संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 322, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 322
३१२ * कूर्मपुराण *
| लौकिकं वैदिकं चापि तथाध्यात्मिकमेव च।<br>आददीत यतो ज्ञानं न तं द्रुह्येत् कदाचन॥ २३॥<br><br>गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः।<br>उत्पथप्रतिपन्नस्य मनुस्त्यागं समब्रवीत्॥ २४॥<br>गुरोर्गुरौ संनिहिते गुरुवद् भक्तिमाचरेत्।<br>न चातिसृष्टो गुरुणा स्वान् गुरून्नभिवादयेत्॥ २५॥<br><br>विद्यागुरुष्वेतदेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु।<br>प्रतिषेधत्सु चाधर्माद्धितं चोपदिशत्स्वपि॥ २६॥<br><br>श्रेयस्सु गुरुवद् वृत्तिं नित्यमेव समाचरेत्।<br>गुरुपुत्रेषु दारेषु गुरोश्चैव स्वबन्धुषु॥ २७॥<br>बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि।<br>अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति॥ २८॥<br><br>उत्सादनं वै गात्राणां स्नापनोच्छिष्टभोजने।<br>न कुर्याद् गुरुपुत्रस्य पादयोः शौचमेव च॥ २९॥<br><br>गुरुवत् परिपूज्यास्तु सवर्णा गुरुयोषितः।<br>असवर्णास्तु सम्पूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः॥ ३०॥<br>अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च।<br>गुरुपत्न्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम्॥ ३१॥<br><br>गुरुपत्नी तु युवती नाभिवाद्येह पादयोः।<br>कुर्वीत वन्दनं भूम्यामसावहमिति ब्रुवन्॥ ३२॥ | जिससे लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक किसी भी प्रकारका ज्ञान प्राप्त करे, उससे कभी भी द्रोह न करे। महापातकयुक्त कार्य और अकार्यको न जाननेवाले तथा कुमार्गगामी गुरुका त्याग<sup>१</sup> करना चाहिये—ऐसा मनुका कहना है॥ २३-२४॥<br>गुरोके गुरुका यदि संनिधान प्राप्त हो तो उनके प्रति गुरुके समान ही अभिवादन आदि व्यवहार करना चाहिये और (गुरुगृहमें रहते हुए शिष्यको) गुरुकी अनुमतिके बिना अपने (माता-पितादि) गुरुजनोंका अभिवादन नहीं करना चाहिये। विद्या देनेवाले गुरुओं (उपाध्यायों), अपने जन्मके कारण-रूप (माता-पितादि), अधर्मसे रोकनेवालों और हितकारी धर्मतत्त्वका उपदेश देनेवालोंके प्रति नित्य इसी प्रकारका गुरुके समान ही आचरण करना चाहिये। विद्या एवं तपमें अपनी अपेक्षा अधिक समृद्ध लोगोंके प्रति, अपनी अवस्थाकी दृष्टिसे बड़े, समानजातीय गुरुपत्नी-पुत्रोंके प्रति और गुरुकी ज्ञाति (बन्धु-बान्धव) पितृव्य (चाचा) आदिके प्रति सदा गुरुके समान ही आदरपूर्ण व्यवहार करना चाहिये॥ २५-२७॥<br>अपनेसे छोटा गुरुका पुत्र अथवा समान अवस्थावाला तथा यज्ञकर्ममें (अपना) शिष्य होनेपर भी यदि वह अध्यापन करता हो तो गुरुके समान ही सम्मान प्राप्त करने योग्य है। किंतु गुरु-पुत्रके शरीरकी मालिश, उसे स्नान कराना, उसका उच्छिष्ट भोजन तथा उसके पादका प्रक्षालन नहीं करना चाहिये। गुरुकी सवर्ण<sup>२</sup> स्त्रियाँ गुरुके समान ही पूज्य हैं, पर (गुरुकी) असवर्ण पत्नियोंकी केवल प्रत्युत्थान (उनके आनेपर खड़े हो जाना) एवं अभिवादनके द्वारा ही पूजा करनी चाहिये॥ २८-३०॥<br>गुरुपत्नीके शरीरमें उबटन लगाना, उन्हें स्नान कराना, उनके शरीरकी मालिश और केशोंके सँवारनेका कार्य नहीं करना चाहिये। यदि गुरुपत्नी युवावस्थावाली हों तो उनके चरणोंको छूकर प्रणाम नहीं करना चाहिये। 'मैं अमुक हूँ' ऐसा कहते हुए उनके सम्मुख पृथ्वीपर प्रणाम करना चाहिये॥ ३१-३२॥ |
१-यहाँ त्यागका तात्पर्य इतना ही है कि ऐसे गुरुके संसर्गसे स्वयंमें दोष आ सकते हैं, अतः अपनी रक्षाकी दृष्टिसे ऐसे गुरुके संसर्गमें नहीं रहना चाहिये तथा ऐसे गुरुके प्रति उदासीनभाव अपना लेना चाहिये, द्वेषभाव कथमपि नहीं होना चाहिये।
२-कलियुगसे भिन्न युगोंमें असवर्ण विवाह किया जा सकता है। इससे न पुण्य होता है न पाप। यह असवर्ण विवाह भी अपनेसे ऊँची जातिमें नहीं होता है।