भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

२९० * कूर्मपुराण *


आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धमथापि वा।<br>नासिकाग्रे समां दृष्टिमीषदन्मीलितेक्षणः॥ ५३॥<br><br>कृत्वाथ निर्भयः शान्तस्त्यक्त्वा मायामयं जगत्।<br>स्वात्मन्यवस्थितं देवं चिन्तयेत् परमेश्वरम्॥ ५४॥स्वस्तिक, पद्म अथवा अर्धासन बाँधकर नासिकाके अग्रभागमें कुछ-कुछ खुली हुई आँखोंसे दृष्टिको स्थिर करके निर्भय तथा शान्त होकर मायामय संसार (-के चिन्तन)-का परित्यागकर अपने आत्मामें स्थित परमेश्वर देवका चिन्तन करना चाहिये॥ ५३-५४॥
शिखाग्रे द्वादशाङ्गुल्ये कल्पयित्वाथ पङ्कजम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ५५॥<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>चिन्तयेत् परमं कोशं कर्णिकायां हिरण्मयम्॥ ५६॥<br><br>सर्वशक्तिमयं साक्षाद् यं प्राहुर्दिव्यमव्ययम्।<br>ओंकारवाच्यमव्यक्तं रश्मिजालसमाकुलम्॥ ५७॥<br><br>चिन्तयेत् तत्र विमलं परं ज्योतिर्यदक्षरम्।<br>तस्मिन् ज्योतिषि विन्यस्य स्वात्मानं तदभेदतः॥ ५८॥<br><br>ध्यायीताकाशमध्यस्थमीशं परमकारणम्।<br>तदात्मा सर्वगो भूत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥ ५९॥शिखाके अग्रभागमें बारह अंगुलके प्रदेशमें धर्मस्वरूप कन्दसे प्रादुर्भूत, ज्ञानरूप नालवाले, ऐश्वर्यरूप आठ दलोंवाले, वैराग्यरूपी कर्णिकासे युक्त अत्यन्त श्वेत एवं सुन्दर कमलकी कल्पना करे और उस कमलकी कर्णिकामें हिरण्मय श्रेष्ठ कोशका ध्यान करे। उस (कोश)-में विशुद्ध अविनाशी साक्षात् परम ज्योतिका ध्यान करे, जिसे सर्वशक्तिसम्पन्न, दिव्य, अव्यय, ओंकारसे वाच्य, अव्यक्त और प्रकाशकी किरण-मालाओंसे व्यास कहा गया है। उस ज्योतिमें अपने आत्माकी अभेदभावना कर आकाशके मध्यमें स्थित परम कारणस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करे और परमेश्वररूप एवं सर्वव्यापी होकर किसी भी अन्य वस्तुका चिन्तन न करे॥ ५५-५९॥
एतद् गुह्यतमं ध्यानं ध्यानान्तरमथोच्यते।<br>चिन्तयित्वा तु पूर्वोक्तं हृदये पद्ममुत्तमम्॥ ६०॥<br><br>आत्मानमथ कर्तारं तत्रानलसमत्विषम्।<br>मध्ये वह्निशिखाकारं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥ ६१॥<br><br>चिन्तयेत् परमात्मानं तन्मध्ये गगनं परम्।<br>ओंकारबोधितं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्॥ ६२॥यह अत्यन्त गुह्य ध्यान है। अब दूसरा ध्यान कहा जाता है। अपने हृदयदेशमें पूर्वमें कहे गये उत्तम कमलका चिन्तनकर उस कमलमें अग्निके समान तेजस्वी, कर्तारूप, पचीसवें तत्त्व पुरुषात्मक परमात्मरूप आत्माका चिन्तन करना चाहिये। उस परमात्माके भीतर परम आकाश (अवकाश) है (क्योंकि परमेश्वर विभु विराट् हैं)। ओंकारसे बोधित सनातन तत्त्व अच्युत शिव कहलाता है॥ ६०-६२॥
अव्यक्तं प्रकृतौ लीनं परं ज्योतिरनुत्तमम्।<br>तदन्तः परमं तत्त्वमात्माधारं निरञ्जनम्॥ ६३॥<br><br>ध्यायीत तन्मयो नित्यमेकरूपं महेश्वरम्।<br>विशोध्य सर्वतत्त्वानि प्रणवेनाथवा पुनः॥ ६४॥<br><br>संस्थाप्य मयि चात्मानं निर्मले परमे पदे।<br>प्लावयित्वात्मनो देहं तेनैव ज्ञानवारिणा॥ ६५॥<br><br>मदात्मा मन्मयो भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>तेनोद्धृत्य तु सर्वाङ्गमग्निरित्यादिमन्त्रतः।<br>चिन्तयेत् स्वात्मनीशानं परं ज्योतिःस्वरूपिणम्॥ ६६॥उसके भीतर अव्यक्त, प्रकृतिमें लीन, उत्तम परम ज्योति, परम तत्त्व, आत्माधार, निरञ्जन, नित्य, एकरूप महेश्वरका तन्मय होकर ध्यान करना चाहिये। अथवा प्रणवके द्वारा पुनः सभी तत्त्वोंका शोधनकर विशुद्ध परमपदरूप मुझमें अपने आत्माको स्थापित करे और उसी ज्ञानरूपी जलसे अपनी देहको आप्लावित करके मुझमें चित्त आसक्त करे तथा मेरे परायण होकर अग्निहोत्रका भस्म ग्रहण करे और 'अग्नि०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा भस्मसे अपने सम्पूर्ण शरीरको उपलिप्त कर अपने आत्मामें परम ज्योतिस्वरूप ईशानका चिन्तन करे॥ ६३-६६॥
  • अध्याय ११ * २९१

एष पाशुपतो योगः पशुपाशविमुक्तये।<br>सर्ववेदान्तसारोऽयमत्याश्रममिति श्रुतिः॥ ६७॥<br><br>एतत् परतरं गुह्यं मत्सायज्योपपादकम्।<br>द्विजातीनां तु कथितं भक्तानां ब्रह्मचारिणाम्॥ ६८॥<br><br>ब्रह्मचर्यमहिंसा च क्षमा शौचं तपो दमः।<br>संतोषः सत्यमास्तिक्यं व्रताङ्गानि विशेषतः॥ ६९॥<br><br>एकेनाप्यथ हीनेन व्रतमस्य तु लुप्यते।<br>तस्मादात्मगुणोपेतो मद्व्रतं वोढुमर्हति॥ ७०॥जीवको बन्धनरूप पाशसे मुक्त करनेके लिये यह पाशुपत नामक योग कहा गया है। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है और श्रुतिमें इस योगकी अवस्थाको सभी आश्रमोंकी अवस्थासे अतीत अवस्था (उत्कृष्ट अवस्था) बतलाया गया है। इसे अत्यन्त गुह्य और द्विजातियों, भक्तों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये मेरा सायुज्य प्रदान करनेवाला कहा गया है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, क्षमा, शौच, तप, दम, संतोष, सत्य तथा आस्तिकता—ये सभी (इस पाशुपत) व्रतके विशेष अङ्ग हैं। इनमेंसे एक (अङ्ग)-के भी न होनेसे इस (योग)-का व्रत लुप्त हो जाता है। इसलिये इन आत्मगुणों (ब्रह्मचर्य, अहिंसा आदि नौ व्रतके अङ्गों)-से युक्त साधक ही मेरा (पाशुपत) व्रत धारण कर सकता है॥ ६७-७०॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।<br>बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः॥ ७१॥<br><br>ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।<br>ज्ञानयोगेन मां तस्माद् यजेत परमेश्वरम्॥ ७२॥<br><br>अथवा भक्तियोगेन वैराग्येण परेण तु।<br>चेतसा बोधयुक्तेन पूजयेन्मां सदा शुचिः॥ ७३॥<br><br>सर्वकर्माणि संन्यस्य भिक्षाशी निष्परिग्रहः।<br>प्राप्नोति मम सायुज्यं गुह्यमेतन्मयोदितम्॥ ७४॥राग, भय और क्रोधसे रहित, मत्परायण और मेरे आश्रित अनेक लोग इस (पाशुपत) योगके द्वारा मेरा भाव प्राप्तकर पवित्र हो गये हैं। जो जिस प्रकार मेरे पास आते हैं, मैं भी उसी प्रकार उन्हें स्वीकार करता हूँ। इसलिये ज्ञानयोगके द्वारा मुझ परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। अथवा भक्तियोग, परम वैराग्य एवं ज्ञानयुक्त चित्तके द्वारा पवित्रतापूर्वक सदा मेरा पूजन करना चाहिये। सभी कर्मोंका परित्यागकर, भिक्षाका अन्न ग्रहण करते हुए अन्य कुछ भी संग्रह न करते हुए (साधना करनेवाला) साधक मेरा सायुज्य (नामक मोक्ष) प्राप्त करता है। यह मैंने गुह्य बात बतलायी॥ ७१-७४॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।<br>निर्ममो निरहंकारो यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ७५॥<br><br>संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।<br>मय्यर्पितमनो बुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ७६॥<br><br>यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।<br>हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स हि मे प्रियः॥ ७७॥जो सभी प्राणियोंसे द्वेष न करनेवाला, मित्रता करनेवाला, करुणायुक्त, ममतारहित और अहंकारसे रहित है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जो संतुष्ट रहनेवाला, निरन्तर योग-साधना करनेवाला, संयमित-चित्त, दृढ़निश्चयी और मुझमें मन तथा बुद्धि अर्पण करनेवाला है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जिससे किसी भी प्राणीको उद्वेग प्राप्त नहीं होता और किसी भी प्राणीसे जो उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे होनेवाले उद्वेगोंसे रहित है, वह मुझे प्रिय है॥ ७५-७७॥

