संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १४ * | ३१५ |
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पुराकल्पे समुत्पन्ना भूर्भुवःस्वः सनातनाः।
महाव्याहृतयस्तिस्रः सर्वाशुभनिबर्हणाः ॥ ५२ ॥
प्रधानं पुरुषः कालो विष्णुर्ब्रह्मा महेश्वरः।
सत्त्वं रजस्तमस्तिस्रः क्रमाद् व्याहृतयः स्मृताः॥ ५३ ॥
ओंकारस्तत् परं ब्रह्म सावित्री स्यात् तदक्षरम्।
एष मन्त्रो महायोगः सारात् सार उदाहृतः ॥ ५४ ॥
योऽधीतेऽहन्यहन्येतां गायत्रीं वेदमातरम्।
विज्ञायर्थं ब्रह्मचारी स याति परमां गतिम्॥ ५५॥
गायत्री वेदजननी गायत्री लोकपावनी।
न गायत्र्याः परं जप्यमेतद् विज्ञाय मुच्यते॥ ५६ ॥
श्रावणस्य तु मासस्य पौर्णमास्यां द्विजोत्तमाः।
आषाढ्यां प्रौष्ठपद्यां वा वेदोपाकरणं स्मृतम्॥ ५७ ॥
उत्सृज्य ग्रामनगरं मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान्।
अधीयीत शुचौ देशे ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ५८ ॥
पुष्ये तु छन्दसां कुर्याद् बहिरुत्सर्जनं द्विजः।
माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्ने प्रथमेऽहनि॥ ५९॥
छन्दांस्यूर्ध्वमथोऽभ्यस्येच्छुक्लपक्षेषु वै द्विजः।
वेदाङ्गानि पुराणानि कृष्णपक्षे च मानवम्॥ ६०॥
इमान् नित्यमनध्यायानधीयानो विवर्जयेत्।
अध्यापनं च कुर्वाणो ह्यभ्यस्यन्नपि यत्नतः ॥ ६१ ॥
कर्णश्रवेऽनिले रात्रौ दिवा पांशुसमूहने।
विद्युत्स्तनितवर्षेषु महोल्कानां च सम्प्लवे।
आकालिकमनध्यायमेतेष्वाह प्रजापतिः ॥ ६२ ॥ | प्राचीन कल्पमें सभी प्रकारके अमङ्गलोंको दूर करनेवाली 'भूः' 'भुवः' तथा 'स्वः' ये तीन सनातन महाव्याहृतियाँ समुद्भूत हुईं। ये तीनों व्याहृतियाँ क्रमशः प्रधान, पुरुष तथा काल और विष्णु, ब्रह्मा, महेश्वर एवं सत्त्व, रज तथा तमोगुणरूप कही गयी हैं। ओंकार परम ब्रह्मस्वरूप और सावित्री अविनश्वर परम तत्त्वरूप है। इस मन्त्रको महायोग और सारोंका भी सार-रूप कहा गया है। जो ब्रह्मचारी (गायत्री-मन्त्रके) अर्थको जानते हुए प्रत्येक दिन इन वेदमाता गायत्रीका अध्ययन करता है (जप करता है), उसे परमगति प्राप्त होती है। गायत्री वेदोंकी माता और लोकको पवित्र करनेवाली है। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र जपने योग्य नहीं है। इसके ज्ञानसे मुक्ति मिल जाती है॥ ५२-५६॥<br><br>श्रेष्ठ द्विजो ! श्रावण, आषाढ़ अथवा भाद्रपद मासकी पौर्णमासीको (अपने-अपने गृह्यसूत्रानुसार) वेदोंका उपाकर्म (संस्कारपूर्वक वेदग्रहण) करना बतलाया गया है। ग्राम और नगरको छोड़कर ब्रह्मचारी ब्राह्मण (द्विजमात्र)-को एकाग्रचित्तसे पवित्र स्थानमें साढ़े पाँच महीनेतक (वेदोंका) अध्ययन करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि वह (पौष मासके) पुष्य नक्षत्रमें अथवा माघ मासके प्रथम दिन पूर्वाह्नमें (ग्रामके) बाहर वेदोंका उत्सर्जन (उत्सर्ग नामका संस्कारविशेष) करे। इसके बाद द्विजको शुक्लपक्षमें वेदोंका और कृष्णपक्षमें वेदाङ्गों, पुराण तथा मानवधर्मशास्त्र (मनुस्मृति आदि)-का अभ्यास करना चाहिये ॥ ५७-६०॥<br><br>अध्ययन करनेवालेको इन (अग्रनिर्दिष्ट) अनध्यायोंमें अध्ययनका सदा परित्याग करना चाहिये। इसी प्रकार अध्यापन और अभ्यास करते हुए भी प्रयत्नपूर्वक अनध्यायोंमें अध्ययनका त्याग करना चाहिये। प्रजापति (ब्रह्मा)-ने कहा है कि रात्रिमें कानोंसे सुने जाने योग्य वायुके बहते रहनेपर, दिनमें धूलके समूहको उड़ा लेनेमें समर्थ वायुके बहते रहनेपर, विद्युत्की चमक एवं (मेघ) गर्जनके साथ वर्षा होनेपर और बड़ी-बड़ी उल्काओंके इधर-उधर गिरते रहनेपर आकालिक (जबसे ये निमित्त आरम्भ हों तबसे अग्रिम दिन सूर्योदयपर्यन्त) अनध्याय होता है॥ ६१-६२॥