संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 315, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १३ * ३०५
| --- | --- | | अग्नेर्गावामथालम्भे स्पृष्ट्वा प्रयतमेव वा।<br>स्त्रीणामथात्मनः स्पर्शे नीवीं वा परिधाय च॥ ६ ॥ | अग्निका, गौका स्पर्श होनेपर, किसी परिश्रम करनेवालेका, स्त्रीका तथा अपना स्पर्श होनेपर (अपने जिस अङ्गका स्पर्श आवश्यक या अनिवार्य न हो उसका कामतः यदि स्पर्श किया जाय), नीवी (कटि—कमरका वस्त्र) पहिनकर, अपने केशों तथा बिना धोये | | उपस्पृशेज्जलं वार्द्रं तृणं वा भूमिमेव वा।<br>केशानां चात्मनः स्पर्शे वाससोऽक्षालितस्य च॥ ७ ॥ | वस्त्रका स्पर्श करनेपर जल, हरे तृण या भूमिक स्पर्श करना चाहिये॥ ६-७॥ | | अनुष्णाभिरफेनाभिरदुष्टाभिश्च धर्मतः।<br>शौचेप्सुः सर्वदाचामेदासीनः प्रागुदङ्मुखः॥ ८ ॥ | धर्मकी दृष्टिसे शुद्धिकी अभिलाषावालेको चाहिये कि वह सदा पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके बैठकर शीतल, फेनरहित तथा दोषवर्जित जलसे आचमन करे। | | शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।<br>अकृत्वा पादयोः शौचमाचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत्॥ ९ ॥ | सिर या कानको ढकने और शिखा तथा कच्छ (पिछोटा) खुलनेपर, बिना पैर धोये आचमन करनेपर भी अशुद्ध रहता है (अर्थात् इन स्थितियोंमें पहले पाँवोंको धोना चाहिये। अनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करना चाहिये)। बुद्धिमान् व्यक्तिको जूता पहने हुए, | | सोपानत्को जलस्थो वा नोष्णीषी वाचमेद् बुधः।<br>न चैव वर्षधाराभिर्न तिष्ठन् नोद्धृतोदकैः॥ १०॥ | जलमें स्थित होनेपर, सिरपर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिये। (इसी प्रकार) न वर्षाके जलसे, न खड़े होकर, न उठाये हुए जलसे, न एक हाथसे अर्पित जलसे अर्थात् किसी अन्यके द्वारा अञ्जलिसे नहीं, केवल एक हाथसे दिये गये जलसे, | | नैकहस्तार्पितजलैर्विना सूत्रेण वा पुनः।<br>न पादुकासनस्थो वा बहिर्जानुरथापि वा॥ ११॥ | बिना यज्ञोपवीतके, न पादुकासनपर बैठे हुए (पाँवमें धारण की जानेवाली पादुकाको आसन बनाकर उसीपर बैठकर) अथवा न जानुओंके बाहर हाथ निकाले हुए आचमन करना चाहिये॥ ८-११॥ | | न जल्पन् न हसन् प्रेक्षन् शयानः प्रह्व एव च।<br>नावीक्षिताभिः फेनाद्यैरुपैताभिरथापि वा॥ १२॥ | बोलते हुए, हँसते हुए, देखते हुए (किसी अन्यकी ओर देखते हुए), सोते हुए और झुककर आचमन नहीं करना चाहिये। बिना देखे^१ हुए अथवा फेन आदिवाले जलसे आचमन नहीं करना चाहिये। शूद्र^२ अथवा अपवित्र व्यक्तिके हाथोंसे दिये हुए एवं खारे | | शूद्राशुचिकरोन्मुक्तैर्न क्षाराभिस्तथैव च।<br>न चैवाङ्गुलिभिः शब्दं न कुर्वन् नान्यमानसः॥ १३॥ | जलसे और अंगुलियोंसे शब्द करते हुए तथा अन्यमनस्क होकर आचमन नहीं करना चाहिये॥ १२-१३॥ |
१-जलमें कोई ऐसी वस्तु नहीं होनी चाहिये जो उसे अपवित्र करती है। इसलिये अच्छी प्रकार निरीक्षित जलसे ही आचमन करना चाहिये। २-शक्ति रहनेपर किसी भी शूद्रके द्वारा लाये गये जलसे आचमन नहीं करना चाहिये। अशक्त होनेपर तथा त्रैवर्णिकके कथमपि उपलब्ध न होनेपर शूद्र (जिस शूद्रका पात्र धर्मशास्त्रके अनुसार ग्राह्य होता है)-के द्वारा लाये गये जलको कुश आदिसे पवित्रकर उससे आचमन किया जा सकता है।