२९२ * कूर्मपुराण *


अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।<br>सर्वारम्भपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥ ७८॥<br><br>तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित्।<br>अनिकेतः स्थिरमतिर्मद्भक्तो मामुपैष्यति॥ ७९॥<br><br>सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मत्परायणः।<br>मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं परमं पदम्॥ ८०॥जो किसी भी प्रकारकी अपेक्षा न रखनेवाला, पवित्र, कुशल (वेदशास्त्र-निषिद्धके त्यागमें सावधान) पक्षपातसे (शत्रु-मित्रभावसे) रहित, दुःखसे आक्रान्त होनेपर भी व्यथाका अनुभव न करनेवाला और सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग करनेवाला है, वह भक्तियुक्त पुरुष मेरा प्रिय है। जो निन्दा एवं स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस किसी भी पदार्थसे संतुष्ट रहनेवाला, गृहसे (गृहासक्तिसे) रहित है, वह स्थिर बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्राप्त करता है। मुझमें परायण रहनेवाला सभी कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत परमपद प्राप्त करता है॥ ७८–८०॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।<br>निराशीर्निर्ममो भूत्वा मामेकं शरणं व्रजेत्॥ ८१॥<br><br>त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।<br>कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव तेन निबध्यते॥ ८२॥<br><br>निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।<br>शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति तत्पदम्॥ ८३॥चित्तसे सभी कर्मोंको मुझमें अर्पितकर मत्परायण होते हुए आशा एवं ममताकी आसक्तिसे रहित होकर एकमात्र मेरी ही शरण ग्रहण करना चाहिये। कर्मफलकी आसक्तिका सर्वथा परित्यागकर नित्य संतुष्ट और (अन्य) आश्रयरहित (एकमात्र परमेश्वरको ही आश्रय समझनेवाला) व्यक्ति कर्मोंमें प्रवृत्त होते हुए भी उन कर्मोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। आशारहित, संयमित चित्तवाला, सब प्रकारके परिग्रहों (संचयों)-का परित्याग-कर केवल शरीर (रक्षा)-के निमित्त कर्म करते हुए भी (व्यक्ति) उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है॥ ८१–८३॥
यदृच्छालाभतुष्टस्य द्वन्द्वातीतास्य चैव हि।<br>कुर्वतो मत्प्रसादार्थं कर्म संसारनाशनम्॥ ८४॥<br><br>मन्मना मन्नमस्कारो मद्याजी मत्परायणः।<br>मामुपैष्यति योगीशं ज्ञात्वा मां परमेश्वरम्॥ ८५॥<br><br>मद्बुद्धयो मां सततं बोधयन्तः परस्परम्।<br>कथयन्तश्च मां नित्यं मम सायुज्यमाप्नुयुः॥ ८६॥<br><br>एवं नित्याभियुक्तानां मायेयं कर्मसान्वगम्।<br>नाशयामि तमः कृत्स्नं ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ८७॥अनायास जो उपलब्ध हो उसीमें संतुष्ट रहनेवाले और सभी प्रकारके सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित रहनेवाले पुरुषके द्वारा केवल मेरी प्रसन्नताके लिये किये गये कर्म संसार (रूपी बन्धन)-का विनाश करनेवाले हैं। मुझमें मन लगानेवाला, मुझे नमस्कार करनेवाला, मेरा पूजन करनेवाला और मुझे ही अपना परम अयन (आश्रय) समझनेवाला (योगी) मुझ योगके ईश परमेश्वरको जानकर मुझे प्राप्त कर लेता है। मुझमें बुद्धि रखनेवाले (साधक) सतत परस्पर मेरा बोध कराते हुए और नित्य मेरा वर्णन करते हुए मेरा सायुज्य प्राप्त करते हैं। इस प्रकार नित्य योगयुक्त पुरुषके माया (अज्ञान)-से उत्पन्न तथा उनसे भी उत्पन्न कर्मरूप समस्त अन्धकारका प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं नाश कर देता हूँ॥ ८४–८७॥
  • अध्याय ११ * । २९३
मद्बुद्धयो मां सततं पूजयन्तीह ये जनाः।<br>तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ ८८॥<br><br>येऽन्ये च कामभोगार्थं यजन्ते ह्यान्यदेवताः।<br>तेषां तदन्तं विज्ञेयं देवतानुगतं फलम्॥ ८९॥<br><br>ये चान्यदेवताभक्ताः पूजयन्तीह देवताः।<br>मद्भावनासमायुक्ता मुच्यन्ते तेऽपि भावतः॥ ९०॥<br><br>तस्मादनीश्वरानन्यांस्त्यक्त्वा देवानशेषतः।<br>मामेव संश्रयेदीशं स याति परमं पदम्॥ ९१॥<br>त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निःशोको निष्परिग्रहः।<br>यजेच्चामरणालिङ्गे विरक्तः परमेश्वरम्॥ ९२॥<br><br>येऽर्चयन्ति सदा लिङ्गं त्यक्त्वा भोगानशेषतः।<br>एकेन जन्मना तेषां ददामि परमैश्वरम्॥ ९३॥<br><br>परानन्दात्मकं लिङ्गं केवलं सन्निराञ्जनम्।<br>ज्ञानात्मकं सर्वगतं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ ९४॥<br>ये चान्ये नियता भक्तो भावयित्वा विधानतः।<br>यत्र क्वचन तल्लिङ्गमर्चयन्ति महेश्वरम्॥ ९५॥<br><br>जले वा वह्निमध्ये वा व्योम्नि सूर्येऽथ वान्यतः।<br>रत्नादौ भावयित्वेशमर्चयेल्लिङ्गमेश्वरम्॥ ९६॥<br><br>सर्वं लिङ्गमयं ह्येतत् सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।<br>तस्माल्लिङ्गेऽर्चयेदीशं यत्र क्वचन शाश्वतम्॥ ९७॥मुझमें बुद्धि लगानेवाले जो मनुष्य सतत मेरी पूजा करते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंके योग-क्षेमका मैं निर्वाह करता हूँ और जो दूसरे लोग अभिलषित विषयोंके उपभोगके लिये ही भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं, उनका अन्त विषयभोगतक ही समझना चाहिये, क्योंकि देवताके अनुसार ही फल भी होता है¹। जो दूसरे देवोंके भक्त हैं, वे यदि मेरी भावनासे युक्त होकर (दूसरे)देवताओंकी पूजा करते हैं अर्थात् दूसरे देवोंमें मेरी ही भावना करते हैं तो वे भी (मुझमें) भावना करनेके कारण मुक्त हो जाते हैं। अतएव समस्त अनीश्वर² देवताओंका परित्यागकर जो मुझ ईशका ही आश्रय ग्रहण करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है॥ ८८-९१॥<br><br>पुत्र (स्त्री, गृह) आदिमें आसक्तिका परित्यागकर और शोकरहित होकर तथा अपरिग्रही होकर विरक्त पुरुषको मृत्युपर्यन्त (शिव-) लिङ्गमें परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। जो सम्पूर्ण भोगोंका परित्यागकर सर्वदा लिङ्गका पूजन करते रहते हैं, उन्हें मैं एक जन्ममें ही परम ऐश्वर-पद (मोक्ष) प्रदान करता हूँ। परम आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, सद्रूप, निरञ्जन, ज्ञानात्मक और सर्वत्र व्याप्त (शिव-) लिङ्ग योगियोंके हृदय-प्रदेशमें अवस्थित रहता है॥ ९२-९४॥<br><br>नियमपूर्वक भक्ति करनेवाले दूसरे लोग विधि-पूर्वक जहाँ-कहीं भी (शिवलिङ्गकी) भावना करते हुए उस महेश्वर-लिङ्गकी अर्चना करते हैं। जलमें, अग्निके मध्यमें, आकाशमें, सूर्यमें, रत्न आदिमें अथवा अन्यत्र कहीं भी ईशकी भावना करके लिङ्गरूप ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये। यह सब कुछ लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतएव जहाँ-कहीं भी लिङ्गरूपमें शाश्वत ईशका अर्चन करना चाहिये॥ ९५-९७॥

१-देवताके अनुसार फलका तात्पर्य यह है कि जैसी भावनासे देवताकी आराधना की जाती है, वैसी भावनाके अनुसार ही देवता फल देते हैं, जिस रूपमें हम देवताको समझेंगे, उसी रूपमें देवता हमें लाभ देंगे। तत्-तत् फलोंके अधिष्ठाता रूपमें ही देवताकी आराधना करनेपर फलमात्र देकर देवता विरत हो जाते हैं।
२-एक ही देवता पूजककी दृष्टिमें तबतक अनीश्वर है, जबतक पूजक उसे किसी तुच्छ फलका अधिष्ठाता मात्र समझता है। यदि उसी देवताको परमेश्वरके भावसे निष्काम होकर पूर्ण समर्पण-भावके साथ पूजा जाय तो वह देवता अनीश्वर नहीं है, सर्वथा सेवनीय है।

२९४ * कूर्मपुराण *


अग्नौ क्रियावतामप्सु व्योम्नि सूर्ये मनीषिणाम् ।<br>काष्ठादिष्वेव मूर्खाणां हृदि लिङ्गं तु योगिनाम् ॥ ९८ ॥<br><br>यद्यनुत्पन्नविज्ञानो विरक्तः प्रीतिसंयुतः ।<br>यावज्जीवं जपेद् युक्तः प्रणवं ब्रह्मणो वपुः ॥ ९९ ॥<br><br>अथवा शतरुद्रीयं जपेदामरणाद् द्विजः ।<br>एकाकी यतचित्तात्मा स याति परमं पदम् ॥ १०० ॥<br><br>वसेद् वामरणाद् विप्रो वाराणस्यां समाहितः ।<br>सोऽपीश्वरप्रसादेन याति तत् परमं पदम् ॥ १०१ ॥<br><br>तत्रोत्क्रमणकाले हि सर्वेषामेव देहिनाम् ।<br>ददाति तत् परं ज्ञानं येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १०२ ॥<br><br>वर्णाश्रमविधिं कृत्स्नं कुर्वाणो मत्परायणः ।<br>तेनैव जन्मना ज्ञानं लब्ध्वा याति शिवं पदम् ॥ १०३ ॥<br><br>येऽपि तत्र वसन्तीह नीचा वा पापयोनयः ।<br>सर्वे तरन्ति संसारमीश्वरानुग्रहाद् द्विजाः ॥ १०४ ॥<br><br>किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसाम् ।<br>धर्मं समाश्रयेत् तस्मान्मुक्तये नियतं द्विजाः ॥ १०५ ॥<br><br>एतद् रहस्यं वेदानां न देयं यस्य कस्यचित् ।<br>धार्मिकायैव दातव्यं भक्ताय ब्रह्मचारिणे ॥ १०६ ॥<br><br>व्यास उवाच<br>इत्येतदुक्त्वा भगवानात्मयोगमनुत्तमम् ।<br>व्याजहार समासीनं नारायणमनामयम् ॥ १०७ ॥क्रियाशीलोंका^१ (लिङ्ग) अग्निमें, मनीषियोंका^२ जल, आकाश और सूर्यमें, अज्ञानियोंका^३ काष्ठ आदिमें और योगियोंका^४ लिङ्ग हृदयमें स्थित रहता है। यदि (ब्रह्म) विज्ञान उत्पन्न न हुआ हो तो विरक्त होकर (द्विजको) अत्यन्त प्रीतिसे ब्रह्मके प्रणवरूपी शरीरका यावज्जीवन जप करते हुए रहना चाहिये। अथवा एकाकी एवं संयत-चित्तवाले द्विजको मरणपर्यन्त शतरुद्रियका जप करना चाहिये, इससे उसे परम पद प्राप्त होता है। अथवा विप्रको^५ चाहिये कि मरणपर्यन्त समाहितचित्त होकर वाराणसीमें निवास करे। वह भी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे उत्कृष्ट परमपदको प्राप्त करता है। वहाँ (वाराणसीमें) सभी प्राणियोंको उनके प्राण निकलते समय (भगवान् शंकर) उस परम ज्ञानको प्रदान करते हैं, जिससे वे (पुनर्जन्मके) बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ९८-१०२ ॥<br><br>सम्पूर्ण वर्णाश्रम-विधिका पालन करते हुए मेरे परायण रहनेवाला अपने उसी जन्ममें (जिस जन्ममें वर्णाश्रम-धर्मका पालन कर रहा है) ज्ञान प्राप्तकर शिवपदको प्राप्त करता है। द्विजो! नीच अथवा पापयोनिवाले भी जो प्राणी वहाँ (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे सभी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे संसारको पार कर लेते हैं, किंतु जो पापाक्रान्त चित्तवाले हैं, उन्हें बहुत विघ्न होते हैं। इसलिये द्विजो! मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। यह वेदोंका रहस्य है, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये। धार्मिक तथा ब्रह्मचारी भक्तको ही प्रदान करना चाहिये ॥ १०३-१०६ ॥<br><br>व्यासजी बोले— इस प्रकार उत्तम आत्मयोगका वर्णन करके भगवान् (शंकर)-ने वहीं बैठे हुए प्रसन्नचित्त नारायणसे कहा— ॥ १०७ ॥

१-'क्रियाशील' से उन द्विजोंको समझना चाहिये जो श्रौत-स्मार्त क्रियाओंमें दत्तचित्त हैं। इनका प्रमुख आराध्य अग्नि होता है।
२-'मनीषी' से उन्हें समझना चाहिये जो यथाविधि श्रौत-स्मार्त क्रियाओंके अनुष्ठानसे शुद्धान्तःकरण होकर ब्रह्मनिष्ठाकी ओर अग्रसर हैं।
३-'अज्ञानी' शब्दसे उन्हें समझना चाहिये जो वेद-शास्त्रके प्रति निष्ठावान् हैं, पर ऐहलौकिक विविध ऐश्वर्योंके प्रति आसक्त हैं, इन्हें प्राप्त करनेके लिये उत्कण्ठित हैं।
४-'योगी' शब्दसे ब्रह्मनिष्ठको समझना चाहिये। ब्रह्मनिष्ठ होनेके पूर्व संयत एवं एकाग्रचित्त अनासक्त साधककी एक भूमिका होती है। इस भूमिकाके लोग भी यहाँ 'योगी' समझे जा सकते हैं।
५-सर्वप्रमुख होनेसे यहाँ 'विप्र' मात्रका उल्लेख है। यह 'विप्र' शब्द प्राणिमात्रका उपलक्षक है।

