भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०८ * कूर्मपुराण *


| अरण्येऽनुदके रात्रौ चौरव्याघ्राकुले पथि।<br>कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा द्रव्यहस्तो न दुष्यति ॥ ३३ ॥<br><br>निधाय दक्षिणे कर्णे ब्रह्मसूत्रमुदङ्मुखः।<br>अह्नि कुर्याच्छकृन्मूत्रं रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः ॥ ३४ ॥<br><br>अन्तर्धाय महीं काष्ठैः पत्रैर्लोष्ठतृणेन वा।<br>प्रावृत्य च शिरः कुर्याद् विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ३५ ॥<br>छायाकूपनदीगोष्ठचैत्याम्भःपथि भस्मसु।<br>अग्नौ चैव श्मशाने च विण्मूत्रे न समाचरेत् ॥ ३६ ॥<br><br>न गोमये न कृष्टे वा महावृक्षे न शाद्वले।<br>न तिष्ठन् न निर्वासा न च पर्वतमस्तके ॥ ३७ ॥<br><br>न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन।<br>न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन् वा समाचरेत् ॥ ३८ ॥<br><br>तुषाङ्गारकपालेषु राजमार्गे तथैव च।<br>न क्षेत्रे न विले वापि न तीर्थे न चतुष्पथे ॥ ३९ ॥<br><br>नोद्यानोदसमीपे वा नोषरे न पराशुचौ।<br>न सोपानत्पादुको वा छत्री वा नान्तरिक्षके ॥ ४० ॥<br><br>न चैवाभिमुखे स्त्रीणां गुरुब्राह्मणयोर्गवाम्।<br>न देवदेवालययोरपामपि कदाचन ॥ ४१ ॥<br><br>न ज्योतींषि निरीक्षन् वा न संध्याभिमुखोऽपि वा।<br>प्रत्यादित्यं प्रत्यनलं प्रतिसोमं तथैव च ॥ ४२ ॥ | उसका स्पर्श होनेपर आचमन करना चाहिये। उच्छिष्ट दशामें वस्त्रका स्पर्श होनेपर आचमन एवं वस्त्रका प्रोक्षण करना चाहिये। जंगलमें, जलहीन स्थानमें, रात्रिमें और चोर तथा व्याघ्र आदिसे आक्रान्त मार्गमें मल-मूत्र करनेपर भी व्यक्ति आचमन, प्रोक्षण आदि शुद्धिके अभावमें भी दूषित नहीं होता, साथ ही उसके हाथमें रखा हुआ द्रव्य भी अशुचि नहीं होता (पर शुद्धिका अवसर मिल जानेपर यथाशास्त्र शुद्धि आवश्यक है।) ॥ ३३ ॥<br><br>दाहिने कानपर यज्ञोपवीत चढ़ाकर दिनमें उत्तरकी ओर मुख करके तथा रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। पृथ्वीको लकड़ी, पत्तों, ढेलों अथवा घाससे ढककर तथा शिरको वस्त्रसे आवृतकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥<br><br>छायामें, कूपमें या उसके अति समीप, नदीमें, गौशाला, चैत्य (गाँवके सीमाका वृक्षसमूह, ग्राम्य देवताका स्थान—टीला, डीह आदिपर), जल, मार्ग, भस्म, अग्नि तथा श्मशानमें मल-मूत्र नहीं करना चाहिये। गोबरमें, जुती हुई भूमिमें, महान् वृक्षके नीचे, हरी घाससे युक्त मैदानमें और पर्वतकी चोटीपर तथा खड़े होकर एवं नग्न होकर मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। न जीर्ण देवमन्दिरमें, न दीमककी बाँबीमें, न जीवोंसे युक्त गड्ढेमें और न चलते हुए मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। धान इत्यादिकी भूसी, जलते हुए अंगार, कपाल*, राजमार्ग, खेत, गड्ढे, तीर्थ, चौराहे, उद्यान, जलके समीप, ऊसर भूमि और अत्यधिक अपवित्र स्थानमें मल-मूत्रका त्याग न करे। जूता या खड़ाऊँ पहने, छाता लिये, अन्तरिक्षमें (भूमि-आकाशके मध्यमें), स्त्री, गुरु, ब्राह्मण, गौके सामने, देवविग्रह तथा देवमन्दिर और जलके समीपमें तो कभी भी मल-मूत्रका विसर्जन न करे ॥ ३६-४१ ॥<br><br>नक्षत्रोंको देखते हुए, संध्याकालका समय आनेपर, सूर्य, अग्नि तथा चन्द्रमाकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये ॥ ४२ ॥ |


* कपालके ये अर्थ हैं—सिरकी अस्थि, घटके दोनों अर्धभाग, मिट्टीका भिक्षापात्र,यज्ञीय पुरोडाशको पकानेके लिये मिट्टीका बना हुआ पात्रविशेष।