भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०४ * कूर्मपुराण *

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्। दृष्ट्वा हृष्येत् प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः॥ ६१॥

अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्। अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात् तत्परिवर्जयेत्॥ ६२॥

प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत सूर्याभिमुख एव वा। नाद्यादुदङ्मुखो नित्यं विधिरेष सनातनः॥ ६३॥

प्रक्षाल्य पाणिपादौ च भुञ्जानो द्विरुपस्पृशेत्। शुचौ देशे समासीनो भुक्त्वा च द्विरुपस्पृशेत्॥ ६४॥

नित्य अन्न (प्राप्त भिक्षान्न)-का पूजन (प्राणधारक रूपमें विष्णुस्वरूप समझकर ध्यान) करे और निन्दा न करते हुए उसे ग्रहण करे। (भोजनको) देखकर हर्षित और प्रसन्न होना चाहिये तथा सर्वथा उसकी (अन्नकी) प्रशंसा करनी चाहिये। अत्यधिक भोजन करना आरोग्य, आयुष्य, स्वर्ग और पुण्यका नाश करनेवाला तथा लोकमें। (अधिक भोजीके रूपमें) निन्दा करानेवाला है, इसलिये अतिभोजनका परित्याग करना चाहिये॥ ६१-६२॥

नित्य पूर्वकी ओर मुख करके अथवा सूर्यकी ओर मुख करके भोजन करे। उत्तरकी ओर मुखकर भोजन न करे—यह सनातन विधि है। दोनों हाथ एवं पाँव धोकर भोजनके आरम्भमें दो आचमन करे। पवित्र स्थानपर बैठकर भोजन करनेके अनन्तर पुनः दो बार आचमन करना चाहिये॥ ६३-६४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

ब्रह्मचारीके नित्यकर्मकी विधि, आचमनका विधान, हाथोंमें स्थित तीर्थ, उच्छिष्ट होनेपर शुद्धिकी प्रक्रिया, मूत्र-पुरीषोत्सर्गके नियम

व्यास उवाच

भुक्त्वा पीत्वा च सुप्त्वा च स्नात्वा रथ्योपसर्पणे।
ओष्ठावलोमकौ स्पृष्ट्वा वासो विपरिधाय च॥ १॥

रेतोमूत्रपुरीषाणामुत्सर्गेऽयुक्तभाषणे ।
ष्ठीवित्वाध्ययनारम्भे कासश्वासागमे तथा॥ २॥

चत्वरं वा श्मशानं वा समाक्रम्य द्विजोत्तमः।
संध्ययोरुभयोस्तद्वदाचान्तोऽप्याचमेत् पुनः॥ ३॥

चण्डालम्लेच्छसम्भाषे स्त्रीशूद्रोच्छिष्टभाषणे।
उच्छिष्टं पुरुषं स्पृष्ट्वा भोज्यं चापि तथाविधम्।
आचामेदश्रुपाते वा लोहितस्य तथैव च॥ ४॥

भोजने संध्ययोः स्नात्वा पीत्वा मूत्रपुरीषयोः।
आचान्तोऽप्याचमेत् सुप्त्वा सकृत्सकृदथान्यतः॥ ५॥

व्यासजी बोले— भोजन करके, जल इत्यादि पीकर, शयनकर उठनेके बाद, स्नान करके तथा मार्गमें गमनके समय, रोमरहित दोनों ओष्ठोंका स्पर्शकर, वस्त्र धारणकर, वीर्य, मल-मूत्रका त्यागकर, अनुपयुक्त भाषण करनेपर, थूकनेके बाद, अध्ययनारम्भमें, खाँसी या श्वास आनेपर, चौराहे अथवा श्मशानको पार करनेपर, इसी प्रकार दोनों संध्याओंमें श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि वह आचमन किये रहनेपर भी पुनः आचमन करे। चाण्डाल और म्लेच्छसे बात करनेपर, स्त्री, शूद्र और जूठे मुखवालेसे भाषण करनेपर, जूठे मुँहवाले पुरुषका तथा इसी प्रकार उच्छिष्ट भोजनका स्पर्श होनेपर, आँसू तथा रक्तके गिरनेपर, भोजनके समय, दोनों संध्याओंमें स्नानकर और जल आदिके पीनेपर तथा मल-मूत्रके उत्सर्गपर आचमन किये होनेपर भी आचमन करे। सोनेसे जगनेके बाद एक बार और अन्य समयोंमें अनेक बार आचमन करना चाहिये॥ १-५॥

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