* अध्याय ११ *२९५
मयैतद् भाषितं ज्ञानं हितार्थं ब्रह्मवादिनाम्।<br>दातव्यं शान्तचित्तेभ्यः शिष्येभ्यो भवता शिवम्॥ १०८॥<br><br>उक्त्वैवमथ योगीन्द्रानब्रवीद् भगवानजः।<br>हिताय सर्वभक्तानां द्विजातीनां द्विजोत्तमाः॥ १०९॥<br><br>भवन्तोऽपि हि मज्ज्ञानं शिष्याणां विधिपूर्वकम्।<br>उपदेक्ष्यन्ति भक्तानां सर्वेषां वचनान्मम॥ ११०॥मैंने ब्रह्मवादियोंके कल्याणार्थ इस ज्ञानको कहा है। आप इस कल्याणकारी ज्ञानको शान्तचित्त शिष्योंको प्रदान करें। अजन्मा भगवान् (शंकर)-ने ऐसा कहनेके उपरान्त श्रेष्ठ योगियोंसे कहा—द्विजोत्तमो! सभी द्विजाति भक्तोंके कल्याणके लिये आप लोग भी मेरे कहनेसे सभी भक्त शिष्योंको मेरे ज्ञानका विधिपूर्वक उपदेश करें॥ १०८—११०॥
अयं नारायणो योऽहमीश्वरो नात्र संशयः।<br>नान्तरं ये प्रपश्यन्ति तेषां देयमिदं परम्॥ १११॥<br><br>ममैषा परमा मूर्तिर्नारायणसमाह्वया।<br>सर्वभूतात्मभूतस्था शान्ता चाक्षरसंज्ञिता॥ ११२॥<br><br>ये त्वन्यथा प्रपश्यन्ति लोके भेददृशो जनाः।<br>न ते मां सम्प्रपश्यन्ति जायन्ते च पुनः पुनः॥ ११३॥<br><br>ये त्विमं विष्णुमव्यक्तं मां वा देवं महेश्वरम्।<br>एकीभावेन पश्यन्ति न तेषां पुनरुद्भवः॥ ११४॥<br><br>तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम्।<br>मामेव सम्प्रपश्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि॥ ११५॥जो ये नारायण हैं, वह मैं ईश्वर ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है। जो (हम दोनोंमें) कोई भेद नहीं देखता, उसीको यह परम (ज्ञान) देना चाहिये। नारायण नामवाली तथा शान्त अक्षर-संज्ञक मेरी यह परम मूर्ति सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित है। लोकमें जो भेददृष्टिवाले लोग इसके विपरीत समझते हैं, वे मेरा दर्शन नहीं करते हैं और बार-बार (संसारमें) जन्म लेते हैं। जो इन अव्यक्त विष्णु अथवा मुझ देव महेश्वरको एकीभावसे देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिये अनादिनिधन (आदि और अन्तसे रहित) आत्मरूप अव्यय विष्णु मुझे ही समझो और फिर वैसे ही पूजा भी करो॥ १११—११५॥
येऽन्यथा मां प्रपश्यन्ति मत्वेमं देवतान्तरम्।<br>ते यान्ति नरकान् घोरान् नाहं तेषु व्यवस्थितः॥ ११६॥<br><br>मूर्खं वा पण्डितं वापि ब्राह्मणं वा मदाश्रयम्।<br>मोचयामि श्वपाकं वा न नारायणनिन्दकम्॥ ११७॥<br><br>तस्मादेष महायोगी मद्द्भक्तैः पुरुषोत्तमः।<br>अर्चनीयो नमस्कार्यो मत्प्रीतिजननाय हि॥ ११८॥जो लोग इन (विष्णु)-को दूसरा देवता मानकर मुझे दूसरा देवता समझकर देखते हैं, वे घोर नरकोंमें जाते हैं, मैं उनमें स्थित नहीं रहता हूँ। मूर्ख हो, पण्डित हो, ब्राह्मण हो अथवा चाण्डाल हो, मेरे आश्रित रहनेवाले (प्रत्येक)-को मैं मुक्त कर देता हूँ, किंतु जो नारायणकी निन्दा करनेवाला है, उसे मैं मुक्त नहीं करता। इसीलिये मेरे भक्त मुझमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये इन महायोगी पुरुषोत्तमकी अर्चना अवश्य करें और इन्हें नमस्कार अवश्य करें॥ ११६—११८॥
एवमुक्त्वा समालिङ्ग्य वासुदेवं पिनाकधृक्।<br>अन्तर्हितोऽभवत् तेषां सर्वेषामेव पश्यताम्॥ ११९॥<br><br>नारायणोऽपि भगवांस्तापसं वेषमुत्तमम्।<br>जग्राह योगिनः सर्वांस्त्यक्त्वा वै परमं वपुः॥ १२०॥ऐसा कहकर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर वासुदेवका आलिंगन करके उन सभीके देखते-देखते अन्तर्हित हो गये। भगवान् नारायणने भी अपने पारमार्थिक विग्रहका त्यागकर उत्तम तपस्वीका वेष धारण किया और सभी योगियोंसे कहा—॥ ११९—१२०॥
ज्ञातं भवद्भिरमलं प्रसादात् परमेष्ठिनः।<br>साक्षादेव महेशस्य ज्ञानं संसारनाशनम्॥ १२१॥<br><br>गच्छध्वं विज्वराः सर्वे विज्ञानं परमेष्ठिनः।<br>प्रवर्तयध्वं शिष्येभ्यो धार्मिकेभ्यो मुनीश्वराः॥ १२२॥आप लोगोंने परमेष्ठी (महेश्वर)-की कृपासे संसार (बन्धन)-को नष्ट करनेवाला उन्हीं साक्षात् महेशका निर्मल ज्ञान प्राप्त किया है। इसलिये मुनीश्वरो! विगतज्वर होकर आप सभी जायें और धार्मिक शिष्योंमें परमेष्ठीके ज्ञानको प्रवर्तित करें॥ १२१-१२२॥

२९६ * कूर्मपुराण *


इदं भक्ताय शान्ताय धार्मिकायाहिताग्नये ।<br>विज्ञानमैश्वरं देयं ब्राह्मणाय विशेषतः ॥ १२३ ॥इस ईश्वर-सम्बन्धी विशिष्ट ज्ञानको विशेष रूपसे शान्त भक्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्री ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा कहकर योगियोंमें परम श्रेष्ठ वे महायोगी विश्वात्मा नारायण स्वयं अन्तर्हित हो गये ॥ १२३-१२४ ॥
एवमुक्त्वा स विश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ।<br>नारायणो महायोगी जगामादर्शनं स्वयं ॥ १२४ ॥
तेऽपि देवादिदेवेशं नमस्कृत्य महेश्वरम् ।<br>नारायणं च भूतादिं स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥ १२५ ॥वे (मुनिगण) भी देवोंके आदिदेवेश्वर महेश्वरको और भूतादि (समस्त प्रपञ्चके मूलकारण) नारायणको नमस्कार कर अपने स्थानोंकी ओर चले गये। महामुनि भगवान् सनत्कुमारने संवर्तको ईश्वरीय ज्ञान (शिवज्ञानका उपदेश) प्रदान किया। उन्होंने भी (वह ज्ञान) सत्यव्रतको दिया। योगीन्द्र सनन्दनने महर्षि पुलहको और प्रजापति पुलहने गौतमको ईश्वरीय ज्ञान प्रदान किया। अङ्गिराने वेदोंके ज्ञाता भरद्वाजको और कपिलने जैगीषव्य तथा पञ्चशिखको (वह ज्ञान) दिया। सभी तत्त्वोंके द्रष्टा मेरे पिता पराशरने भी वह परम ज्ञान सनकसे प्राप्त किया और उनसे वाल्मीकिने प्राप्त किया। प्राचीन कालमें अर्धनारीश्वर भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न महायोगी वामदेवजीने मुझसे कहा, जो साक्षात् पिनाकधारी रुद्रस्वरूप हैं ॥ १२५-१३० ॥
सनत्कुमारो भगवान् संवर्ताय महामुनिः ।<br>दत्तवानैश्वरं ज्ञानं सोऽपि सत्यव्रताय तु ॥ १२६ ॥
सनन्दनोऽपि योगीन्द्रः पुलहाय महर्षये ।<br>प्रददौ गौतमायाथ पुलहोऽपि प्रजापतिः ॥ १२७ ॥
अङ्गिरा वेदविदुषे भरद्वाजाय दत्तवान् ।<br>जैगीषव्याय कपिलस्तथा पञ्चशिखाय च ॥ १२८ ॥
पराशरोऽपि सनकात् पिता मे सर्वतत्त्वदृक् ।<br>लेभे तत्परमं ज्ञानं तस्माद् वाल्मीकिराप्तवान् ॥ १२९ ॥
मामुवाच पुरा देवः सतीदेहभवाङ्गजः ।<br>वामदेवो महायोगी रुद्रः किल पिनाकधृक् ॥ १३० ॥
नारायणोऽपि भगवान् देवकीतनयो हरिः ।<br>अर्जुनाय स्वयं साक्षात् दत्तवानिदमुत्तमम् ॥ १३१ ॥देवकीके पुत्र हरि भगवान् नारायणने भी स्वयं साक्षात् अर्जुनको यह उत्तम ज्ञान प्रदान किया। जब मैंने वामदेव रुद्रसे इस श्रेष्ठ ज्ञानको प्राप्त किया, तभीसे मेरी गिरिशमें विशेष भक्ति हो गयी। मैंने शरणागतोंके रक्षक, शरण (प्राणिमात्रके आश्रय), भूतोंके ईश, गिरिश, स्थाणु, देवाधिदेव त्रिशूली रुद्रकी विशेषरूपसे शरण ग्रहण की है। पत्नी तथा पुत्रोंके साथ आप सब लोग भी उन गोवृषवाहन<sup></sup>, कल्याणकारी भगवान् शम्भुकी शरणमें जायें। उनकी कृपासे कर्मयोगके द्वारा व्यवहार<sup></sup> करें और विभूतिभूषण गोपति (इन्द्रियोंके पति) महादेव शंकरकी पूजा करें ॥ १३१-१३५ ॥
यदहं लब्धवान् रुद्राद् वामदेवाददुत्तमम् ।<br>विशेषाद् गिरिशे भक्तिस्तस्मादारभ्य मेऽभवत् ॥ १३२ ॥
शरण्यं शरणं रुद्रं प्रपन्नोऽहं विशेषतः ।<br>भूतेशं गिरिशं स्थाणुं देवदेवं त्रिशूलिनम् ॥ १३३ ॥
भवन्तोऽपि हि तं देवं शम्भुं गोवृषवाहनम् ।<br>प्रपद्यध्वं सपत्नीकाः सपुत्राः शरणं शिवम् ॥ १३४ ॥
वर्तध्वं तत्प्रसादेन कर्मयोगेन शंकरम् ।<br>पूजयध्वं महादेवं गोपतिं भूतिभूषणम् ॥ १३५ ॥
एवमुक्तेऽथ मुनयः शौनकाद्या महेश्वरम् ।<br>प्रणेमुः शाश्वतं स्थाणुं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ १३६ ॥ऐसा कहे जानेपर उन शौनक आदि (महर्षियों)-ने पुनः शाश्वत स्थाणु सनातन महेश्वर एवं सत्यवतीके पुत्र व्यासको प्रणाम किया और प्रसन्नमन होकर वे सभी लोकोंके महेश्वर, साक्षात् हृषीकेश, प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यास)-से कहने लगे - ॥ १३६-१३७ ॥
अब्रुवन् हृष्टमनसः कृष्णद्वैपायनं प्रभुम् ।<br>साक्षाद्देव हृषीकेशं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ १३७ ॥

१- 'गोवृषवाहन' — धर्मस्वरूप, गोजातिके वृषको महेश्वरने अपने वाहनके रूपमें स्वीकार किया है। इसलिये महेश्वरको 'गोवृषवाहन' कहा गया है।
२- 'कर्मयोगके द्वारा व्यवहार' का तात्पर्य है — अनासक्त-भावसे (कर्मफलकी कामनाके बिना) कर्तव्यबुद्धिसे अधिकारानुसार वेदादि शास्त्रोक्त कर्मोंका पालन करना।

