संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १४ * | ३०९ ---|---
आहृत्य मृत्तिकां कूलाल्लेपगन्धापकर्षणम्।|आलस्य छोड़कर (नदी या तालाबके) किनारेसे कुर्यादतन्द्रितः शौचं विशुद्धैरुद्धृतोदकैः॥ ४३॥|मिट्टी लेकर उसके द्वारा तथा शुद्ध कूप आदिसे निकाले हुए जलके^१ द्वारा (मल-मूत्र) लेप और गन्ध जबतक दूर न हो, तबतक शुद्धि करनी चाहिये॥ ४३॥ नाहरेन्मृत्तिकां विप्रः पांशुलान्न च कर्दमात्।|विप्र (द्विज)-को चाहिये कि वह शौचके लिये न मार्गान्नोषराद् देशाच्छौचावशिष्टा परस्य च॥ ४४॥|धूलकी ढेर एवं कीचड़युक्त स्थान, रास्ते, ऊसर भूमि, दूसरेके शौच करनेसे बची हुई, मन्दिर, कुएँ, ग्राम^२ और जलके अंदरसे मिट्टी ग्रहण न करे। शौचके अनन्तर पहले बताये गये विधानके अनुसार नित्य आचमन करे॥ ४४-४५॥ न देवायतनात् कूपाद् ग्रामात्र च जलात् तथा।| उपस्पृशेत् ततो नित्यं पूर्वोक्तेन विधानतः॥ ४५॥|
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १३॥
चौदहवाँ अध्याय
ब्रह्मचारीके आचारका वर्णन, गुरुसे अध्ययन आदिकी विधि, ब्रह्मचारीका धर्म, गुरु तथा गुरुपत्नीके साथ व्यवहारका वर्णन, वेदाध्ययन और गायत्रीकी महिमा, अनध्यायोंका वर्णन, ब्रह्मचारी-धर्मका उपसंहार
व्यास उवाच
एवं दण्डादिभिर्युक्तः शौचाचारसमन्वितः।
आहूतोऽध्ययनं कुर्याद् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्॥ १॥
नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात् साध्वाचारः सुसंयतः।
आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः॥ २॥
प्रतिश्रवणसम्भाषे शयानो न समाचरेत्।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः॥ ३॥
नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत्॥ ४॥
व्यासजीने कहा— इस प्रकार दण्ड आदिसे युक्त और शौचाचारसे सम्पन्न (ब्रह्मचारी)-को गुरुजीके द्वारा बुलाये जानेपर उनके अभिमुख होकर अध्ययन करना चाहिये। सदाचारसम्पन्न और जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी नित्य उत्तरीयसे दाहिना हाथ बाहर निकाले हुए गुरुके द्वारा बैठनेके लिये कहे जानेपर उनके सम्मुख^३ बैठे। सोते हुए, बैठे हुए, भोजन करते हुए, खड़े होकर तथा गुरुकी ओर पीठ करके उनकी किसी आज्ञाका ग्रहण या उनसे बातचीत नहीं करनी चाहिये। गुरुके पासमें शिष्यकी शय्या या आसन सदा गुरुकी शय्या एवं आसनकी अपेक्षा नीचा (कम ऊँचा) होना चाहिये। गुरुके देखते रहनेपर मनमाने ढंगसे नहीं बैठना चाहिये॥ १—४॥
^१ प्रवाहशून्य कहीं गड्ढे आदिमें एकत्र जल अपवित्र होता है। अपवित्र हाथ आदि साक्षात् नदी, तालाब आदिमें डालकर नहीं धोना चाहिये। किसी पात्रसे जल निकालकर ही धोना चाहिये।
^२ ग्रामके अंदरकी भूमि-लेप, चलने, थूकने आदिसे अपवित्र होती है। ग्रामके अंदरकी मिट्टी लेनेसे अनपेक्षित गड्ढा आदि होता है जो लोगोंके त्रासका कारण बनता है।
^३ यह श्लोक मनुस्मृति (२। १९३)-में उपलब्ध है। वहाँ 'नित्यमुद्धृतपाणिः' पाठ है। यही उपयुक्त है। इसका तात्पर्य यही है कि उत्तरीय (ऊपरसे चद्दर) धारण कर ही अध्ययन करना चाहिये तथा दाहिने हाथको चद्दरसे बाहर रखना चाहिये, क्योंकि अध्ययनमें दाहिने हाथका उपयोग होता है।