भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१६ * कूर्मपुराण *


एतानभ्युदितान् विद्याद् यदा प्रादुष्कृताग्निषु।<br>तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चाभ्रदर्शने॥ ६३॥अग्निहोत्रके लिये प्रज्वलित अग्निकी अवस्था (प्रातः-सायं-संध्याकाल)-में जब ये सभी (उत्पात) एक साथ प्रकट हों और बिना ऋतुके मेघ दिखलायी पड़ें तो अनध्याय समझना चाहिये।
निर्घाते भूमिचलने ज्योतिषां चोपसर्जने।<br>एतानाकालिकान् विद्यादनध्यायानृतावपि॥ ६४॥वज्रपात, भूकम्प, सूर्य-चन्द्रका ग्रहण एवं अन्य ताराओंके उपसर्ग (टूटना आदि) होनेपर, ऋतु होनेपर भी आकालिक (इन निमित्तोंके प्रारम्भसे अग्रिम दिन सूर्योदयपर्यन्त) अनध्याय समझना चाहिये।
प्रादुष्कृतेष्वग्निषु तु विद्युत्स्तनितनिस्वने।<br>सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषरात्रौ यथा दिवा॥ ६५॥<br>नित्यानध्याय एव स्याद् ग्रामेषु नगरेषु च।<br>धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च नित्यशः॥ ६६॥अग्निके प्रकट होने, बिजलीके चमकने तथा मेघके गर्जन होनेपर प्रकाश रहनेपर भी अनध्याय होता है। दिनके समान ही रात्रिमें भी अनध्याय होता है॥ ६३–६५॥<br><br>धर्ममें निपुणता प्राप्त करनेकी इच्छावालोंके लिये नगर, ग्राम एवं दुर्गन्धयुक्त स्थानमें नित्य ही अनध्याय होता है।
अन्तःशवगते ग्रामे वृषलस्य च संनिधौ।<br>अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च॥ ६७॥ग्राममें शव पड़े रहनेपर, अधार्मिक जनके समीप रहनेपर, रुदन होने और मनुष्योंका समूह (कार्यान्तरके लिये) एकत्र होनेपर अनध्याय होता है।
उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्रे च विसर्जने।<br>उच्छिष्टः श्राद्धभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत्॥ ६८॥जलके मध्य, आधी रातमें, मल-मूत्रके विसर्जनके समय, उच्छिष्ट अवस्थामें और श्राद्धमें भोजन करनेपर (श्राद्धमें निमन्त्रणसे लेकर श्राद्ध-भोजनके दिन-राततक) मनसे भी (वेदादिका) चिन्तन नहीं करना चाहिये।
प्रतिगृह्य द्विजो विद्वानेकोद्दिष्टस्य केतनम्।<br>त्र्यहं न कीर्तयेद् ब्रह्म राज्ञो राहोश्च सूतके॥ ६९॥विद्वान् द्विजको एकोद्दिष्टका निमन्त्रण स्वीकार कर, राजाके पुत्रजन्म आदिके सूतक तथा राहुके (ग्रहणजन्य) सूतकमें तीन दिनतक वेदका अध्ययन नहीं करना चाहिये।
यावदेकोऽनुद्दिष्टस्य स्नेहो गन्धश्च तिष्ठति।<br>विप्रस्य विदुषो देहे तावद् ब्रह्म न कीर्तयेत्॥ ७०॥ब्राह्मणके शरीरमें जबतक एकोद्दिष्ट-श्राद्ध-सम्बन्धी¹ भोजनके समयका (घृत आदि) स्निग्ध द्रव्य एवं (सुगन्धित द्रव्यका) लेप रहे, तबतक विद्वान् ब्राह्मणको वेदाध्ययन नहीं करना चाहिये॥ ६६–७०॥
शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा चैवावसक्थिकाम्।<br>नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च॥ ७१॥सोते हुए, उकडूँ बैठे हुए (आसनारूढपाद), दोनों जानुओंको वस्त्रादिसे बाँधे हुए, मांस और सूतकादिसे सम्बन्धित अन्न खाकर,
नीहारे बाणशब्दे च संध्ययोरुभयोरपि।<br>अमावास्यां चतुर्दश्यां पौर्णमास्यष्टमीषु च॥ ७२॥कुहरा पड़ते रहनेपर, बाणका शब्द होते समय, दोनों संध्याकालमें, अमावास्या, चतुर्दशी, पौर्णमासी तथा अष्टमी तिथियोंमें (अनध्याय होता है, अतः) अध्ययन नहीं करना चाहिये।
उपाकर्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षपणं स्मृतम्।<br>अष्टकासु त्वहोरात्रं ऋत्वन्त्यासु च रात्रिषु॥ ७३॥उपाकर्म और उत्सर्ग नामक कर्म करनेके अनन्तर तीन राततक अनध्याय होता है। अष्टकाओंमें² एक दिन-रात और ऋतुकी अन्तिम रात्रियोंमें अनध्याय होता है॥ ७१–७३॥

१-मूलमें 'एकोऽनुद्दिष्ट' पाठ है। कुल्लूकभट्ट (मनुस्मृति व्याख्याकार)-के अनुसार 'अनुद्दिष्ट' का उच्छिष्ट अर्थ है।
२-अगहन, पौष और माघमासोंमें कृष्णपक्षकी सप्तमी, अष्टमी और नवमी—इन तीन तिथियोंके समुदायको 'अष्टका' कहा जाता है।