* अध्याय ११ * २९७


| भवत्प्रसादादचला शरण्ये गोवृषध्वजे ।<br>इदानीं जायते भक्तिर्या देवैरपि दुर्लभा ॥ १३८ ॥<br><br>कथयस्व मुनिश्रेष्ठ कर्मयोगमनुत्तमम् ।<br>येनासौ भगवानीशः समाराध्यो मुमुक्षुभिः ॥ १३९ ॥<br><br>त्वत्संनिधावेष सूतः शृणोतु भगवद्वचः ।<br>तद्गदाखिललोकानां रक्षणं धर्मसंग्रहम् ॥ १४० ॥<br><br>यदुक्तं देवदेवेन विष्णुना कूर्मरूपिणा ।<br>पृष्टेन मुनिभिः पूर्वं शक्रेणामृतमन्थने ॥ १४१ ॥ | (भगवन् !) आपकी ही कृपासे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोवृषध्वज (भगवान् शंकर)-की वह अविचल भक्ति हमें प्राप्त हो गयी है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। मुनिश्रेष्ठ ! आप श्रेष्ठ कर्मयोग हमें बतलायें, जिसके द्वारा मोक्षार्थी लोग इन भगवान् ईशकी आराधना करते हैं*। आप (वेदव्यास)-की संनिधिमें ही श्रीसूतजी भगवान् (महेश्वर)-के वचनोंको सुन लें, जो वचन समस्त लोकोंके रक्षक हैं और जिनमें समस्त धर्मोंका संग्रह हुआ है। अतः इनका वर्णन करें। इसके अतिरिक्त आप वह भी बतायें, जो पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय इन्द्रके द्वारा तथा मुनियोंके द्वारा पूछे जानेपर कूर्मरूपी देवाधिदेव श्रीविष्णुने कहा था (आप उसी कर्मयोगका वर्णन करें) ॥ १३८-१४१ ॥ | | श्रुत्वा सत्यवतीसूनुः कर्मयोगं सनातनम् ।<br>मुनीनां भाषितं कृष्णः प्रोवाच सुसमाहितः ॥ १४२ ॥ | इस प्रकार मुनियोंने जो कहा उसे सुनकर सत्यवतीके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजीने समाहित होकर (मुनियोंको) सनातन कर्मयोग बतलाया ॥ १४२ ॥ | | य इमं पठते नित्यं संवादं कृत्तिवाससः ।<br>सनत्कुमारप्रमुखैः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४३ ॥ | श्रीसनत्कुमार आदि प्रमुख मुनियों एवं भगवान् कृत्तिवासा (शंकर)-के मध्य सम्पन्न इस संवादको जो नित्य पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। | | श्रावयेद् वा द्विजान् शुद्धान् ब्रह्मचर्यपरायणान् ।<br>यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम् ॥ १४४ ॥ | अथवा जो ब्रह्मचर्यपरायण विशुद्ध द्विजोंको इस (संवाद)-को सुनाता है, या जो इस संवादके अर्थका अनुसंधान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है। | | यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः ।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ १४५ ॥ | जो दृढ़व्रती भक्ति-सम्पन्न होकर इस (संवाद)-को नित्य सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होते हुए ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १४३-१४५ ॥ | | तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः ।<br>श्रोतव्यश्चाथ मन्तव्यो विशेषाद् ब्राह्मणैः सदा ॥ १४६ ॥ | इसलिये विद्वानोंको सभी प्रयत्नोंके द्वारा नित्य इसका पठन, श्रवण एवं विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको इसका सदा मनन करना चाहिये ॥ १४६ ॥ |


इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
(ईश्वरगीता समाप्त)
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ११ ॥
(ईश्वरगीता समाप्त)


* इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि वेद-शास्त्र-प्रतिपादित अपने कर्मोंका फलासक्तिरहित होकर सविधि अनुष्ठान ईशकी आराधनाका प्रमुख अङ्ग है।

२९८ * कूर्मपुराण *

बारहवाँ अध्याय

ब्रह्मचारीका धर्म, यज्ञोपवीत आदिके सम्बन्धमें विविध विवरण, अभिवादनकी विधि, माता-पिता एवं गुरुकी महिमा, ब्रह्मचारीके सदाचारका वर्णन

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
शृणुध्वमृषयः सर्वे वक्ष्यमाणं सनातनम्।<br>कर्मयोगं ब्राह्मणानामात्यन्तिकफलप्रदम्॥ १ ॥ऋषियो! आप लोग ब्राह्मणोंको आत्यन्तिक (शाश्वत) फल प्रदान करनेवाले, अभी कहे जा रहे सनातन कर्मयोगको सुनें॥ १ ॥
आम्नायसिद्धमखिलं ब्रह्मणानुप्रदर्शितम्।<br>ऋषीणां शृण्वतां पूर्वं मनुराह प्रजापतिः॥ २ ॥<br><br>सर्वपापहरं पुण्यमृषिभिश्चैर्निषेवितम्।<br>समाहितधियो यूयं शृणुध्वं गदतो मम॥ ३ ॥<br><br>कृतोपनयनो वेदानधीयीत द्विजोत्तमः।<br>गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे स्वसूत्रोक्तविधानतः॥ ४ ॥<br><br>दण्डी च मेखली सूत्री कृष्णाजिनधरो मुनिः।<br>भिक्षाहारो गुरुहितो वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्॥ ५ ॥पूर्वकालमें प्रजापति मनुने सुननेकी इच्छा रखनेवाले ऋषियोंको समस्त वेदोंमें प्रसिद्ध, ब्रह्माद्वारा बतलाये गये, सभी पापोंको दूर करनेवाले तथा पवित्र ऋषि-समूहोंद्वारा सेवित इस सम्पूर्ण कर्मयोगको बतलाया था। मेरे द्वारा कहे जानेवाले इस कर्मयोगको समाहितबुद्धि होकर आप लोग भी सुनें द्विजोत्तमो! गर्भसे आठवें अथवा (जन्मसे) आठवें वर्षकी अवस्थामें अपने-अपने गृह्यसूत्रोक्त विधानके अनुसार यज्ञोपवीत-संस्कारसे युक्त होकर दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत तथा कृष्णमृगचर्म धारणकर मुनिवृत्तिवाले (ब्राह्मण-बालक)-को चाहिये कि वह भिक्षान्न ग्रहण करते हुए, गुरुके हितमें तत्पर रहकर गुरुके समीपमें उनकी ओर देखते हुए वेदोंका अध्ययन करे॥ २–५॥
कार्पासमुपवीतार्थं निर्मितं ब्रह्मणा पुरा।<br>ब्राह्मणानां त्रिवृत् सूत्रं कौशं वा वास्त्रमेव वा॥ ६ ॥<br><br>सदोपवीती चैव स्यात् सदा बद्धशिखो द्विजः।<br>अन्यथा यत् कृतं कर्म तद् भवत्ययथाकृतम्॥ ७ ॥प्राचीन कालमें ब्रह्माने यज्ञोपवीतके लिये कपासका निर्माण किया। ब्राह्मणोंका यज्ञोपवीत तिहरा होना चाहिये, वह कुशका हो अथवा वस्त्रका हो। द्विजको सदा यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये तथा शिखा बाँधे रखना चाहिये। अन्यथा (वह) जो कर्म करता है, वह न किये हुएके ही समान है अर्थात् निष्फल है॥ ६-७॥
वसेदविकृतं वासः कार्पासं वा कषायकम्।<br>तदेव परिधानीय शुक्लमच्छिद्रमुत्तमम्॥ ८ ॥<br><br>उत्तरं तु समाख्यातं वासः कृष्णाजिनं शुभम्।<br>अभावे दिव्यमजिनं रौरवं वा विधीयते॥ ९ ॥कपास या रेशमका बना हुआ विकाररहित (जला-कटा न हो) वस्त्र पहनना चाहिये। ऐसे ही स्वच्छ, छिद्ररहित तथा उत्तम (शास्त्रविधिके अनुसार) वस्त्रको धारण करना चाहिये। उत्तरीय वस्त्रके रूपमें कृष्णमृगचर्म शुभ कहा गया है। इसके अभावमें दिव्य चर्म अथवा रुरु मृगके चर्मका विधान किया गया है॥ ८-९॥
उद्धृत्य दक्षिणं बाहुं सव्ये बाहौ समर्पितम्।<br>उपवीतं भवेन्नित्यं निवीतं कण्ठसज्जने॥ १०॥<br><br>सव्यं बाहुं समुद्धृत्य दक्षिणे तु धृतं द्विजाः।<br>प्राचीनावीतमित्युक्तं पित्र्ये कर्मणि योजयेत्॥ ११॥दाहिना हाथ उठाकर बायें हाथके ऊपर (बायें कंधेपर) स्थापित यज्ञसूत्रको 'उपवीत' कहा जाता है। नित्य ऐसे रहना चाहिये। कण्ठमें (मालाकी तरह) लटके रहनेपर (यज्ञसूत्र) 'निवीत' कहा जाता है। द्विजो! बायाँ हाथ बाहर निकालकर दाहिने बाहुके ऊपर (दाहिने कंधेके ऊपर) रखे हुए यज्ञसूत्रको 'प्राचीनावीत' (अपसव्य) कहा जाता है इसका प्रयोग पितृकर्ममें करना चाहिये॥ १०-११॥
  • अध्याय १२ * २९९

अग्न्यगारे गवां गोष्ठे होमे जप्ये तथैव च।<br>स्वाध्याये भोजने नित्यं ब्राह्मणानां च संनिधौ॥ १२॥<br><br>उपासने गुरूणां च संध्ययोः साधुसंगमे।<br>उपवीती भवेन्नित्यं विधिरेष सनातनः॥ १३॥<br><br>मौञ्जी त्रिवृत् समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला।<br>मुञ्जाभावे कुशेनार्हुर्ग्रन्थेनैकेन वा त्रिभिः॥ १४॥<br><br>धारयेद् बैल्वपालाशौ दण्डौ केशान्तकौ द्विजः।<br>यज्ञार्हवृक्षजं वाथ सौम्यमव्रणमेव च॥ १५॥यज्ञशाला, गोशाला, होम, जप, स्वाध्याय, भोजन, ब्राह्मणोंकी संनिधि, गुरुओंकी उपासना, दोनों संध्याओं और साधुओंके समागम (सत्संग)-के समय नित्य उपवीती रहना चाहिये यह सनातन विधि है। विप्र (वटु)-की मेखला मूँजसे बनी हुई, तिहरी, बराबर तथा चिकनी बनानी चाहिये। मूँजके अभावमें कुशकी एक या तीन ग्रन्थियोंसे युक्त मेखला बनानी चाहिये। द्विजको केशान्तपर्यन्त बिल्व अथवा पलाशका चाहे किसी यज्ञीय वृक्षका सुन्दर (चिकना) तथा छिद्र आदिसे रहित दण्ड धारण करना चाहिये ॥ १२-१५॥
सायं प्रातर्द्विजः संध्यामुपासीत समाहितः।<br>कामाल्लोभाद् भ्यान्मोहात् त्यक्तेन पतितो भवेत्॥ १६॥<br><br>अग्निकार्यं ततः कुर्यात् सायं प्रातः प्रसन्नधीः।<br>स्नात्वा संतर्पयेद् देवानृषीन् पितृगणांस्तथा॥ १७॥<br><br>देवताभ्यर्चनं कुर्यात् पुष्पैः पत्रेण वाम्बुभिः।<br>अभिवादनशीलः स्यान्नित्यं वृद्धेषु धर्मतः॥ १८॥<br><br>असावहं भो नामेति सम्यक् प्रणतिपूर्वकम्।<br>आयुरायोग्यसिद्धयर्थं तन्द्रादिपरिवर्जितः॥ १९॥<br><br>आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने।<br>अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः॥ २०॥द्विजको सायं तथा प्रातः समाहित होकर संध्या करनी चाहिये। काम, लोभ, भय अथवा मोहसे संध्याका त्याग करनेसे वह (द्विज) पतित हो जाता है। तदनन्तर प्रसन्न-मनसे सायं और प्रातः हवन करना चाहिये। स्नानके उपरान्त देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। पत्र, पुष्प अथवा जलसे देवताओंका पूजन करना चाहिये। आयु तथा आरोग्यकी प्राप्तिके लिये आलस्य आदिसे सर्वथा मुक्त होकर 'यह मैं अमुक नामवाला आपको प्रणाम करता हूँ'—इस प्रकार धर्मपूर्वक वृद्धजनोंका नित्य अभिवादन करना चाहिये। अभिवादन किये जानेपर विप्रको 'आयुष्मान् भव सौम्य' अर्थात् 'सौम्य ! तुम दीर्घायु होओ' इस प्रकार अभिवादनका उत्तर देना चाहिये। उसके नामके अन्तिम स्वर अथवा नामके अन्तिम अक्षरके व्यञ्जन होनेपर उसके ठीक पूर्वके स्वरको प्लुत (दीर्घतर) स्वरमें बोलना चाहिये ॥ १६-२०॥
न कुर्याद् योऽभिवादस्य द्विजः प्रत्यभिवादनम्।<br>नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः॥ २१॥<br><br>व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः।<br>सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन तु दक्षिणः॥ २२॥<br><br>लौकिकं वैदिकं चापि तथाध्यात्मिकमेव वा।<br>आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत्॥ २३॥<br><br>नोदकं धारयेद् भैक्षं पुष्पाणि समिधस्तथा।<br>एवंविधानि चान्यानि न दैवाद्येषु कर्मसु॥ २४॥जो द्विज अभिवादन करनेपर प्रत्यभिवादन (अभिवादनका उत्तर) नहीं करता, उसका अभिवादन विद्वान्‌को नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह शूद्रके समान ही है। अभिवादनके समय गुरुके चरणोंका स्पर्श व्यत्यस्तपाणि होकर करना चाहिये अर्थात् बायें हाथसे बायें पैरको और दाहिने हाथसे दाहिने पैरको स्पर्श करना चाहिये। जिससे लौकिक, वैदिक अथवा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया हो, उस (गुरु)-का सर्वप्रथम अभिवादन करना चाहिये। देवपूजन (देव, पित्र्य) आदि कर्मोंमें भिक्षामें प्राप्त जल, पुष्प तथा समिधा अथवा इसी प्रकारके अन्य पदार्थोंका ग्रहण (प्रयोग) नहीं करना चाहिये ॥ २१-२४॥

