संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७८ * कूर्मपुराण *
| अहं हि भगवानीशः स्वयं ज्योतिः सनातनः ।<br>परमात्मा परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ ५१ ॥ | मैं ही भगवान्, ईश, स्वयं प्रकाश, सनातन और परमात्मा परम ब्रह्म हूँ, मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है॥ ५१ ॥ |
| इत्येतत् परमं ज्ञानं युष्माकं कथितं मया।<br>ज्ञात्वा विमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ५२ ॥ | इस प्रकार यह परम ज्ञान मैंने आप लोगोंसे कहा, इसे जान लेनेसे प्राणी जन्म तथा संसारके बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ५२ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६॥
सातवाँ अध्याय
ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन
| ईश्वर उवाच | ईश्वर बोले— |
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| शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रभावं परमेष्ठिनः ।<br>यं ज्ञात्वा पुरुषो मुक्तो न संसारे पतेत् पुनः ॥ १ ॥ | ऋषियो! आप सभी परमेष्ठीके प्रभावको सुनें, जिसे जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है और फिर संसारमें नहीं गिरता ॥ १ ॥ |
| परात् परतरं ब्रह्म शाश्वतं निष्कलं ध्रुवम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं तद्धाम परमं मम॥ २ ॥<br>अहं ब्रह्मविदां ब्रह्मा स्वयम्भूविश्वतोमुखः ।<br>मायाविनामहं देवः पुराणो हरिरव्ययः ॥ ३ ॥<br>योगिनामस्म्यहं शम्भुः स्त्रीणां देवी गिरीन्द्रजा।<br>आदित्यानामहं विष्णुर्वसूनामस्मि पावकः ॥ ४ ॥<br>रुद्राणां शंकरश्चाहं गरुडः पततामहम् ।<br>ऐरावतो गजेन्द्राणां रामः शस्त्रभृतामहम् ॥ ५ ॥ | जो परसे परतर, शाश्वत, निष्कल, ध्रुव, नित्यानन्द, निर्विकल्प ब्रह्म है, वह मेरा परम धाम है। मैं ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वतोमुख स्वयम्भू ब्रह्मा हूँ। मायावियोंमें मैं अव्यय पुराण देव हरि हूँ। योगियोंमें मैं शम्भु और स्त्रियोंमें गिरिराज पुत्री पार्वती हूँ। मैं (द्वादश) आदित्योंमें विष्णु तथा (अष्ट) वसुओंमें पावक हूँ। मैं रुद्रोंमें शंकर, उड़नेवाले पक्षियोंमें गरुड, गजेन्द्रोंमें ऐरावत तथा शस्त्रधारियोंमें परशुराम हूँ॥ २-५॥ |
| ऋषीणां च वसिष्ठोऽहं देवानां च शतक्रतुः ।<br>शिल्पिनां विश्वकर्माहं प्रह्लादोऽस्म्यमरद्विषाम् ॥ ६ ॥<br>मुनीनामप्यहं व्यासो गणानां च विनायकः ।<br>वीराणां वीरभद्रोऽहं सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ ७ ॥<br>पर्वतानामहं मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमस्म्यहम् ॥ ८ ॥<br>अनन्तो भोगिनां देवः सेनानीनां च पावकः ।<br>आश्रमाणां च गार्हस्थ्यमीश्वराणां महेश्वरः ॥ ९ ॥<br>महाकल्पश्च कल्पानां युगानां कृतमस्म्यहम् ।<br>कुबेरः सर्वयक्षाणां गणेशानां च वीरकः ॥ १० ॥ | ऋषियोंमें मैं वसिष्ठ, देवताओंमें इन्द्र, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा और सुरद्वेषी राक्षसोंमें प्रह्लाद हूँ। मैं मुनियोंमें व्यास, गणोंमें विनायक, वीरोंमें वीरभद्र और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ। मैं पर्वतोंमें सुमेरु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, प्रहार करनेवाले शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य व्रत हूँ। मैं सर्पोंमें अनन्तदेव, सेनानियोंमें कार्तिकेय, आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम और ईश्वरोंमें महेश्वर हूँ। मैं कल्पोंमें महाकल्प, युगोंमें सत्ययुग, सभी यक्षोंमें कुबेर और गणेश्वरोंमें वीरक हूँ॥ ६-१०॥ |
