संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय १३ * ३०७
| त्रिः प्राश्नीयाद् यदम्भस्तु सुप्रीतास्तेन देवताः ।<br>ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च भवन्तीत्यनुशुश्रुम ॥ २३ ॥ | आचमनमें तीन बार जो जल पिया जाता है, उससे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—ये तीन देवता प्रसन्न होते हैं—ऐसा हमने सुना है। मार्जन करनेसे गङ्गा और यमुना नदियाँ प्रसन्न होती हैं। नेत्रोंके स्पर्शसे सूर्य तथा चन्द्रमा प्रसन्न होते हैं॥ २३-२४॥ |
| गङ्गा च यमुना चैव प्रीयेते परिमार्जनात् ।<br>संस्पृष्टयोर्लोचनयोः प्रीयेते शशिभास्करौ ॥ २४ ॥<br>नासत्यदस्रौ प्रीयेते स्पृष्टे नासापुटद्वये ।<br>कर्णयोः स्पृष्टयोस्तद्वत् प्रीयेते चानिलानलौ ॥ २५ ॥ | दोनों नासापुटोंका स्पर्श करनेसे नासत्य और दस्र (दोनों अश्विनीकुमार) प्रसन्न होते हैं, इसी प्रकार दोनों कानोंका स्पर्श करनेसे अग्नि तथा वायुदेवता प्रसन्न होते हैं। हृदयके स्पर्श होनेपर सभी देवता प्रसन्न होते हैं। सिरका स्पर्श करनेसे वे अद्वितीय पुरुष विष्णु प्रसन्न होते हैं॥ २५-२६॥ |
| संस्पृष्टे हृदये चास्य प्रीयन्ते सर्वदेवताः ।<br>मूर्ध्नि संस्पर्शनादेकः प्रीतः स पुरुषो भवेत् ॥ २६ ॥<br>नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गं नयन्ति याः ।<br>दन्तवद् दन्तलग्नेषु जिह्वास्पर्शोऽशुचिर्भवेत् ॥ २७ ॥ | (आचमन आदिके समय) अङ्गपर गिरे हुए जलकणोंसे शरीर उच्छिष्ट नहीं होता। दाँतोंके भीतर स्थित पदार्थ दाँतोंके समान ही होता है, परंतु जिह्वाके स्पर्श होनेपर व्यक्ति अपवित्र हो जाता है। आचमन करनेके समय या दूसरोंको आचमन कराते समय पैरोंपर गिरे हुए जलको भूमिपर गिरे हुएके समान समझना चाहिये। उससे मनुष्य अपवित्र नहीं होता। मनुने मधुपर्क (यथाविधि मिश्रित दधि, मधु, घी), सोम, ताम्बूल-भक्षण, फल, मूल तथा ईखका दण्ड ग्रहण करनेमें कोई दोष नहीं कहा है, इन्हें कोई भी दे, ग्रहण किया जा सकता है। हम चल रहे हैं तथा हमारे हाथमें ऐसी वस्तु है जो उच्छिष्टस्पर्शसे दूषित हो सकती है तो हमें अन्न, जल ग्रहण करते समय उस वस्तुको भूमिपर यथास्थान रख देना चाहिये तथा अन्न, जल ग्रहण करनेके अनन्तर आचमन करनेके बाद भूमिपर रखी हुई वस्तुका प्रोक्षण करना चाहिये, अनन्तर उस वस्तुको लेकर चलना चाहिये॥ २७—३०॥ |
| स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् ।<br>भूमिगैस्ते समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ॥ २८ ॥ | |
| मधुपर्के च सोमे च ताम्बूलस्य च भक्षणे ।<br>फलमूले चेक्षुदण्डे न दोषं प्राह वै मनुः ॥ २९ ॥ | |
| प्रचरंश्चान्नपानेषु द्रव्यहस्तो भवेन्नरः ।<br>भूमौ निक्षिप्य तद् द्रव्यमाचम्याभ्युक्षयेत् तु तत् ॥ ३० ॥<br>तैजसं वै समादाय यद्युच्छिष्टो भवेद् द्विजः ।<br>भूमौ निक्षिप्य तद् द्रव्यमाचम्याभ्युक्षयेत् तु तत् ॥ ३१ ॥ | तैजस* पदार्थ (घी) लिये हुए यदि ब्राह्मण (द्विज) (खाने-पीनेके कारण) उच्छिष्ट हो जाय तो उस तैजस द्रव्य (घी)-को भूमिपर रखकर आचमन करे, पुनः उस द्रव्य (घी)-का प्रोक्षण करे। यदि कोई (द्रव्य-सहित) अमत्र (पात्र) लिये हुए मनुष्य उच्छिष्ट हो जाय तो उस द्रव्य (पात्र)-को (भूमिपर) रखे बिना आचमन कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है (पात्र अपवित्र नहीं होता)। परंतु वस्त्र आदिके सम्बन्धमें विकल्प है॥ ३१-३२॥ |
| यद्यमत्रं समादाय भवेदुच्छेषणान्वितः ।<br>अनिधायैव तद् द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ।<br>वस्त्रादिषु विकल्पः स्यात् तत्संस्पृष्टाचमेदिह ॥ ३२ ॥ |
* 'तेजो वै घृतम्' के अनुसार घीको तैजस (तेजस्वी बनानेवाला) माना जाता है।