संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३०० * कूर्मपुराण *
| ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत् क्षत्रबन्धुमनामयम्।<br>वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव तु॥ २५॥ | (मिलनेपर) ब्राह्मणसे उसका 'कुशल' पूछना चाहिये, इसी प्रकार क्षत्रियसे 'अनामय' (रोगराहित्य), वैश्यसे 'क्षेम' और शूद्रसे 'आरोग्य' पूछना चाहिये॥ २५॥ |
| उपाध्यायः पिता ज्येष्ठो भ्राता चैव महीपतिः।<br>मातुलः श्वशुरस्त्राता मातामहपितामहौ।<br>वर्णज्येष्ठः पितृव्यश्च पुंसोऽत्र गुरवः स्मृताः॥ २६॥ | उपाध्याय^१, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, ससुर, रक्षक, मातामह, पितामह, अपनेसे श्रेष्ठ वर्णवाले तथा चाचा—ये लोग गुरु कहे गये हैं। माता, मातामही, गुरुपत्नी, पिता एवं माताकी बहिन (बुआ एवं मौसी), सास, पितामही तथा ज्येष्ठ धात्री (शैशवावस्थामें पालन करनेवाली)—ये सभी स्त्रियाँ गुरु हैं। द्विजो! माता और पिताके सम्बन्धसे यह गुरुवर्ग कहा गया है अर्थात् माताके पक्षसे तथा पिताके पक्षसे जो लोग श्रेष्ठ कोटिमें हैं उन्हें बताया गया। मन, वाणी और कर्मद्वारा इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये॥ २६—२८॥ |
| माता मातामही गुर्वी पितुर्मातृश्च सोदराः।<br>श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च गुरवः स्त्रियः॥ २७॥ | |
| इत्युक्तो गुरुवर्गोऽयं मातुतः पितृतो द्विजाः।<br>अनुवर्तनमेतेषां मनोवाक्कायकर्मभिः॥ २८॥ | |
| गुरुं दृष्ट्वा समुत्तिष्ठेदभिवाद्य कृताञ्जलिः।<br>नैतैरुपविशेत् सार्धं विवदेन्नात्मकारणात्॥ २९॥ | गुरुको देखते ही आसनसे उठ जाना चाहिये और अभिवादनकी विधिसे उन्हें अभिवादन करना चाहिये, अनन्तर उनकी आज्ञा पाकर हाथ जोड़कर सम्मुख बैठना चाहिये, पर इनके साथ एक आसनपर नहीं बैठना चाहिये और अपने लिये (व्यक्तिगत स्वार्थके लिये) इनसे विवाद भी नहीं करना चाहिये। प्राणधारणके लिये भी द्वेषवश गुरुजनोंसे विवाद न करे। अन्य गुणोंके विद्यमान रहनेपर भी गुरुसे द्वेष करनेवालोंका अधःपतन होता है अर्थात् गुरुद्वेषीके सभी गुण व्यर्थ होते हैं॥ २९-३०॥ |
| जीवितार्थमपि द्वेषाद् गुरुभिर्नैव भाषणम्।<br>उदितोऽपि गुणैरन्यैर्गुरुद्वेषी पतत्यधः॥ ३०॥ | |
| गुरूणामपि सर्वेषां पूज्याः पञ्च विशेषतः।<br>तेषामाद्यास्त्रयः श्रेष्ठास्तेषां माता सुपूजिता॥ ३१॥ | अभी बताये गये सभी गुरुओंमें भी पाँच विशेषरूपसे पूजनीय हैं। उनमें प्रथम तीन श्रेष्ठ हैं, उनमें भी माता अधिक पूज्य होती है। उत्पादक (पिता), उत्पन्न करनेवाली (माता), विद्याका उपदेश देनेवाले (गुरु), बड़े भाई और भरण-पोषण करनेवाले स्वामी—ये पाँच गुरु कहे गये हैं। कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको अपने सभी प्रयत्नोंके द्वारा प्राण ही क्यों न त्यागना पड़े, पर इन पाँचों (गुरुओं)-का विशेषरूपसे पूजन (आदर) करना चाहिये॥ ३१—३३॥ |
| यो भावयति या सूते येन विद्योपदिश्यते।<br>ज्येष्ठो भ्राता च भर्ता च पञ्चैते गुरवः स्मृताः॥ ३२॥ | |
| आत्मनः सर्वयत्नेन प्राणत्यागेन वा पुनः।<br>पूजनीया विशेषेण पञ्चैते भूतिमिच्छता॥ ३३॥ | |
| यावत् पिता च माता च द्वावेतौ निर्विकारिणौ।<br>तावत् सर्वं परित्यज्य पुत्रः स्यात् तत्परायणः॥ ३४॥ | जबतक माता और पिता ये दोनों निर्विकार^२ रहें, तबतक सब कुछ छोड़कर पुत्रको उनके परायण रहना चाहिये॥ ३४॥ |
१-वेदके एकदेश मन्त्र या ब्राह्मण तथा वेदाङ्ग व्याकरण आदिका जो ब्राह्मण वृत्त्यर्थ (जीविकाके लिये) अध्यापन करते हैं, वे उपाध्याय कहे जाते हैं (मनु० २। १४१)।
२-यहाँ निर्विकारका अर्थ है गोहत्या, गुरुहत्या, ब्राह्मणहत्या-जैसे परिगणित महापातकोंसे रहित। दुर्भाग्यवश यदि माता-पिता महापातकी हो जाते हैं तो उन्हें प्रायश्चित्तके लिये पुत्रादिसे अलग रहना ही पड़ता है। उस समय उनकी सेवा आदिसे पुत्रको भी वञ्चित