संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १२ * २९९
| अग्न्यगारे गवां गोष्ठे होमे जप्ये तथैव च।<br>स्वाध्याये भोजने नित्यं ब्राह्मणानां च संनिधौ॥ १२॥<br><br>उपासने गुरूणां च संध्ययोः साधुसंगमे।<br>उपवीती भवेन्नित्यं विधिरेष सनातनः॥ १३॥<br><br>मौञ्जी त्रिवृत् समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला।<br>मुञ्जाभावे कुशेनार्हुर्ग्रन्थेनैकेन वा त्रिभिः॥ १४॥<br><br>धारयेद् बैल्वपालाशौ दण्डौ केशान्तकौ द्विजः।<br>यज्ञार्हवृक्षजं वाथ सौम्यमव्रणमेव च॥ १५॥ | यज्ञशाला, गोशाला, होम, जप, स्वाध्याय, भोजन, ब्राह्मणोंकी संनिधि, गुरुओंकी उपासना, दोनों संध्याओं और साधुओंके समागम (सत्संग)-के समय नित्य उपवीती रहना चाहिये यह सनातन विधि है। विप्र (वटु)-की मेखला मूँजसे बनी हुई, तिहरी, बराबर तथा चिकनी बनानी चाहिये। मूँजके अभावमें कुशकी एक या तीन ग्रन्थियोंसे युक्त मेखला बनानी चाहिये। द्विजको केशान्तपर्यन्त बिल्व अथवा पलाशका चाहे किसी यज्ञीय वृक्षका सुन्दर (चिकना) तथा छिद्र आदिसे रहित दण्ड धारण करना चाहिये ॥ १२-१५॥ |
| सायं प्रातर्द्विजः संध्यामुपासीत समाहितः।<br>कामाल्लोभाद् भ्यान्मोहात् त्यक्तेन पतितो भवेत्॥ १६॥<br><br>अग्निकार्यं ततः कुर्यात् सायं प्रातः प्रसन्नधीः।<br>स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा॥ १७॥<br><br>देवताभ्यर्चनं कुर्यात् पुष्पैः पत्रेण वाम्बुभिः।<br>अभिवादनशीलः स्यान्नित्यं वृद्धेषु धर्मतः॥ १८॥<br><br>असावहं भो नामेति सम्यक् प्रणतिपूर्वकम्।<br>आयुरायोग्यसिद्धयर्थं तन्द्रादिपरिवर्जितः॥ १९॥<br><br>आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने।<br>अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः॥ २०॥ | द्विजको सायं तथा प्रातः समाहित होकर संध्या करनी चाहिये। काम, लोभ, भय अथवा मोहसे संध्याका त्याग करनेसे वह (द्विज) पतित हो जाता है। तदनन्तर प्रसन्न-मनसे सायं और प्रातः हवन करना चाहिये। स्नानके उपरान्त देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पत्र, पुष्प अथवा जलसे देवताओंका पूजन करना चाहिये। आयु तथा आरोग्यकी प्राप्तिके लिये आलस्य आदिसे सर्वथा मुक्त होकर 'यह मैं अमुक नामवाला आपको प्रणाम करता हूँ'—इस प्रकार धर्मपूर्वक वृद्धजनोंका नित्य अभिवादन करना चाहिये। अभिवादन किये जानेपर विप्रको 'आयुष्मान् भव सौम्य' अर्थात् 'सौम्य ! तुम दीर्घायु होओ' इस प्रकार अभिवादनका उत्तर देना चाहिये। उसके नामके अन्तिम स्वर अथवा नामके अन्तिम अक्षरके व्यञ्जन होनेपर उसके ठीक पूर्वके स्वरको प्लुत (दीर्घतर) स्वरमें बोलना चाहिये ॥ १६-२०॥ |
| न कुर्याद् योऽभिवादस्य द्विजः प्रत्यभिवादनम्।<br>नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः॥ २१॥<br><br>व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः।<br>सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन तु दक्षिणः॥ २२॥<br><br>लौकिकं वैदिकं चापि तथाध्यात्मिकमेव वा।<br>आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत्॥ २३॥<br><br>नोदकं धारयेद् भैक्षं पुष्पाणि समिधस्तथा।<br>एवंविधानि चान्यानि न दैवाद्येषु कर्मसु॥ २४॥ | जो द्विज अभिवादन करनेपर प्रत्यभिवादन (अभिवादनका उत्तर) नहीं करता, उसका अभिवादन विद्वान्को नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह शूद्रके समान ही है। अभिवादनके समय गुरुके चरणोंका स्पर्श व्यत्यस्तपाणि होकर करना चाहिये अर्थात् बायें हाथसे बायें पैरको और दाहिने हाथसे दाहिने पैरको स्पर्श करना चाहिये। जिससे लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया हो, उस (गुरु)-का सर्वप्रथम अभिवादन करना चाहिये। देवपूजन (देव, पित्र्य) आदि कर्मोंमें भिक्षामें प्राप्त जल, पुष्प तथा समिधा अथवा इसी प्रकारके अन्य पदार्थोंका ग्रहण (प्रयोग) नहीं करना चाहिये ॥ २१-२४॥ |