संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १४ * ३१३
विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम्। गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन्॥ ३३॥
मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूश्चाथ पितृष्वसा। सम्पूज्या गुरुपत्नीव समास्ता गुरुभार्यया॥ ३४॥
भ्रातृभार्योपसंग्राह्या सवर्णाऽन्यह्न्यन्यपि। विप्रोष्य तूपसंग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः॥ ३५॥ पितृभगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि। मातृवद् वृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी॥ ३६॥
एवमाचारसम्पन्नमात्मवन्तमदाम्भिकम् । वेदमध्यापयेद् धर्मं पुराणाङ्गानि नित्यशः॥ ३७॥ संवत्सरोषिते शिष्ये गुरुर्ज्ञानमनिर्दिशन्। हरते दुष्कृतं तस्य शिष्यस्य वसतो गुरुः॥ ३८॥
आचार्यपुत्रः शुश्रूषुुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः। शक्तोऽन्नदोऽर्थी स्वःसाधुरध्याप्या दश धर्मतः॥ ३९॥
कृतज्ञश्च तथाद्रोही मेधावी शुभकृन्नरः। आप्तः प्रियोऽथ विधिवत् षडध्याप्या द्विजातयः। एतेषु ब्राह्मणो दानमन्यत्र तु यथोदितान्॥ ४०॥
आचम्य संयतो नित्यमधीयीत उदङ्मुखः। उपसंगृह्य तत्पादौ वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्। अधीष्व भो इति ब्रूयाद् विरामोऽस्त्विति चारमेत्॥ ४१॥
पर यदि शिष्य प्रवाससे आये तो शिष्टोंके आचारका स्मरण करते हुए युवती गुरुपत्नीका पादग्रहणपूर्वक ही अभिवादन करे। मौसी, मामी, सास और बुआ (फुआ)—ये गुरुकी पत्नीके समान पूज्य हैं। ये सभी गुरुपत्नीके समान ही हैं। भाईकी सवर्ण स्त्री (भाभी)-को प्रतिदिन अवश्य प्रणाम करना चाहिये। ज्ञाति (पितापक्षके चाचा आदि), सम्बन्धी (मातापक्षके नाना आदि)-की पत्नियोंका तो प्रवाससे आनेपर अवश्य अभिवादन करना चाहिये॥ ३३-३५॥
माता-पिताकी बहिन तथा अपनी बड़ी बहिनके प्रति भी माताके समान व्यवहार करना चाहिये, किंतु माता इनसे श्रेष्ठ होती है। इस प्रकारके सदाचारसे सम्पन्न, आत्मवान् तथा दम्भरहित (ब्रह्मचारी)-को ही नित्य वेद, धर्मशास्त्र, पुराण और वेदाङ्गोंको पढ़ाना चाहिये॥ ३६-३७॥
एक वर्षसे यथाविधि गुरुकी सेवा करते हुए उनके समीप निवास करनेवाले शिष्यको यदि गुरु ज्ञानका उपदेश देना प्रारम्भ नहीं करते हैं तो शिष्यके दुष्कृत उनमें आ जाते हैं। आचार्यका पुत्र, सेवा-शुश्रूषा करनेवाला, ज्ञान प्रदान करनेवाला (एक विद्या देकर दूसरी विद्या लेनेवाला), धार्मिक, पवित्र, शक्तिसम्पन्न (अध्ययनके सामर्थ्यसे युक्त), अन्नदाता (गुरुकी अपेक्षाके अनुसार पर्याप्त अन्न देनेवाला), अर्थी (गुरुकी सेवामें पर्याप्त धन देनेवाला), साधु (शीलवान्) तथा आत्मीय—ये दस धर्मकी मर्यादासे अध्यापन कराने योग्य हैं। कृतज्ञ, अद्रोही, मेधासम्पन्न, कल्याण करनेवाला, विश्वस्त तथा प्रिय व्यक्ति—ये छः प्रकारके द्विजाति भी विधिपूर्वक पढ़ाने योग्य हैं। इन्हें ब्रह्मज्ञान, वेदज्ञान प्रदान करना चाहिये। इनसे अतिरिक्त जो जिज्ञासु हों उन्हें अन्य यथापेक्ष ज्ञान देना चाहिये॥ ३८-४०॥
आचमन करके संयत होकर उत्तरकी ओर मुख करके गुरुके चरणोंमें प्रणामकर उनके मुखकी ओर देखते हुए नित्य अध्ययन करना चाहिये। (गुरुके द्वारा) 'पढ़ो' कहनेपर अध्ययन प्रारम्भ करे और 'विराम हो' ऐसा कहनेपर अध्ययन बंद कर दे॥ ४१॥