाथके ऊपर (बायें कंधेपर) स्थापित यज्ञसूत्रको 'उपवीत' कहा जाता है। नित्य ऐसे रहना चाहिये। कण्ठमें (मालाकी तरह) लटके रहनेपर (यज्ञसूत्र) 'निवीत' कहा जाता है। द्विजो! बायाँ हाथ बाहर निकालकर दाहिने बाहुके ऊपर (दाहिने कंधेके ऊपर) रखे हुए यज्ञसूत्रको 'प्राचीनावीत' (अपसव्य) कहा जाता है इसका प्रयोग पितृकर्ममें करना चाहिये॥ १०-११॥
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