संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १२ * | ३०१ |
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| पिता माता च सुप्रीतौ स्यातां पुत्रगुणैर्यदि।<br>स पुत्रः सकलं धर्ममाप्नुयात् तेन कर्मणा॥ ३५॥ | यदि पुत्रके गुणों (सत्कर्मनिष्ठा-सेवाभाव आदि)-के कारण पिता-माता पुत्रपर प्रसन्न रहते हैं तो वह पुत्र अपने इन सत्कर्मनिष्ठा आदि कर्म (गुणों)-से सम्पूर्ण धर्मको प्राप्त कर लेता है (अर्थात् यज्ञ, दान आदि बड़े-बड़े कर्मोंसे होनेवाले सभी पुण्य माता-पिताकी प्रसन्नताके कारण पुत्रको प्राप्त होते हैं)। माताके समान कोई देवता |
| नास्ति मातृसमं दैवं नास्ति पितृसमो गुरुः।<br>तयोः प्रत्युपकारोऽपि न कथञ्चन विद्यते॥ ३६॥<br>तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यात् कर्मणा मनसा गिरा।<br>न ताभ्यामननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ ३७॥ | नहीं है, पिताके समान कोई गुरु नहीं है। उनके उपकारका कोई भी प्रत्युपकार नहीं है॥ ३५-३६॥<br>उन दोनों (अर्थात् माता-पिता)-का मन, वाणी तथा कर्मसे नित्य ही प्रिय करना चाहिये। मोक्षसाधक (कर्मों) और नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको छोड़कर बिना उनकी आज्ञा प्राप्त किये दूसरे किसी धर्मका आचरण |
| वर्जयित्वा मुक्तिफलं नित्यं नैमित्तिकं तथा।<br>धर्मसारः समुद्दिष्टः प्रेत्यानन्तफलप्रदः॥ ३८॥ | नहीं करना चाहिये। (उनकी सेवाको) धर्मका सार और मृत्युके अनन्तर मोक्षफल देनेवाला बताया गया है। उपदेष्टा (गुरु)-की अच्छी प्रकार आराधना करनेके अनन्तर उनकी आज्ञासे ब्रह्मचर्याश्रमका परित्यागकर |
| सम्यगाराध्य वक्तारं विसृष्टस्तदनुज्ञया।<br>शिष्यो विद्याफलं भुङ्क्ते प्रेत्य चापद्यते दिवि॥ ३९॥ | गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेवाला स्नातक शिष्य विद्याके फलका उपभोग करता है और मृत्युके उपरान्त स्वर्गलोक प्राप्त करता है अर्थात् अभ्युदय (ऐहलौकिक उन्नति) तथा निःश्रेयस (पारलौकिक उन्नति) दोनों यथावत् प्राप्त करता है। जो पितृतुल्य बड़े भाईको मूर्ख समझता |
| यो भ्रातरं पितृसमं ज्येष्ठं मूर्खोऽवमन्यते।<br>तेन दोषेण स प्रेत्य निरयं घोरमृच्छति॥ ४०॥<br>पुंसा वर्त्मनिविष्टेन पूज्यो भर्ता तु सर्वदा।<br>याति दातरि लोकेऽस्मिन् उपकाराद्धि गौरवम्॥ ४१॥ | है, मरनेपर वह उस दोषके कारण घोर नरक प्राप्त करता है॥ ३७-४०॥<br>अच्छे मार्गमें स्थित (सत्कर्त्तव्यपरायण) पुरुषके लिये भरण-पोषण करनेवाला भर्ता (स्वामी) सदा पूज्य (आदरविशेषके योग्य) होता है। उपकार करनेके कारण दाता इस लोकमें अत्यधिक गौरव प्राप्त करता ही है। जो लोग भर्तासे प्राप्त जीविकाके बदले अपने |
| ये नरा भर्तृपिण्डार्थं स्वान् प्राणान् संत्यजन्ति हि।<br>तेषामथाक्षयाँल्लोकान् प्रोवाच भगवान् मनुः॥ ४२॥ | प्राणोंतकका परित्याग कर देते हैं, उन्हें अक्षय लोक प्राप्त होते हैं, ऐसा भगवान् मनुने कहा है॥ ४१-४२॥ |
| मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून्।<br>असावहमिति ब्रूयुः प्रत्युत्थाय यवीयसः॥ ४३॥ | अपनेसे अल्प अवस्थावाले मामा, चाचा, ससुर तथा ऋत्विज्के प्रति प्रत्युत्थानपूर्वक (आसनसे उठकर) 'मैं अमुक नामवाला हूँ'—केवल ऐसा ही कहकर अपना सम्मानभाव व्यक्त करना चाहिये, इन्हें अभिवादन-विधिसे अभिवादन नहीं करना चाहिये*॥ ४३॥ |
होना ही पड़ता है। ऐसे समयसे अतिरिक्त समयमें तो पुत्रको माता-पिताके परायण अवश्य रहना ही चाहिये। माता-पिताके सविकार होनेका निर्णय शास्त्रोंके अनुसार अधिकारी विद्वान् लोग ही करते हैं। यह निर्णय पुत्रके अधीन नहीं है।
* मनुस्मृति (२।१३०)-में यही श्लोक है। वहाँ कुल्लूकभट्टने जो अर्थ किया है, तदनुसार ही यहाँ अर्थ समझना चाहिये। वहाँ