भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १४ * । ३११


आसने शयने याने नैव तिष्ठेत् कदाचन।<br>धावन्तमनुधावेत् गच्छन्तमनुगच्छति॥ १३॥गुरुके आसन, शय्या तथा यानपर कभी भी नहीं बैठना चाहिये। गुरुके दौड़नेपर उनके पीछे दौड़े और चलनेपर उनके पीछे चलना चाहिये॥ १३॥
गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च।<br>आसीत गुरुणा सार्धं शिलाफलकनौषु च॥ १४॥बैल, ऊँट एवं घोड़ेकी सवारी, प्रासाद, प्रस्तर, चटाई, शिलाखण्ड तथा नौकामें गुरुके साथ समान आसनपर बैठा जा सकता है (ऐसी जगहोंपर भी नीचे ही बैठा जाय ऐसा नियम नहीं है)। ब्रह्मचारी सदा जितेन्द्रिय रहे, अपने मनको वशमें रखे, क्रोध न करे, पवित्र रहे, सदा मधुर और हित करनेवाली वाणीका प्रयोग करे॥ १४-१५॥
जितेन्द्रियः स्यात् सततं वश्यात्माक्रोधनः शुचिः।<br>प्रयुञ्जीत सदा वाचं मधुरां हितभाषिणीम्॥ १५॥
गन्धमाल्यं रसं कल्यां शुक्तं प्राणिविहिंसनम्।<br>अभ्यङ्गं चाञ्जनोपानच्छत्रधारणमेव च॥ १६॥ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रयत्नपूर्वक सुगन्धित पदार्थों, माला, रस (तीखे रसवाले गुड़ आदि), मद्य, शुक्त* अर्थात् गुड़ आदिके मिश्रणसे बने मादक तीक्ष्ण पदार्थ, प्राणियोंकी हिंसा, तैल आदिका मर्दन, अञ्जन, जूता, छाताका धारण करना, काम, लोभ, भय, निद्रा, गायन, वादन तथा नृत्य, डाँट-फटकार लगाना, निन्दा, स्त्रीदर्शन तथा उसका स्पर्श, दूसरोंको मारना और चुगलखोरी आदिका परित्याग करे॥ १६-१७॥
कामं लोभं भयं निद्रां गीतवादित्रनर्तनम्।<br>आतर्जनं परीवादं स्त्रीप्रेक्षालम्भनं तथा।<br>परोपघातं पैशुन्यं प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥ १७॥
उदकुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकां कुशान्।<br>आहरेद् यावदर्थानि भैक्ष्यं चाहरहश्चरेत्॥ १८॥जलका घड़ा, पुष्प, गोबर, मिट्टी और कुश—इन्हें प्रयोजन भर ही लाना चाहिये। प्रतिदिन भिक्षा माँगनी चाहिये। कृत्रिम लवण और जो भी बासी वस्तु हो, उन सबका त्याग करना चाहिये। (ब्रह्मचारीको) नृत्य नहीं देखना चाहिये और गायन आदिसे निःस्पृह रहना चाहिये। सूर्यकी ओर (उदय-अस्तके समय तथा अपवित्र दशामें) नहीं देखना चाहिये एवं दन्तधावन नहीं करना चाहिये। एकान्तमें अपवित्र स्त्रियों, शूद्रों तथा अन्त्यजोंसे सम्भाषण नहीं करना चाहिये॥ १८-२०॥
कृतं च लवणं सर्वं वर्ज्यं पर्युषितं च यत्।<br>अनृत्यदर्शी सततं भवेद् गीतादिनिःस्पृहः॥ १९॥
नादित्यं वै समीक्षेत न चरेद् दन्तधावनम्।<br>एकान्तमशुचिस्त्रीभिः शूद्रान्त्यैरभिभाषणम्॥ २०॥
गुरूच्छिष्टं भेषजार्थं प्रयुञ्जीत न कामतः।<br>मलापकर्षणस्नानं नाचरेद्धि कदाचन॥ २१॥गुरुसे बचा हुआ भोजन लोभवश नहीं करना चाहिये। कभी भी शरीरके मैलको दूर करते हुए रागवश स्नान नहीं करना चाहिये। (ब्रह्मचर्यव्रतका अङ्गभूत स्नान ही यथाविधि करना चाहिये)। विप्रको (द्विजको) गुरुका कभी मनसे भी त्याग करनेका विचार नहीं करना चाहिये। मोह या लोभसे इनका (गुरुका) त्याग करनेसे वह (द्विज) पतित हो जाता है॥ २१-२२॥
न कुर्यान्मानसं विप्रो गुरोस्त्यागे कदाचन।<br>मोहाद् वा यदि वा लोभात् त्यक्तेन पतितो भवेत्॥ २२॥

* कुल्लूकभट्टके अनुसार शुक्त वह वस्तु है जो स्वभावतः मधुर हो, पर कालवश जलमें रखने आदिसे खट्टी हो गयी हो (मनु० २। १७७ की व्याख्या)।