भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 313
* अध्याय १२ *३०३
भवत्पूर्वं चरेद् भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः।<br>भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम्॥ ५३॥<br><br>मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम्।<br>भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं न विमानयेत्॥ ५४॥<br><br>सजातीयगृहेष्वेव सार्ववर्णिकमेव वा।<br>भैक्ष्यस्य चरणं प्रोक्तं पतितादिषु वर्जितम्॥ ५५॥<br>वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु।<br>ब्रह्मचार्याहरेद् भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम्॥ ५६॥<br><br>गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु।<br>अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत्॥ ५७॥<br><br>सर्वं वा विचरेद् ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे।<br>नियम्य प्रयतो वाचं दिशस्त्वनवलोकयन्॥ ५८॥<br>समाहृत्य तु तद् भैक्षं यावदर्थममायया।<br>भुञ्जीत प्रयतो नित्यं वाग्यतोऽनन्यमानसः॥ ५९॥<br><br>भैक्ष्येण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद् व्रती।<br>भैक्ष्येण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता॥ ६०॥उपनयन-संस्कार होनेपर (ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको पूर्वमें 'भवत्' शब्दका प्रयोगकर ('भवति! भिक्षां देहि' ऐसा कहकर) भिक्षा माँगनी चाहिये। क्षत्रियको बीचमें ('भिक्षां भवति! देहि' ऐसा कहकर) तथा वैश्यको अन्तमें 'भवत्' शब्द कहकर ('भिक्षां देहि भवति!' ऐसा कहकर) भिक्षा माँगनी चाहिये¹। अपनी माता, बहन तथा मौसीसे अथवा जो इस ब्रह्मचारीकी अवमानना न करे, उससे पहली (उपनयन-संस्कारकी अङ्गभूत प्रथम) भिक्षा माँगनी चाहिये²। अपनी जातिके घरोंसे अथवा अपनेसे उच्च वर्णवाले सभी लोगोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये, किंतु पतित आदि व्यक्तियोंके घरसे भिक्षाका ग्रहण करना वर्जित है॥ ५३-५५॥<br><br>ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक ऐसे लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे, जिनके घरोंमें वेद एवं यज्ञ आदिका लोप नहीं हुआ हो और जो (वेदशास्त्रानुसार) अपने कर्मोंके पालनके कारण प्रशस्त हों। गुरुके कुल (सपिण्ड) तथा (अपने) बन्धुके कुल अर्थात् अपने कुल और बान्धवों (मातुल आदिके घर)-से भिक्षा नहीं माँगनी चाहिये। दूसरोंका घर न मिलनेपर पहले-पहलेका त्याग करना चाहिये। अर्थात् पहले बन्धु-बान्धवों (मातुल आदि)-के घर, यदि वहाँ भिक्षा न मिले तो अपने कुलमें और वहाँ भी न मिले तो अन्तमें गुरुके कुलमें भिक्षा माँगनी चाहिये। पहलेके कहे गये घरोंसे भी न मिलनेपर प्रयत्नपूर्वक वाणीको नियन्त्रित कर दिशाओंमें न देखते हुए, सम्पूर्ण ग्राममें भिक्षा-हेतु विचरण करना चाहिये (पर पातकी एवं हीन जातिवालेके घरकी भिक्षा न ले)॥ ५६-५८॥<br><br>अपनी आवश्यकताके अनुसार बिना किसी छल-कपटके उस भिक्षाको एकत्रितकर प्रयत्नपूर्वक नित्य मौन होकर एकाग्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। (ब्रह्मचारी) नित्य भिक्षासे जीविकाका निर्वाह करे। ब्रह्मचारीको नित्य एक अन्न³ नहीं ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचारीकी भिक्षान्नसे की गयी वृत्ति उपवासके समान ही कही गयी है॥ ५९-६०॥

१-शास्त्रानुसार ब्रह्मचारी गृहस्थके घरमें भिक्षा माँगने जाता है। घरमें माताएँ रहती हैं, अतः 'भवति!' इस रूपमें माताओंको सम्बोधन कर भिक्षा माँगता है।
२-उपनयन-संस्कार जब होता है तब भिक्षा माँगनेका विधान है। यह सर्वप्रथम भिक्षा माँगना है। इसीके लिये यह वचन है।
३-एक अन्न नित्य ग्रहण करनेसे उसमें आसक्ति हो जाती है और किसी भी प्रकारकी आसक्ति वर्जित है।