६. उत्तरविभाग (अध्याय १२-२५) — ब्रह्मचारी, गृहस्थधर्म, सदाचार व नित्यकर्म विधि

३०० * कूर्मपुराण *


ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत् क्षत्रबन्धुमनामयम्।<br>वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव तु॥ २५॥(मिलनेपर) ब्राह्मणसे उसका 'कुशल' पूछना चाहिये, इसी प्रकार क्षत्रियसे 'अनामय' (रोगराहित्य), वैश्यसे 'क्षेम' और शूद्रसे 'आरोग्य' पूछना चाहिये॥ २५॥
उपाध्यायः पिता ज्येष्ठो भ्राता चैव महीपतिः।<br>मातुलः श्वशुरस्त्राता मातामहपितामहौ।<br>वर्णज्येष्ठः पितृव्यश्च पुंसोऽत्र गुरवः स्मृताः॥ २६॥उपाध्याय^१, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, ससुर, रक्षक, मातामह, पितामह, अपनेसे श्रेष्ठ वर्णवाले तथा चाचा—ये लोग गुरु कहे गये हैं। माता, मातामही, गुरुपत्नी, पिता एवं माताकी बहिन (बुआ एवं मौसी), सास, पितामही तथा ज्येष्ठ धात्री (शैशवावस्थामें पालन करनेवाली)—ये सभी स्त्रियाँ गुरु हैं। द्विजो! माता और पिताके सम्बन्धसे यह गुरुवर्ग कहा गया है अर्थात् माताके पक्षसे तथा पिताके पक्षसे जो लोग श्रेष्ठ कोटिमें हैं उन्हें बताया गया। मन, वाणी और कर्मद्वारा इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये॥ २६—२८॥
माता मातामही गुर्वी पितुर्मातृश्च सोदराः।<br>श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च गुरवः स्त्रियः॥ २७॥
इत्युक्तो गुरुवर्गोऽयं मातुतः पितृतो द्विजाः।<br>अनुवर्तनमेतेषां मनोवाक्कायकर्मभिः॥ २८॥
गुरुं दृष्ट्वा समुत्तिष्ठेदभिवाद्य कृताञ्जलिः।<br>नैतैरुपविशेत् सार्धं विवदेन्नात्मकारणात्॥ २९॥गुरुको देखते ही आसनसे उठ जाना चाहिये और अभिवादनकी विधिसे उन्हें अभिवादन करना चाहिये, अनन्तर उनकी आज्ञा पाकर हाथ जोड़कर सम्मुख बैठना चाहिये, पर इनके साथ एक आसनपर नहीं बैठना चाहिये और अपने लिये (व्यक्तिगत स्वार्थके लिये) इनसे विवाद भी नहीं करना चाहिये। प्राणधारणके लिये भी द्वेषवश गुरुजनोंसे विवाद न करे। अन्य गुणोंके विद्यमान रहनेपर भी गुरुसे द्वेष करनेवालोंका अधःपतन होता है अर्थात् गुरुद्वेषीके सभी गुण व्यर्थ होते हैं॥ २९-३०॥
जीवितार्थमपि द्वेषाद् गुरुभिर्नैव भाषणम्।<br>उदितोऽपि गुणैरन्यैर्गुरुद्वेषी पतत्यधः॥ ३०॥
गुरूणामपि सर्वेषां पूज्याः पञ्च विशेषतः।<br>तेषामाद्यास्त्रयः श्रेष्ठास्तेषां माता सुपूजिता॥ ३१॥अभी बताये गये सभी गुरुओंमें भी पाँच विशेषरूपसे पूजनीय हैं। उनमें प्रथम तीन श्रेष्ठ हैं, उनमें भी माता अधिक पूज्य होती है। उत्पादक (पिता), उत्पन्न करनेवाली (माता), विद्याका उपदेश देनेवाले (गुरु), बड़े भाई और भरण-पोषण करनेवाले स्वामी—ये पाँच गुरु कहे गये हैं। कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको अपने सभी प्रयत्नोंके द्वारा प्राण ही क्यों न त्यागना पड़े, पर इन पाँचों (गुरुओं)-का विशेषरूपसे पूजन (आदर) करना चाहिये॥ ३१—३३॥
यो भावयति या सूते येन विद्योपदिश्यते।<br>ज्येष्ठो भ्राता च भर्ता च पञ्चैते गुरवः स्मृताः॥ ३२॥
आत्मनः सर्वयत्नेन प्राणत्यागेन वा पुनः।<br>पूजनीया विशेषेण पञ्चैते भूतिमिच्छता॥ ३३॥
यावत् पिता च माता च द्वावेतौ निर्विकारिणौ।<br>तावत् सर्वं परित्यज्य पुत्रः स्यात् तत्परायणः॥ ३४॥जबतक माता और पिता ये दोनों निर्विकार^२ रहें, तबतक सब कुछ छोड़कर पुत्रको उनके परायण रहना चाहिये॥ ३४॥

१-वेदके एकदेश मन्त्र या ब्राह्मण तथा वेदाङ्ग व्याकरण आदिका जो ब्राह्मण वृत्त्यर्थ (जीविकाके लिये) अध्यापन करते हैं, वे उपाध्याय कहे जाते हैं (मनु० २। १४१)।
२-यहाँ निर्विकारका अर्थ है गोहत्या, गुरुहत्या, ब्राह्मणहत्या-जैसे परिगणित महापातकोंसे रहित। दुर्भाग्यवश यदि माता-पिता महापातकी हो जाते हैं तो उन्हें प्रायश्चित्तके लिये पुत्रादिसे अलग रहना ही पड़ता है। उस समय उनकी सेवा आदिसे पुत्रको भी वञ्चित

* अध्याय १२ *३०१
पिता माता च सुप्रीतौ स्यातां पुत्रगुणैर्यदि।<br>स पुत्रः सकलं धर्ममाप्नुयात् तेन कर्मणा॥ ३५॥यदि पुत्रके गुणों (सत्कर्मनिष्ठा-सेवाभाव आदि)-के कारण पिता-माता पुत्रपर प्रसन्न रहते हैं तो वह पुत्र अपने इन सत्कर्मनिष्ठा आदि कर्म (गुणों)-से सम्पूर्ण धर्मको प्राप्त कर लेता है (अर्थात् यज्ञ, दान आदि बड़े-बड़े कर्मोंसे होनेवाले सभी पुण्य माता-पिताकी प्रसन्नताके कारण पुत्रको प्राप्त होते हैं)। माताके समान कोई देवता
नास्ति मातृसमं दैवं नास्ति पितृसमो गुरुः।<br>तयोः प्रत्युपकारोऽपि न कथञ्चन विद्यते॥ ३६॥<br>तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यात् कर्मणा मनसा गिरा।<br>न ताभ्यामननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ ३७॥नहीं है, पिताके समान कोई गुरु नहीं है। उनके उपकारका कोई भी प्रत्युपकार नहीं है॥ ३५-३६॥<br>उन दोनों (अर्थात् माता-पिता)-का मन, वाणी तथा कर्मसे नित्य ही प्रिय करना चाहिये। मोक्षसाधक (कर्मों) और नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको छोड़कर बिना उनकी आज्ञा प्राप्त किये दूसरे किसी धर्मका आचरण
वर्जयित्वा मुक्तिफलं नित्यं नैमित्तिकं तथा।<br>धर्मसारः समुद्दिष्टः प्रेत्यानन्तफलप्रदः॥ ३८॥नहीं करना चाहिये। (उनकी सेवाको) धर्मका सार और मृत्युके अनन्तर मोक्षफल देनेवाला बताया गया है। उपदेष्टा (गुरु)-की अच्छी प्रकार आराधना करनेके अनन्तर उनकी आज्ञासे ब्रह्मचर्याश्रमका परित्यागकर
सम्यगाराध्य वक्तारं विसृष्टस्तदनुज्ञया।<br>शिष्यो विद्याफलं भुङ्क्ते प्रेत्य चापद्यते दिवि॥ ३९॥गृहस्थाश्रम स्वीकार करनेवाला स्नातक शिष्य विद्याके फलका उपभोग करता है और मृत्युके उपरान्त स्वर्गलोक प्राप्त करता है अर्थात् अभ्युदय (ऐहलौकिक उन्नति) तथा निःश्रेयस (पारलौकिक उन्नति) दोनों यथावत् प्राप्त करता है। जो पितृतुल्य बड़े भाईको मूर्ख समझता
यो भ्रातरं पितृसमं ज्येष्ठं मूर्खोऽवमन्यते।<br>तेन दोषेण स प्रेत्य निरयं घोरमृच्छति॥ ४०॥<br>पुंसा वर्त्मनिविष्टेन पूज्यो भर्ता तु सर्वदा।<br>याति दातरि लोकेऽस्मिन् उपकाराद्धि गौरवम्॥ ४१॥है, मरनेपर वह उस दोषके कारण घोर नरक प्राप्त करता है॥ ३७-४०॥<br>अच्छे मार्गमें स्थित (सत्कर्त्तव्यपरायण) पुरुषके लिये भरण-पोषण करनेवाला भर्ता (स्वामी) सदा पूज्य (आदरविशेषके योग्य) होता है। उपकार करनेके कारण दाता इस लोकमें अत्यधिक गौरव प्राप्त करता ही है। जो लोग भर्तासे प्राप्त जीविकाके बदले अपने
ये नरा भर्तृपिण्डार्थं स्वान् प्राणान् संत्यजन्ति हि।<br>तेषामथाक्षयाँल्लोकान् प्रोवाच भगवान् मनुः॥ ४२॥प्राणोंतकका परित्याग कर देते हैं, उन्हें अक्षय लोक प्राप्त होते हैं, ऐसा भगवान् मनुने कहा है॥ ४१-४२॥
मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून्।<br>असावहमिति ब्रूयुः प्रत्युत्थाय यवीयसः॥ ४३॥अपनेसे अल्प अवस्थावाले मामा, चाचा, ससुर तथा ऋत्विज्‌के प्रति प्रत्युत्थानपूर्वक (आसनसे उठकर) 'मैं अमुक नामवाला हूँ'—केवल ऐसा ही कहकर अपना सम्मानभाव व्यक्त करना चाहिये, इन्हें अभिवादन-विधिसे अभिवादन नहीं करना चाहिये*॥ ४३॥

होना ही पड़ता है। ऐसे समयसे अतिरिक्त समयमें तो पुत्रको माता-पिताके परायण अवश्य रहना ही चाहिये। माता-पिताके सविकार होनेका निर्णय शास्त्रोंके अनुसार अधिकारी विद्वान् लोग ही करते हैं। यह निर्णय पुत्रके अधीन नहीं है।
* मनुस्मृति (२।१३०)-में यही श्लोक है। वहाँ कुल्लूकभट्टने जो अर्थ किया है, तदनुसार ही यहाँ अर्थ समझना चाहिये। वहाँ

