संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३०२ * कूर्मपुराण *
| अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत्।<br>भोभवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित्॥ ४४॥<br><br>अभिवाद्यश्च पूज्यश्च शिरसा वन्द्य एव च।<br>ब्राह्मणः क्षत्रियाद्यैश्च श्रीकामैः सादरं सदा॥ ४५॥<br>नाभिवाद्यास्तु विप्रेण क्षत्रियाद्याः कथञ्चन।<br>ज्ञानकर्मगुणोपेता यद्यप्येते बहुश्रुताः॥ ४६॥<br><br>ब्राह्मणः सर्ववर्णानां स्वस्ति कुर्यादिति स्थितिः।<br>सवर्णेपु सवर्णानां कार्यमेवाभिवादनम्॥ ४७॥<br><br>गुरुर्ग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।<br>पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वत्राभ्यागतो गुरुः॥ ४८॥<br>विद्या कर्म वयो बन्धुर्वित्तं भवति पञ्चमम्।<br>मान्यस्थानानि पञ्चाहुः पूर्वं पूर्वं गुरूत्तरात्॥ ४९॥<br><br><br><br>पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि बलवन्ति च।<br>यत्र स्युः सोऽत्र मानार्हः शूद्रोऽपि दशमीं गतः॥ ५०॥<br>पन्था देयो ब्राह्मणाय स्त्रियै राज्ञे ह्यचक्षुषे।<br>वृद्धाय भारभुग्नाय रोगिणे दुर्बलाय च॥ ५१॥<br><br><br><br>भिक्षामाहृत्य शिष्टानां गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम्।<br>निवेद्य गुरवेऽश्नीयाद् वाग्यतस्तदनुज्ञया॥ ५२॥ | जो अपनेसे छोटा भी (यज्ञादिमें) दीक्षित (पुरुष) हो तो उसका नाम लेकर नहीं पुकारना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको 'भो भवत्' अर्थात् 'आप' शब्दका प्रयोग कर इसके (दीक्षितके) साथ सम्भाषण करना चाहिये। ऐश्वर्यकी अभिलाषा करनेवाले क्षत्रियादिकोंके लिये ब्राह्मण सदा ही आदरपूर्वक अभिवादन करने योग्य, पूजन करने योग्य तथा सिरसे वन्दन करने योग्य है॥ ४४-४५॥<br><br>विप्रको कभी भी क्षत्रियादिका अभिवादन नहीं करना चाहिये, भले ही वे ज्ञान, कर्म एवं गुणोंकी दृष्टिसे उत्कृष्ट हों। ब्राह्मणको सभी वर्णोंके प्रति 'स्वस्ति' अर्थात् कल्याण हो—ऐसा कहना चाहिये—यह विधान है। समान वर्णोंमें (कनिष्ठ व्यक्तियोंको ज्येष्ठ व्यक्तियोंका) अभिवादन करना चाहिये¹। द्विजातियोंके गुरु अग्नि और सभी वर्णोंके गुरु ब्राह्मण हैं। स्त्रियोंके एकमात्र गुरु उनके पति हैं और अतिथि सबका गुरु है॥ ४६-४८॥<br><br>विद्या, कर्म, अवस्था, बन्धु तथा पाँचवाँ धन—ये सम्मान प्राप्त करनेके पाँच स्थान कहे गये हैं। इनमें बादकी अपेक्षा पूर्व-पूर्वकी गुरुता² है। (ब्राह्मणादि) तीन वर्णोंके जिस व्यक्तिमें ये पाँच गुण (मान्यताके स्थान) अधिक हों तथा प्रबल हों वह अपेक्षाकृत माननीय होता है (अर्थात् श्रेष्ठतर, श्रेष्ठतम होता है)। दशमी अर्थात् नब्बे वर्षसे अधिक अवस्थाको प्राप्त शूद्र भी मान देनेके योग्य हो जाता है (अर्थात् ऐसे शूद्रके आनेपर उसे बैठनेके लिये आसन आदि आदरभावपूर्वक देना चाहिये) ॥ ४९-५०॥<br><br>ब्राह्मण, स्त्री, राजा, नेत्रहीन व्यक्ति, वृद्ध, भारसे पीड़ित व्यक्ति, रोगी तथा दुर्बलके लिये रास्ता छोड़ देना चाहिये (अर्थात् एक ही रास्तेपर आमने-सामने होनेपर स्वयं हटकर इन्हें रास्ता दे देना चाहिये। इनके निकल जानेपर स्वयं जाना चाहिये)। (ब्रह्मचारीको) प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन शिष्टोंके³ घरोंसे भिक्षा लाकर गुरुको निवेदितकर उनकी (गुरुकी) आज्ञा प्राप्तकर मौन होकर भोजन करना चाहिये ॥ ५१-५२॥ |
ऋत्विक्से अतिरिक्त गुरुको नहीं गिना गया है। श्लोकमें गिनाये गये मामासे ऋत्विक्हतकके लिये भी 'गुरु' शब्दका उल्लेख है।
१-यहाँ अभिवादनका अर्थ इतना ही है कि दोनों हाथोंसे पादस्पर्शकर प्रणाम करे। पूर्वोक्त अभिवादन-विधिके अनुसार नाम, गोत्र आदिका उच्चारण नहीं करना चाहिये।
२-विद्या—वेदार्थतत्त्वज्ञान कर्म, श्रौत-स्मार्त क्रियाओंका पालन, अवस्था—अधिक वयस्क होना, बन्धु—पितृव्य (चाचा), मामा आदि, वित्तन्यायार्जित धन—ये पाँच मान्यताके कारण हैं, पर इनमें उत्तर-उत्तरकी अपेक्षा पूर्व-पूर्व श्रेष्ठ है।
३-अपने वर्णके तथा अपने वर्णसे उच्च वर्णके जो लोग यथासम्भव आस्तिक, सदाचारी हों, महापातक आदिसे दूषित न हों, वे ही यहाँ शिष्टरूपमें अभिप्रेत हैं।