संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 320, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 320
३१० * कूर्मपुराण *
| नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम्।<br>न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषणचेष्टितम्॥ ५ ॥ | इनका (गुरुका) केवल नाम (सम्मानबोधक उपाधि आदिसे शून्य नाम) परोक्षमें भी नहीं लेना चाहिये। इनके चलनेकी क्रिया, बात करनेके ढंग और अन्य क्रियाओंकी नकल उपहासकी दृष्टिसे नहीं करनी चाहिये॥ ५॥ |
| गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा चापि प्रवर्तते।<br>कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः॥ ६ ॥<br><br>दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिक स्त्रियाः।<br>न चैवास्योत्तरं ब्रूयात् स्थितो नासीत संनिधौ॥ ७ ॥ | गुरुका जहाँ परीवाद (विद्यमान दोषका कथन) हो रहा हो अथवा जहाँ उनकी निन्दा हो रही हो, वहाँ अपने दोनों कानोंको बंद कर ले अथवा वहाँसे अन्यत्र चला जाय। दूर विद्यमान शिष्य (किसी अन्यको गुरुकी पूजाके लिये नियुक्त कर उसके द्वारा) गुरुकी पूजा न करवाये, (यदि स्वयं गुरुके समीप जाकर पूजा करनेमें समर्थ हो। स्वयं गुरुके समीप जानेमें असमर्थ होनेपर तो अन्यके द्वारा भी गुरुकी पूजा करवायी जा सकती है।) क्रोधके आवेशमें रहनेपर शिष्यको स्वयं भी गुरुकी पूजा नहीं करनी चाहिये। यदि गुरु स्त्रीके समीप हों तो उस समय उनकी पूजा नहीं करनी चाहिये। गुरुकी बातका उत्तर नहीं देना चाहिये और गुरुके निकट रहनेपर उनकी आज्ञाके बिना बैठना भी नहीं चाहिये॥ ६-७॥ |
| उदकुम्भं कुशान् पुष्पं समिधोऽस्याहरेत् सदा।<br>मार्जनं लेपनं नित्यमङ्गानां वै समाचरेत्॥ ८ ॥<br><br>नास्य निर्माल्यशयनं पादुकोपानहावपि।<br>आक्रमेदासनं चास्य छायादीन् वा कदाचन॥ ९ ॥<br><br>साधयेद् दन्तकाष्ठादीन् लब्धं चास्मै निवेदयेत्।<br>अनापृच्छ्य न गन्तव्यं भवेत् प्रियहिते रतः॥ १० ॥ | (शिष्यको चाहिये कि) गुरुके लिये सर्वदा जलसे पूर्ण घड़ा, कुश, पुष्प तथा समिधा लाये और नित्य उनके अङ्गोंका मार्जन (गुरुको स्नान कराना) तथा (गन्धादिद्वारा) लेपन (शरीरका सुगन्धीकरण) करे। उनके निर्माल्य (गुरुकी सेवामें समर्पित माला आदि), शय्या, खड़ाऊँ, जूता, आसन तथा छाया आदिका कभी भी लंघन नहीं करना चाहिये। गुरुके लिये दन्तकाष्ठ (दाँतोंको स्वच्छ करनेके लिये दतुअन) आदि लाये और (भिक्षादिमें) प्राप्त पदार्थोंको गुरुको निवेदित करे। गुरुसे बिना पूछे कहीं जाये नहीं तथा सदा गुरुके प्रिय तथा हित करनेमें लगा रहे॥ ८-१०॥ |
| न पादौ सारयेदस्य संनिधाने कदाचन।<br>जृम्भितं हसितं चैव कण्ठप्रावरणं तथा।<br>वर्जयेत् संनिधौ नित्यमवस्फोटनमेव च॥ ११ ॥<br><br>यथाकालमधीयीत यावन्न विमना गुरुः।<br>आसीताधो गुरोः कूर्चे फलके वा समाहितः॥ १२ ॥ | गुरुके समीप कभी भी पैर फैलाकर बैठना नहीं चाहिये और उनके समीप जँभाई, हँसी, कण्ठाच्छादन (सुन्दर माला, हार आदि गलेमें पहनना) तथा ताली इत्यादिकी ध्वनि (ताल ठोंकना आदि निरर्थक एवं उद्दण्डता-सूचक हलचल) न करे। अध्ययन तबतक करते रहना चाहिये जबतक गुरु बेमन न हो जायँ (अध्यापनके प्रति सोत्साह रहें)। सावधानीपूर्वक गुरुके सम्मुख नीचे कुशासन या काष्ठासन इत्यादिपर बैठना चाहिये॥ ११-१२॥ |