३०२ * कूर्मपुराण *


अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत्।<br>भोभवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित्॥ ४४॥<br><br>अभिवाद्यश्च पूज्यश्च शिरसा वन्द्य एव च।<br>ब्राह्मणः क्षत्रियाद्यैश्च श्रीकामैः सादरं सदा॥ ४५॥<br>नाभिवाद्यास्तु विप्रेण क्षत्रियाद्याः कथञ्चन।<br>ज्ञानकर्मगुणोपेता यद्यप्येते बहुश्रुताः॥ ४६॥<br><br>ब्राह्मणः सर्ववर्णानां स्वस्ति कुर्यादिति स्थितिः।<br>सवर्णेपु सवर्णानां कार्यमेवाभिवादनम्॥ ४७॥<br><br>गुरुर्ग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः।<br>पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वत्राभ्यागतो गुरुः॥ ४८॥<br>विद्या कर्म वयो बन्धुर्वित्तं भवति पञ्चमम्।<br>मान्यस्थानानि पञ्चाहुः पूर्वं पूर्वं गुरूत्तरात्॥ ४९॥<br><br><br><br>पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि बलवन्ति च।<br>यत्र स्युः सोऽत्र मानार्हः शूद्रोऽपि दशमीं गतः॥ ५०॥<br>पन्था देयो ब्राह्मणाय स्त्रियै राज्ञे ह्यचक्षुषे।<br>वृद्धाय भारभुग्नाय रोगिणे दुर्बलाय च॥ ५१॥<br><br><br><br>भिक्षामाहृत्य शिष्टानां गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम्।<br>निवेद्य गुरवेऽश्नीयाद् वाग्यतस्तदनुज्ञया॥ ५२॥जो अपनेसे छोटा भी (यज्ञादिमें) दीक्षित (पुरुष) हो तो उसका नाम लेकर नहीं पुकारना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुषको 'भो भवत्' अर्थात् 'आप' शब्दका प्रयोग कर इसके (दीक्षितके) साथ सम्भाषण करना चाहिये। ऐश्वर्यकी अभिलाषा करनेवाले क्षत्रियादिकोंके लिये ब्राह्मण सदा ही आदरपूर्वक अभिवादन करने योग्य, पूजन करने योग्य तथा सिरसे वन्दन करने योग्य है॥ ४४-४५॥<br><br>विप्रको कभी भी क्षत्रियादिका अभिवादन नहीं करना चाहिये, भले ही वे ज्ञान, कर्म एवं गुणोंकी दृष्टिसे उत्कृष्ट हों। ब्राह्मणको सभी वर्णोंके प्रति 'स्वस्ति' अर्थात् कल्याण हो—ऐसा कहना चाहिये—यह विधान है। समान वर्णोंमें (कनिष्ठ व्यक्तियोंको ज्येष्ठ व्यक्तियोंका) अभिवादन करना चाहिये¹। द्विजातियोंके गुरु अग्नि और सभी वर्णोंके गुरु ब्राह्मण हैं। स्त्रियोंके एकमात्र गुरु उनके पति हैं और अतिथि सबका गुरु है॥ ४६-४८॥<br><br>विद्या, कर्म, अवस्था, बन्धु तथा पाँचवाँ धन—ये सम्मान प्राप्त करनेके पाँच स्थान कहे गये हैं। इनमें बादकी अपेक्षा पूर्व-पूर्वकी गुरुता² है। (ब्राह्मणादि) तीन वर्णोंके जिस व्यक्तिमें ये पाँच गुण (मान्यताके स्थान) अधिक हों तथा प्रबल हों वह अपेक्षाकृत माननीय होता है (अर्थात् श्रेष्ठतर, श्रेष्ठतम होता है)। दशमी अर्थात् नब्बे वर्षसे अधिक अवस्थाको प्राप्त शूद्र भी मान देनेके योग्य हो जाता है (अर्थात् ऐसे शूद्रके आनेपर उसे बैठनेके लिये आसन आदि आदरभावपूर्वक देना चाहिये) ॥ ४९-५०॥<br><br>ब्राह्मण, स्त्री, राजा, नेत्रहीन व्यक्ति, वृद्ध, भारसे पीड़ित व्यक्ति, रोगी तथा दुर्बलके लिये रास्ता छोड़ देना चाहिये (अर्थात् एक ही रास्तेपर आमने-सामने होनेपर स्वयं हटकर इन्हें रास्ता दे देना चाहिये। इनके निकल जानेपर स्वयं जाना चाहिये)। (ब्रह्मचारीको) प्रयत्नपूर्वक प्रतिदिन शिष्टोंके³ घरोंसे भिक्षा लाकर गुरुको निवेदितकर उनकी (गुरुकी) आज्ञा प्राप्तकर मौन होकर भोजन करना चाहिये ॥ ५१-५२॥

ऋत्विक्से अतिरिक्त गुरुको नहीं गिना गया है। श्लोकमें गिनाये गये मामासे ऋत्विक्हतकके लिये भी 'गुरु' शब्दका उल्लेख है।
१-यहाँ अभिवादनका अर्थ इतना ही है कि दोनों हाथोंसे पादस्पर्शकर प्रणाम करे। पूर्वोक्त अभिवादन-विधिके अनुसार नाम, गोत्र आदिका उच्चारण नहीं करना चाहिये।
२-विद्या—वेदार्थतत्त्वज्ञान कर्म, श्रौत-स्मार्त क्रियाओंका पालन, अवस्था—अधिक वयस्क होना, बन्धु—पितृव्य (चाचा), मामा आदि, वित्तन्यायार्जित धन—ये पाँच मान्यताके कारण हैं, पर इनमें उत्तर-उत्तरकी अपेक्षा पूर्व-पूर्व श्रेष्ठ है।
३-अपने वर्णके तथा अपने वर्णसे उच्च वर्णके जो लोग यथासम्भव आस्तिक, सदाचारी हों, महापातक आदिसे दूषित न हों, वे ही यहाँ शिष्टरूपमें अभिप्रेत हैं।

* अध्याय १२ *३०३
भवत्पूर्वं चरेद् भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः।<br>भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम्॥ ५३॥<br><br>मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम्।<br>भिक्षेत भिक्षां प्रथमं या चैनं न विमानयेत्॥ ५४॥<br><br>सजातीयगृहेष्वेव सार्ववर्णिकमेव वा।<br>भैक्ष्यस्य चरणं प्रोक्तं पतितादिषु वर्जितम्॥ ५५॥<br>वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु।<br>ब्रह्मचार्याहरेद् भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम्॥ ५६॥<br><br>गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु।<br>अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत्॥ ५७॥<br><br>सर्वं वा विचरेद् ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे।<br>नियम्य प्रयतो वाचं दिशस्त्वनवलोकयन्॥ ५८॥<br>समाहृत्य तु तद् भैक्षं यावदर्थममायया।<br>भुञ्जीत प्रयतो नित्यं वाग्यतोऽनन्यमानसः॥ ५९॥<br><br>भैक्ष्येण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद् व्रती।<br>भैक्ष्येण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता॥ ६०॥उपनयन-संस्कार होनेपर (ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको पूर्वमें 'भवत्' शब्दका प्रयोगकर ('भवति! भिक्षां देहि' ऐसा कहकर) भिक्षा माँगनी चाहिये। क्षत्रियको बीचमें ('भिक्षां भवति! देहि' ऐसा कहकर) तथा वैश्यको अन्तमें 'भवत्' शब्द कहकर ('भिक्षां देहि भवति!' ऐसा कहकर) भिक्षा माँगनी चाहिये¹। अपनी माता, बहन तथा मौसीसे अथवा जो इस ब्रह्मचारीकी अवमानना न करे, उससे पहली (उपनयन-संस्कारकी अङ्गभूत प्रथम) भिक्षा माँगनी चाहिये²। अपनी जातिके घरोंसे अथवा अपनेसे उच्च वर्णवाले सभी लोगोंके घरसे भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये, किंतु पतित आदि व्यक्तियोंके घरसे भिक्षाका ग्रहण करना वर्जित है॥ ५३-५५॥<br><br>ब्रह्मचारीको चाहिये कि वह प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक ऐसे लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे, जिनके घरोंमें वेद एवं यज्ञ आदिका लोप नहीं हुआ हो और जो (वेदशास्त्रानुसार) अपने कर्मोंके पालनके कारण प्रशस्त हों। गुरुके कुल (सपिण्ड) तथा (अपने) बन्धुके कुल अर्थात् अपने कुल और बान्धवों (मातुल आदिके घर)-से भिक्षा नहीं माँगनी चाहिये। दूसरोंका घर न मिलनेपर पहले-पहलेका त्याग करना चाहिये। अर्थात् पहले बन्धु-बान्धवों (मातुल आदि)-के घर, यदि वहाँ भिक्षा न मिले तो अपने कुलमें और वहाँ भी न मिले तो अन्तमें गुरुके कुलमें भिक्षा माँगनी चाहिये। पहलेके कहे गये घरोंसे भी न मिलनेपर प्रयत्नपूर्वक वाणीको नियन्त्रित कर दिशाओंमें न देखते हुए, सम्पूर्ण ग्राममें भिक्षा-हेतु विचरण करना चाहिये (पर पातकी एवं हीन जातिवालेके घरकी भिक्षा न ले)॥ ५६-५८॥<br><br>अपनी आवश्यकताके अनुसार बिना किसी छल-कपटके उस भिक्षाको एकत्रितकर प्रयत्नपूर्वक नित्य मौन होकर एकाग्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। (ब्रह्मचारी) नित्य भिक्षासे जीविकाका निर्वाह करे। ब्रह्मचारीको नित्य एक अन्न³ नहीं ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचारीकी भिक्षान्नसे की गयी वृत्ति उपवासके समान ही कही गयी है॥ ५९-६०॥

१-शास्त्रानुसार ब्रह्मचारी गृहस्थके घरमें भिक्षा माँगने जाता है। घरमें माताएँ रहती हैं, अतः 'भवति!' इस रूपमें माताओंको सम्बोधन कर भिक्षा माँगता है।
२-उपनयन-संस्कार जब होता है तब भिक्षा माँगनेका विधान है। यह सर्वप्रथम भिक्षा माँगना है। इसीके लिये यह वचन है।
३-एक अन्न नित्य ग्रहण करनेसे उसमें आसक्ति हो जाती है और किसी भी प्रकारकी आसक्ति वर्जित है।

३०४ * कूर्मपुराण *

पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन्। दृष्ट्वा हृष्येत् प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः॥ ६१॥

अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्। अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात् तत्परिवर्जयेत्॥ ६२॥

प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत सूर्याभिमुख एव वा। नाद्यादुदङ्मुखो नित्यं विधिरेष सनातनः॥ ६३॥

प्रक्षाल्य पाणिपादौ च भुञ्जानो द्विरुपस्पृशेत्। शुचौ देशे समासीनो भुक्त्वा च द्विरुपस्पृशेत्॥ ६४॥

नित्य अन्न (प्राप्त भिक्षान्न)-का पूजन (प्राणधारक रूपमें विष्णुस्वरूप समझकर ध्यान) करे और निन्दा न करते हुए उसे ग्रहण करे। (भोजनको) देखकर हर्षित और प्रसन्न होना चाहिये तथा सर्वथा उसकी (अन्नकी) प्रशंसा करनी चाहिये। अत्यधिक भोजन करना आरोग्य, आयुष्य, स्वर्ग और पुण्यका नाश करनेवाला तथा लोकमें। (अधिक भोजीके रूपमें) निन्दा करानेवाला है, इसलिये अतिभोजनका परित्याग करना चाहिये॥ ६१-६२॥

नित्य पूर्वकी ओर मुख करके अथवा सूर्यकी ओर मुख करके भोजन करे। उत्तरकी ओर मुखकर भोजन न करे—यह सनातन विधि है। दोनों हाथ एवं पाँव धोकर भोजनके आरम्भमें दो आचमन करे। पवित्र स्थानपर बैठकर भोजन करनेके अनन्तर पुनः दो बार आचमन करना चाहिये॥ ६३-६४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १२॥


तेरहवाँ अध्याय

ब्रह्मचारीके नित्यकर्मकी विधि, आचमनका विधान, हाथोंमें स्थित तीर्थ, उच्छिष्ट होनेपर शुद्धिकी प्रक्रिया, मूत्र-पुरीषोत्सर्गके नियम

व्यास उवाच

भुक्त्वा पीत्वा च सुप्त्वा च स्नात्वा रथ्योपसर्पणे।
ओष्ठावलोमकौ स्पृष्ट्वा वासो विपरिधाय च॥ १॥

रेतोमूत्रपुरीषाणामुत्सर्गेऽयुक्तभाषणे ।
ष्ठीवित्वाध्ययनारम्भे कासश्वासागमे तथा॥ २॥

चत्वरं वा श्मशानं वा समाक्रम्य द्विजोत्तमः।
संध्ययोरुभयोस्तद्वदाचान्तोऽप्याचमेत् पुनः॥ ३॥

चण्डालम्लेच्छसम्भाषे स्त्रीशूद्रोच्छिष्टभाषणे।
उच्छिष्टं पुरुषं स्पृष्ट्वा भोज्यं चापि तथाविधम्।
आचामेदश्रुपाते वा लोहितस्य तथैव च॥ ४॥

भोजने संध्ययोः स्नात्वा पीत्वा मूत्रपुरीषयोः।
आचान्तोऽप्याचमेत् सुप्त्वा सकृत्सकृदथान्यतः॥ ५॥

