संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ * कूर्मपुराण *
प्राक्कूलान् पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः। प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्तत ओङ्कारमर्हति॥ ४२॥
ब्राह्मणः प्रणवं कुर्यादन्ते च विधिवद् द्विजः। कुर्यादध्ययनं नित्यं स ब्रह्माञ्जलिपूर्वतः॥ ४३॥
सर्वेषामेव भूतानां वेदश्चक्षुः सनातनम्। अधीयीताप्ययं नित्यं ब्राह्मण्याच्च्यवतेऽन्यथा॥ ४४॥
योऽधीयीत ऋचो नित्यं क्षीराहुत्या स देवताः। प्रीणाति तर्पयन्त्येनं कामैस्तृप्ताः सदैव हि॥ ४५॥
यजूंष्यधीते नियतं दध्ना प्रीणाति देवताः। सामान्यधीते प्रीणाति घृताहुतिभिरन्वहम्॥ ४६॥
अथर्वाङ्गिरसो नित्यं मध्वा प्रीणाति देवताः। धर्माङ्गानि पुराणानि मांसैस्तर्पयते सुरान्॥ ४७॥
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमाश्रितः। गायत्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः॥ ४८॥
सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्। गायत्रीं वै जपेन्नित्यं जपयज्ञः प्रकीर्तितः॥ ४९॥
गायत्रीं चैव वेदांश्च तुलयाऽतोलयत् प्रभुः। एकतश्चतुरो वेदान् गायत्रीं च तथैकतः॥ ५०॥
ओंकारमादितः कृत्वा व्याहृतीस्तदनन्तरम्। ततोऽधीयीत सावित्रीमेकाग्रः श्रद्धयान्वितः॥ ५१॥
पूर्व दिशाकी ओर अग्रभागवाले कुशोंके आसनपर बैठकर, दोनों हाथोंमें विद्यमान पवित्र कुशोंसे पावित (पवित्रीकृत) होकर तथा तीन प्राणायामोंद्वारा पवित्र होनेके अनन्तर ही (द्विज) अध्ययनके लिये ओंकारके उच्चारणका अधिकारी होता है। द्विजन्मा (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य)-को (स्वाध्यायके) आरम्भ और अन्तमें विधिपूर्वक प्रणवका उच्चारण करना चाहिये। नित्य अञ्जलिबद्ध होकर ही अध्ययन (स्वाध्याय) करना चाहिये। सभी प्राणियोंके लिये वेद सनातन नेत्र-रूप हैं। (ब्राह्मणको) नित्य इनका अध्ययन करना चाहिये अन्यथा वह ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाता है॥ ४२-४४॥
जो द्विज नित्य ऋग्वेदका अध्ययन करता है और देवताओंको क्षीरकी आहुतियोंसे प्रसन्न करता है, देवता उसकी कामनाएँ पूर्णकर सदैव तृप्त करते हैं। (ऐसे ही) जो द्विज नियमपूर्वक याजुष मन्त्रोंका अध्ययन करता है और दधि (-की आहुतियों)-से देवताओंको प्रसन्न करता है, उसकी भी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। इसी प्रकार जो द्विज साममन्त्रोंका अध्ययन करता और प्रतिदिन घृतकी आहुतियोंसे देवोंको प्रसन्न करता है तो उसकी भी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। अथर्ववेदका भी अध्ययन करनेवाला (द्विज) मधु (-की आहुतियों)-द्वारा देवताओंको प्रसन्नकर अभिलषित प्राप्त करता है। धर्मशास्त्र, वेदाङ्गों तथा पुराणोंका अध्ययन करनेवाले यथोपलब्ध पदार्थोंसे देवताओंको संतृप्तकर इष्ट प्राप्त करते हैं॥ ४५-४७॥
नित्यकर्मकी विधिका आश्रय लेकर वनमें जाकर सावधानीपूर्वक जलके समीप नियमितरूपसे गायत्री (-मन्त्र)-का जप भी करे। गायत्रीदेवी (मन्त्र)-का हजार बार जप करना श्रेष्ठ, सौ बारका जप मध्यम तथा दस बार जप करना निम्न कोटिका है। गायत्रीका नित्य जप करना चाहिये। इसे जपयज्ञ कहा गया है। ईश्वरने गायत्री और वेदोंको तुलामें तौला। तुलामें एक ओर चारों वेदोंको और एक ओर गायत्रीको रखा (समग्र वेदोंका सार गायत्री-मन्त्र वेदोंके समान ही रहा)॥ ४८-५०॥
आदिमें ओंकार लगाकर तदनन्तर (भूर्भुवः स्वः) महाव्याहृतियोंके साथ गायत्री (-मन्त्र)-का श्रद्धापूर्वक एकाग्रमनसे जप करना चाहिये॥ ५१॥