भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०६ * कूर्मपुराण *


न वर्णरसदुष्टाभिर्न चैव प्रद्रोदकैः।<br>न पाणिक्षुभिताभिर्वा न बहिष्कक्ष एव वा॥ १४॥जिस जलका अपना स्वाभाविक वर्ण या रस विकृत हो गया है, उससे आचमन नहीं करना चाहिये। ऐसे ही प्रद्रोदक (अत्यल्प जल)-से आचमन नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त किसी पात्रमें रखे हुए उस जलसे भी आचमन नहीं करना चाहिये जो पूरा हाथ डालकर क्षुभित कर दिया गया हो। यदि कच्छ (पिछोटा) धोतीसे बाहर निकल जाय तो उस स्थितिमें आचमन नहीं करना चाहिये। कच्छको धोतीके भीतर करनेके अनन्तर ही आचमन करनेका विधान है॥ १४॥
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठ्याभिः क्षत्रियः शुचिः।<br>प्राशिताभिस्तथा वैश्यः स्त्रीशूद्रौ स्पर्शतोऽन्ततः॥ १५॥(आचमनमें) ब्राह्मण हृदयतक पहुँचनेवाले, क्षत्रिय कण्ठतक पहुँचनेवाले जलसे और वैश्य मुखके भीतर प्रविष्ट (कण्ठतक न भी पहुँचे)जलसे शुद्ध होते हैं; स्त्री, शूद्र तो केवल (जिह्वा, ओष्ठके अन्ततक) जलके स्पर्शमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं॥ १५॥
अङ्गुष्ठमूलान्तरतो रेखायां ब्राह्ममुच्यते।<br>अन्तराङ्गुष्ठदेशिन्यो पितॄणां तीर्थमुत्तमम्॥ १६॥अँगूठेके मूलकी रेखामें ब्राह्मतीर्थ, तर्जनी और अँगूठेके मध्यभागमें उत्तम पितृतीर्थ, कनिष्ठाके मूलभागमें प्राजापत्यतीर्थ कहलाता है। अँगलियोंके अग्रभागमें दैवतीर्थ और वही आर्षतीर्थ भी कहा जाता है। अथवा (अँगुलियोंके) मूल भागको दैव या आर्षतीर्थ, मध्यभागको आग्नेयतीर्थ कहा गया है। इसी (आग्नेयतीर्थ)-को सौमिकतीर्थ कहा गया है। इसे जानकर मोह नहीं प्राप्त होता अर्थात् यथाविधि इसके अनुसार अनुष्ठान करनेपर अन्तःकरण शुद्ध होनेसे अज्ञान नष्ट हो जाता है। द्विजो! द्विजको चाहिये कि वह ब्राह्मतीर्थसे ही नित्य आचमन करे अथवा कायतीर्थ (प्राजापत्यतीर्थ) या दैवतीर्थसे करे, पितृतीर्थसे कभी भी आचमन न करे। ब्राह्मण संयत होकर पहले तीन बार जलका आचमन करे, अनन्तर मुड़े हुए अँगूठेके मूलसे मुखका स्पर्श करे यही सम्मार्जन है॥ १६—२०॥
कनिष्ठामूलतः पश्चात् प्राजापत्यं प्रचक्षते।<br>अङ्गुल्यग्रे स्मृतं दैवं तदेवार्षं प्रकीर्तितम्॥ १७॥
मूले वा दैवमार्षं स्यादाग्नेयं मध्यतः स्मृतम्।<br>तदेव सौमिकं तीर्थमेतज्ज्ञात्वा न मुह्यति॥ १८॥
ब्राह्मेणैव तु तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत्।<br>कायेन वाथ दैवेन न तु पित्र्येण वै द्विजाः॥ १९॥
त्रिः प्राश्नीयादपः पूर्वं ब्राह्मणः प्रयतस्ततः।<br>सम्मृज्याङ्गुष्ठमूलेन मुखं वै समुपस्पृशेत्॥ २०॥
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु स्पृशेन्नेत्रद्वयं ततः।<br>तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेन्नासापुटद्वयम्॥ २१॥तदनन्तर अँगूठे और अनामिकासे दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे और तर्जनी तथा अँगूठेके योगसे दोनों नासापुटों (नाक)-का स्पर्श करे। कनिष्ठा और अँगूठेके योगसे दोनों कानोंका स्पर्श करे। तदनन्तर मिली हुई सभी अँगलियोंसे अथवा हथेलीसे हृदयका स्पर्श करे। तदुपरान्त सिरका भी वैसे ही स्पर्श करे अथवा दोनों अँगूठोंसे स्पर्श करे॥ २१-२२॥
कनिष्ठाङ्गुष्ठयोगेन श्रवणे समुपस्पृशेत्।<br>सर्वासामथ योगेन हृदयं तु तलेन वा।<br>संस्पृशेद् वा शिरस्तद्वदङ्गुष्ठेनाथवा द्वयम्॥ २२॥
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