व्यासजी बोले— भोजन करके, जल इत्यादि पीकर, शयनकर उठनेके बाद, स्नान करके तथा मार्गमें गमनके समय, रोमरहित दोनों ओष्ठोंका स्पर्शकर, वस्त्र धारणकर, वीर्य, मल-मूत्रका त्यागकर, अनुपयुक्त भाषण करनेपर, थूकनेके बाद, अध्ययनारम्भमें, खाँसी या श्वास आनेपर, चौराहे अथवा श्मशानको पार करनेपर, इसी प्रकार दोनों संध्याओंमें श्रेष्ठ द्विजको चाहिये कि वह आचमन किये रहनेपर भी पुनः आचमन करे। चाण्डाल और म्लेच्छसे बात करनेपर, स्त्री, शूद्र और जूठे मुखवालेसे भाषण करनेपर, जूठे मुँहवाले पुरुषका तथा इसी प्रकार उच्छिष्ट भोजनका स्पर्श होनेपर, आँसू तथा रक्तके गिरनेपर, भोजनके समय, दोनों संध्याओंमें स्नानकर और जल आदिके पीनेपर तथा मल-मूत्रके उत्सर्गपर आचमन किये होनेपर भी आचमन करे। सोनेसे जगनेके बाद एक बार और अन्य समयोंमें अनेक बार आचमन करना चाहिये॥ १-५॥

  • अध्याय १३ * ३०५

| --- | --- | | अग्नेर्गावामथालम्भे स्पृष्ट्वा प्रयतमेव वा।<br>स्त्रीणामथात्मनः स्पर्शे नीवीं वा परिधाय च॥ ६ ॥ | अग्निका, गौका स्पर्श होनेपर, किसी परिश्रम करनेवालेका, स्त्रीका तथा अपना स्पर्श होनेपर (अपने जिस अङ्गका स्पर्श आवश्यक या अनिवार्य न हो उसका कामतः यदि स्पर्श किया जाय), नीवी (कटि—कमरका वस्त्र) पहिनकर, अपने केशों तथा बिना धोये | | उपस्पृशेज्जलं वार्द्रं तृणं वा भूमिमेव वा।<br>केशानां चात्मनः स्पर्शे वाससोऽक्षालितस्य च॥ ७ ॥ | वस्त्रका स्पर्श करनेपर जल, हरे तृण या भूमिक स्पर्श करना चाहिये॥ ६-७॥ | | अनुष्णाभिरफेनाभिरदुष्टाभिश्च धर्मतः।<br>शौचेप्सुः सर्वदाचामेदासीनः प्रागुदङ्मुखः॥ ८ ॥ | धर्मकी दृष्टिसे शुद्धिकी अभिलाषावालेको चाहिये कि वह सदा पूर्व या उत्तरकी ओर मुख करके बैठकर शीतल, फेनरहित तथा दोषवर्जित जलसे आचमन करे। | | शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।<br>अकृत्वा पादयोः शौचमाचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत्॥ ९ ॥ | सिर या कानको ढकने और शिखा तथा कच्छ (पिछोटा) खुलनेपर, बिना पैर धोये आचमन करनेपर भी अशुद्ध रहता है (अर्थात् इन स्थितियोंमें पहले पाँवोंको धोना चाहिये। अनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करना चाहिये)। बुद्धिमान् व्यक्तिको जूता पहने हुए, | | सोपानत्को जलस्थो वा नोष्णीषी वाचमेद् बुधः।<br>न चैव वर्षधाराभिर्न तिष्ठन् नोद्धृतोदकैः॥ १०॥ | जलमें स्थित होनेपर, सिरपर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिये। (इसी प्रकार) न वर्षाके जलसे, न खड़े होकर, न उठाये हुए जलसे, न एक हाथसे अर्पित जलसे अर्थात् किसी अन्यके द्वारा अञ्जलिसे नहीं, केवल एक हाथसे दिये गये जलसे, | | नैकहस्तार्पितजलैर्विना सूत्रेण वा पुनः।<br>न पादुकासनस्थो वा बहिर्जानुरथापि वा॥ ११॥ | बिना यज्ञोपवीतके, न पादुकासनपर बैठे हुए (पाँवमें धारण की जानेवाली पादुकाको आसन बनाकर उसीपर बैठकर) अथवा न जानुओंके बाहर हाथ निकाले हुए आचमन करना चाहिये॥ ८-११॥ | | न जल्पन् न हसन् प्रेक्षन् शयानः प्रह्व एव च।<br>नावीक्षिताभिः फेनाद्यैरुपैताभिरथापि वा॥ १२॥ | बोलते हुए, हँसते हुए, देखते हुए (किसी अन्यकी ओर देखते हुए), सोते हुए और झुककर आचमन नहीं करना चाहिये। बिना देखे^१ हुए अथवा फेन आदिवाले जलसे आचमन नहीं करना चाहिये। शूद्र^२ अथवा अपवित्र व्यक्तिके हाथोंसे दिये हुए एवं खारे | | शूद्राशुचिकरोन्मुक्तैर्न क्षाराभिस्तथैव च।<br>न चैवाङ्गुलिभिः शब्दं न कुर्वन् नान्यमानसः॥ १३॥ | जलसे और अंगुलियोंसे शब्द करते हुए तथा अन्यमनस्क होकर आचमन नहीं करना चाहिये॥ १२-१३॥ |


१-जलमें कोई ऐसी वस्तु नहीं होनी चाहिये जो उसे अपवित्र करती है। इसलिये अच्छी प्रकार निरीक्षित जलसे ही आचमन करना चाहिये। २-शक्ति रहनेपर किसी भी शूद्रके द्वारा लाये गये जलसे आचमन नहीं करना चाहिये। अशक्त होनेपर तथा त्रैवर्णिकके कथमपि उपलब्ध न होनेपर शूद्र (जिस शूद्रका पात्र धर्मशास्त्रके अनुसार ग्राह्य होता है)-के द्वारा लाये गये जलको कुश आदिसे पवित्रकर उससे आचमन किया जा सकता है।

३०६ * कूर्मपुराण *


न वर्णरसदुष्टाभिर्न चैव प्रद्रोदकैः।<br>न पाणिक्षुभिताभिर्वा न बहिष्कक्ष एव वा॥ १४॥जिस जलका अपना स्वाभाविक वर्ण या रस विकृत हो गया है, उससे आचमन नहीं करना चाहिये। ऐसे ही प्रद्रोदक (अत्यल्प जल)-से आचमन नहीं करना चाहिये। इसके अतिरिक्त किसी पात्रमें रखे हुए उस जलसे भी आचमन नहीं करना चाहिये जो पूरा हाथ डालकर क्षुभित कर दिया गया हो। यदि कच्छ (पिछोटा) धोतीसे बाहर निकल जाय तो उस स्थितिमें आचमन नहीं करना चाहिये। कच्छको धोतीके भीतर करनेके अनन्तर ही आचमन करनेका विधान है॥ १४॥
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठ्याभिः क्षत्रियः शुचिः।<br>प्राशिताभिस्तथा वैश्यः स्त्रीशूद्रौ स्पर्शतोऽन्ततः॥ १५॥(आचमनमें) ब्राह्मण हृदयतक पहुँचनेवाले, क्षत्रिय कण्ठतक पहुँचनेवाले जलसे और वैश्य मुखके भीतर प्रविष्ट (कण्ठतक न भी पहुँचे)जलसे शुद्ध होते हैं; स्त्री, शूद्र तो केवल (जिह्वा, ओष्ठके अन्ततक) जलके स्पर्शमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं॥ १५॥
अङ्गुष्ठमूलान्तरतो रेखायां ब्राह्ममुच्यते।<br>अन्तराङ्गुष्ठदेशिन्यो पितॄणां तीर्थमुत्तमम्॥ १६॥अँगूठेके मूलकी रेखामें ब्राह्मतीर्थ, तर्जनी और अँगूठेके मध्यभागमें उत्तम पितृतीर्थ, कनिष्ठाके मूलभागमें प्राजापत्यतीर्थ कहलाता है। अँगलियोंके अग्रभागमें दैवतीर्थ और वही आर्षतीर्थ भी कहा जाता है। अथवा (अँगुलियोंके) मूल भागको दैव या आर्षतीर्थ, मध्यभागको आग्नेयतीर्थ कहा गया है। इसी (आग्नेयतीर्थ)-को सौमिकतीर्थ कहा गया है। इसे जानकर मोह नहीं प्राप्त होता अर्थात् यथाविधि इसके अनुसार अनुष्ठान करनेपर अन्तःकरण शुद्ध होनेसे अज्ञान नष्ट हो जाता है। द्विजो! द्विजको चाहिये कि वह ब्राह्मतीर्थसे ही नित्य आचमन करे अथवा कायतीर्थ (प्राजापत्यतीर्थ) या दैवतीर्थसे करे, पितृतीर्थसे कभी भी आचमन न करे। ब्राह्मण संयत होकर पहले तीन बार जलका आचमन करे, अनन्तर मुड़े हुए अँगूठेके मूलसे मुखका स्पर्श करे यही सम्मार्जन है॥ १६—२०॥
कनिष्ठामूलतः पश्चात् प्राजापत्यं प्रचक्षते।<br>अङ्गुल्यग्रे स्मृतं दैवं तदेवार्षं प्रकीर्तितम्॥ १७॥
मूले वा दैवमार्षं स्यादाग्नेयं मध्यतः स्मृतम्।<br>तदेव सौमिकं तीर्थमेतज्ज्ञात्वा न मुह्यति॥ १८॥
ब्राह्मेणैव तु तीर्थेन द्विजो नित्यमुपस्पृशेत्।<br>कायेन वाथ दैवेन न तु पित्र्येण वै द्विजाः॥ १९॥
त्रिः प्राश्नीयादपः पूर्वं ब्राह्मणः प्रयतस्ततः।<br>सम्मृज्याङ्गुष्ठमूलेन मुखं वै समुपस्पृशेत्॥ २०॥
अङ्गुष्ठानामिकाभ्यां तु स्पृशेन्नेत्रद्वयं ततः।<br>तर्जन्यङ्गुष्ठयोगेन स्पृशेन्नासापुटद्वयम्॥ २१॥तदनन्तर अँगूठे और अनामिकासे दोनों नेत्रोंका स्पर्श करे और तर्जनी तथा अँगूठेके योगसे दोनों नासापुटों (नाक)-का स्पर्श करे। कनिष्ठा और अँगूठेके योगसे दोनों कानोंका स्पर्श करे। तदनन्तर मिली हुई सभी अँगलियोंसे अथवा हथेलीसे हृदयका स्पर्श करे। तदुपरान्त सिरका भी वैसे ही स्पर्श करे अथवा दोनों अँगूठोंसे स्पर्श करे॥ २१-२२॥
कनिष्ठाङ्गुष्ठयोगेन श्रवणे समुपस्पृशेत्।<br>सर्वासामथ योगेन हृदयं तु तलेन वा।<br>संस्पृशेद् वा शिरस्तद्वदङ्गुष्ठेनाथवा द्वयम्॥ २२॥
  • अध्याय १३ * ३०७

त्रिः प्राश्नीयाद् यदम्भस्तु सुप्रीतास्तेन देवताः ।<br>ब्रह्मा विष्णुर्महेशश्च भवन्तीत्यनुशुश्रुम ॥ २३ ॥आचमनमें तीन बार जो जल पिया जाता है, उससे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश—ये तीन देवता प्रसन्न होते हैं—ऐसा हमने सुना है। मार्जन करनेसे गङ्गा और यमुना नदियाँ प्रसन्न होती हैं। नेत्रोंके स्पर्शसे सूर्य तथा चन्द्रमा प्रसन्न होते हैं॥ २३-२४॥
गङ्गा च यमुना चैव प्रीयेते परिमार्जनात् ।<br>संस्पृष्टयोर्लोचनयोः प्रीयेते शशिभास्करौ ॥ २४ ॥<br>नासत्यदस्रौ प्रीयेते स्पृष्टे नासापुटद्वये ।<br>कर्णयोः स्पृष्टयोस्तद्वत् प्रीयेते चानिलानलौ ॥ २५ ॥दोनों नासापुटोंका स्पर्श करनेसे नासत्य और दस्र (दोनों अश्विनीकुमार) प्रसन्न होते हैं, इसी प्रकार दोनों कानोंका स्पर्श करनेसे अग्नि तथा वायुदेवता प्रसन्न होते हैं। हृदयके स्पर्श होनेपर सभी देवता प्रसन्न होते हैं। सिरका स्पर्श करनेसे वे अद्वितीय पुरुष विष्णु प्रसन्न होते हैं॥ २५-२६॥
संस्पृष्टे हृदये चास्य प्रीयन्ते सर्वदेवताः ।<br>मूर्ध्नि संस्पर्शनादेकः प्रीतः स पुरुषो भवेत् ॥ २६ ॥<br>नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गं नयन्ति याः ।<br>दन्तवद् दन्तलग्नेषु जिह्वास्पर्शोऽशुचिर्भवेत् ॥ २७ ॥(आचमन आदिके समय) अङ्गपर गिरे हुए जलकणोंसे शरीर उच्छिष्ट नहीं होता। दाँतोंके भीतर स्थित पदार्थ दाँतोंके समान ही होता है, परंतु जिह्वाके स्पर्श होनेपर व्यक्ति अपवित्र हो जाता है। आचमन करनेके समय या दूसरोंको आचमन कराते समय पैरोंपर गिरे हुए जलको भूमिपर गिरे हुएके समान समझना चाहिये। उससे मनुष्य अपवित्र नहीं होता। मनुने मधुपर्क (यथाविधि मिश्रित दधि, मधु, घी), सोम, ताम्बूल-भक्षण, फल, मूल तथा ईखका दण्ड ग्रहण करनेमें कोई दोष नहीं कहा है, इन्हें कोई भी दे, ग्रहण किया जा सकता है। हम चल रहे हैं तथा हमारे हाथमें ऐसी वस्तु है जो उच्छिष्टस्पर्शसे दूषित हो सकती है तो हमें अन्न, जल ग्रहण करते समय उस वस्तुको भूमिपर यथास्थान रख देना चाहिये तथा अन्न, जल ग्रहण करनेके अनन्तर आचमन करनेके बाद भूमिपर रखी हुई वस्तुका प्रोक्षण करना चाहिये, अनन्तर उस वस्तुको लेकर चलना चाहिये॥ २७—३०॥
स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् ।<br>भूमिगैस्ते समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत् ॥ २८ ॥
मधुपर्के च सोमे च ताम्बूलस्य च भक्षणे ।<br>फलमूले चेक्षुदण्डे न दोषं प्राह वै मनुः ॥ २९ ॥
प्रचरंश्चान्नपानेषु द्रव्यहस्तो भवेन्नरः ।<br>भूमौ निक्षिप्य तद् द्रव्यमाचम्याभ्युक्षयेत् तु तत् ॥ ३० ॥<br>तैजसं वै समादाय यद्युच्छिष्टो भवेद् द्विजः ।<br>भूमौ निक्षिप्य तद् द्रव्यमाचम्याभ्युक्षयेत् तु तत् ॥ ३१ ॥तैजस* पदार्थ (घी) लिये हुए यदि ब्राह्मण (द्विज) (खाने-पीनेके कारण) उच्छिष्ट हो जाय तो उस तैजस द्रव्य (घी)-को भूमिपर रखकर आचमन करे, पुनः उस द्रव्य (घी)-का प्रोक्षण करे। यदि कोई (द्रव्य-सहित) अमत्र (पात्र) लिये हुए मनुष्य उच्छिष्ट हो जाय तो उस द्रव्य (पात्र)-को (भूमिपर) रखे बिना आचमन कर लेनेपर शुद्ध हो जाता है (पात्र अपवित्र नहीं होता)। परंतु वस्त्र आदिके सम्बन्धमें विकल्प है॥ ३१-३२॥
यद्यमत्रं समादाय भवेदुच्छेषणान्वितः ।<br>अनिधायैव तद् द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ।<br>वस्त्रादिषु विकल्पः स्यात् तत्संस्पृष्टाचमेदिह ॥ ३२ ॥

* 'तेजो वै घृतम्' के अनुसार घीको तैजस (तेजस्वी बनानेवाला) माना जाता है।

३०८ * कूर्मपुराण *


| अरण्येऽनुदके रात्रौ चौरव्याघ्राकुले पथि।<br>कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा द्रव्यहस्तो न दुष्यति ॥ ३३ ॥<br><br>निधाय दक्षिणे कर्णे ब्रह्मसूत्रमुदङ्मुखः।<br>अह्नि कुर्याच्छकृन्मूत्रं रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः ॥ ३४ ॥<br><br>अन्तर्धाय महीं काष्ठैः पत्रैर्लोष्ठतृणेन वा।<br>प्रावृत्य च शिरः कुर्याद् विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ३५ ॥<br>छायाकूपनदीगोष्ठचैत्याम्भःपथि भस्मसु।<br>अग्नौ चैव श्मशाने च विण्मूत्रे न समाचरेत् ॥ ३६ ॥<br><br>न गोमये न कृष्टे वा महावृक्षे न शाद्वले।<br>न तिष्ठन् न निर्वासा न च पर्वतमस्तके ॥ ३७ ॥<br><br>न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन।<br>न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन् वा समाचरेत् ॥ ३८ ॥<br><br>तुषाङ्गारकपालेषु राजमार्गे तथैव च।<br>न क्षेत्रे न विले वापि न तीर्थे न चतुष्पथे ॥ ३९ ॥<br><br>नोद्यानोदसमीपे वा नोषरे न पराशुचौ।<br>न सोपानत्पादुको वा छत्री वा नान्तरिक्षके ॥ ४० ॥<br><br>न चैवाभिमुखे स्त्रीणां गुरुब्राह्मणयोर्गवाम्।<br>न देवदेवालययोरपामपि कदाचन ॥ ४१ ॥<br><br>न ज्योतींषि निरीक्षन् वा न संध्याभिमुखोऽपि वा।<br>प्रत्यादित्यं प्रत्यनलं प्रतिसोमं तथैव च ॥ ४२ ॥ | उसका स्पर्श होनेपर आचमन करना चाहिये। उच्छिष्ट दशामें वस्त्रका स्पर्श होनेपर आचमन एवं वस्त्रका प्रोक्षण करना चाहिये। जंगलमें, जलहीन स्थानमें, रात्रिमें और चोर तथा व्याघ्र आदिसे आक्रान्त मार्गमें मल-मूत्र करनेपर भी व्यक्ति आचमन, प्रोक्षण आदि शुद्धिके अभावमें भी दूषित नहीं होता, साथ ही उसके हाथमें रखा हुआ द्रव्य भी अशुचि नहीं होता (पर शुद्धिका अवसर मिल जानेपर यथाशास्त्र शुद्धि आवश्यक है।) ॥ ३३ ॥<br><br>दाहिने कानपर यज्ञोपवीत चढ़ाकर दिनमें उत्तरकी ओर मुख करके तथा रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। पृथ्वीको लकड़ी, पत्तों, ढेलों अथवा घाससे ढककर तथा शिरको वस्त्रसे आवृतकर मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥<br><br>छायामें, कूपमें या उसके अति समीप, नदीमें, गौशाला, चैत्य (गाँवके सीमाका वृक्षसमूह, ग्राम्य देवताका स्थान—टीला, डीह आदिपर), जल, मार्ग, भस्म, अग्नि तथा श्मशानमें मल-मूत्र नहीं करना चाहिये। गोबरमें, जुती हुई भूमिमें, महान् वृक्षके नीचे, हरी घाससे युक्त मैदानमें और पर्वतकी चोटीपर तथा खड़े होकर एवं नग्न होकर मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। न जीर्ण देवमन्दिरमें, न दीमककी बाँबीमें, न जीवोंसे युक्त गड्ढेमें और न चलते हुए मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। धान इत्यादिकी भूसी, जलते हुए अंगार, कपाल*, राजमार्ग, खेत, गड्ढे, तीर्थ, चौराहे, उद्यान, जलके समीप, ऊसर भूमि और अत्यधिक अपवित्र स्थानमें मल-मूत्रका त्याग न करे। जूता या खड़ाऊँ पहने, छाता लिये, अन्तरिक्षमें (भूमि-आकाशके मध्यमें), स्त्री, गुरु, ब्राह्मण, गौके सामने, देवविग्रह तथा देवमन्दिर और जलके समीपमें तो कभी भी मल-मूत्रका विसर्जन न करे ॥ ३६-४१ ॥<br><br>नक्षत्रोंको देखते हुए, संध्याकालका समय आनेपर, सूर्य, अग्नि तथा चन्द्रमाकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये ॥ ४२ ॥ |


* कपालके ये अर्थ हैं—सिरकी अस्थि, घटके दोनों अर्धभाग, मिट्टीका भिक्षापात्र,यज्ञीय पुरोडाशको पकानेके लिये मिट्टीका बना हुआ पात्रविशेष।

  • अध्याय १४ * | ३०९ ---|---

आहृत्य मृत्तिकां कूलाल्लेपगन्धापकर्षणम्।|आलस्य छोड़कर (नदी या तालाबके) किनारेसे कुर्यादतन्द्रितः शौचं विशुद्धैरुद्धृतोदकैः॥ ४३॥|मिट्टी लेकर उसके द्वारा तथा शुद्ध कूप आदिसे निकाले हुए जलके^१ द्वारा (मल-मूत्र) लेप और गन्ध जबतक दूर न हो, तबतक शुद्धि करनी चाहिये॥ ४३॥ नाहरेन्मृत्तिकां विप्रः पांशुलान्न च कर्दमात्।|विप्र (द्विज)-को चाहिये कि वह शौचके लिये न मार्गान्नोषराद् देशाच्छौचावशिष्टा परस्य च॥ ४४॥|धूलकी ढेर एवं कीचड़युक्त स्थान, रास्ते, ऊसर भूमि, दूसरेके शौच करनेसे बची हुई, मन्दिर, कुएँ, ग्राम^२ और जलके अंदरसे मिट्टी ग्रहण न करे। शौचके अनन्तर पहले बताये गये विधानके अनुसार नित्य आचमन करे॥ ४४-४५॥ न देवायतनात् कूपाद् ग्रामात्र च जलात् तथा।| उपस्पृशेत् ततो नित्यं पूर्वोक्तेन विधानतः॥ ४५॥|

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तेरहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १३॥


चौदहवाँ अध्याय

ब्रह्मचारीके आचारका वर्णन, गुरुसे अध्ययन आदिकी विधि, ब्रह्मचारीका धर्म, गुरु तथा गुरुपत्नीके साथ व्यवहारका वर्णन, वेदाध्ययन और गायत्रीकी महिमा, अनध्यायोंका वर्णन, ब्रह्मचारी-धर्मका उपसंहार

व्यास उवाच

एवं दण्डादिभिर्युक्तः शौचाचारसमन्वितः।
आहूतोऽध्ययनं कुर्याद् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम्॥ १॥

नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात् साध्वाचारः सुसंयतः।
आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः॥ २॥

प्रतिश्रवणसम्भाषे शयानो न समाचरेत्।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः॥ ३॥

नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत्॥ ४॥

व्यासजीने कहा— इस प्रकार दण्ड आदिसे युक्त और शौचाचारसे सम्पन्न (ब्रह्मचारी)-को गुरुजीके द्वारा बुलाये जानेपर उनके अभिमुख होकर अध्ययन करना चाहिये। सदाचारसम्पन्न और जितेन्द्रिय ब्रह्मचारी नित्य उत्तरीयसे दाहिना हाथ बाहर निकाले हुए गुरुके द्वारा बैठनेके लिये कहे जानेपर उनके सम्मुख^३ बैठे। सोते हुए, बैठे हुए, भोजन करते हुए, खड़े होकर तथा गुरुकी ओर पीठ करके उनकी किसी आज्ञाका ग्रहण या उनसे बातचीत नहीं करनी चाहिये। गुरुके पासमें शिष्यकी शय्या या आसन सदा गुरुकी शय्या एवं आसनकी अपेक्षा नीचा (कम ऊँचा) होना चाहिये। गुरुके देखते रहनेपर मनमाने ढंगसे नहीं बैठना चाहिये॥ १—४॥


^१ प्रवाहशून्य कहीं गड्ढे आदिमें एकत्र जल अपवित्र होता है। अपवित्र हाथ आदि साक्षात् नदी, तालाब आदिमें डालकर नहीं धोना चाहिये। किसी पात्रसे जल निकालकर ही धोना चाहिये।
^२ ग्रामके अंदरकी भूमि-लेप, चलने, थूकने आदिसे अपवित्र होती है। ग्रामके अंदरकी मिट्टी लेनेसे अनपेक्षित गड्ढा आदि होता है जो लोगोंके त्रासका कारण बनता है।
^३ यह श्लोक मनुस्मृति (२। १९३)-में उपलब्ध है। वहाँ 'नित्यमुद्धृतपाणिः' पाठ है। यही उपयुक्त है। इसका तात्पर्य यही है कि उत्तरीय (ऊपरसे चद्दर) धारण कर ही अध्ययन करना चाहिये तथा दाहिने हाथको चद्दरसे बाहर रखना चाहिये, क्योंकि अध्ययनमें दाहिने हाथका उपयोग होता है।