| प्रजापतीनां दक्षोऽहं निर्ऋतिः सर्वरक्षसाम् ।<br>वायुर्बलवतामस्मि द्वीपानां पुष्करोऽस्म्यहम् ॥ ११ ॥ | मैं प्रजापतियोंमें दक्ष, सभी राक्षसोंमें निर्ऋति, बलवानोंमें वायु और द्वीपोंमें पुष्कर द्वीप हूँ॥ ११॥ |
- अध्याय ७ * २७१
| मृगेन्द्राणां च सिंहोऽहं यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वेदानां सामवेदोऽहं यजुषां शतरुद्रियम्॥ १२॥<br>सावित्री सर्वजप्यानां गुह्यानां प्रणवोऽस्म्यहम्।<br>सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु॥ १३॥<br>सर्ववेदार्थविदुषां मनुः स्वायम्भुवोऽस्म्यहम्।<br>ब्रह्मावर्तस्तु देशानां क्षेत्राणामविमुक्तकम्॥ १४॥<br>विद्यानामात्मविद्याहं ज्ञानानामैश्वरं परम्।<br>भूतानामस्म्यहं व्योम सत्त्वानां मृत्युरेव च॥ १५॥<br>पाशानामस्म्यहं माया कालः कलयतामहम्।<br>गतीनां मुक्तिरेवाहं परेषां परमेश्वरः॥ १६॥<br>यच्चान्यदपि लोकेऽस्मिन् सत्त्वं तेजोबलाधिकम्।<br>तत्सर्वं प्रतिजानीध्वं मम तेजोविजृम्भितम्॥ १७॥<br>आत्मानः पशवः प्रोक्ताः सर्वे संसारवर्तिनः।<br>तेषां पतिरहं देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः॥ १८॥<br>मायापाशेन बध्नामि पशूनेतान् स्वलीलया।<br>मामेव मोचकं प्राहुः पशूनां वेदवादिनः॥ १९॥<br>मायापाशेन बद्धानां मोचकोऽन्यो न विद्यते।<br>मामृते परमात्मानं भूताधिपतिमव्ययम्॥ २०॥<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि माया कर्म गुणा इति।<br>एते पाशाः पशुपतेः क्लेशाश्च पशुबन्धनाः॥ २१॥<br>मनो बुद्धिरहंकारः खानिलाग्निजलानि भूः।<br>एता प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराश्च तथापरे॥ २२॥<br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पञ्चमम्।<br>पायूपस्थं करौ पादौ वाक् चैव दशमी मता॥ २३॥<br>शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्राकृतानि तु॥ २४॥<br>चतुर्विंशकमव्यक्तं प्रधानं गुणलक्षणम्।<br>अनादिमध्यनिधनं कारणं जगतः परम्॥ २५॥<br>सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयमुदाहृतम्।<br>साम्यावस्थितिमेतेषामव्यक्तं प्रकृतिं विदुः॥ २६॥ | मैं मृगेन्द्रोंमें सिंह, यन्त्रोंमें धनुष, वेदोंमें सामवेद और यजुर्मन्त्रोंमें शतरुद्रिय हूँ, मैं जपनीय सभी मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र, गोपनीयोंमें प्रणव, (वैदिक) सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, साममन्त्रोंमें ज्येष्ठसाम हूँ। मैं सभी वेदके अर्थको जाननेवाले विद्वानोंमें स्वायम्भुव मनु, देशोंमें ब्रह्मावर्त और क्षेत्रोंमें अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्र हूँ। मैं विद्याओंमें आत्मविद्या, ज्ञानोंमें परम ईश्वरीय ज्ञान, (पञ्च) भूतोंमें आकाश और सत्त्वोंमें मृत्यु¹ हूँ॥ १२–१५॥<br>मैं (बन्धनकारक) पाशोंमें माया, संहार करनेवालोंमें काल, गतियोंमें मुक्ति और उत्कृष्टोंमें परमेश्वर हूँ। इस संसारमें अन्य जो कुछ भी अधिक तेज और बलसे सम्पन्न सत्त्व पदार्थ हैं, उन सबको मेरे ही तेजसे सम्पन्न जानना चाहिये। संसारमें रहनेवाले सभी जीवोंको पशु² कहा गया है, मैं देव उनका पति (स्वामी) हूँ, इसलिये विद्वानोंद्वारा 'पशुपति' कहा जाता हूँ। मैं मायारूपी पाशके द्वारा अपनी लीलासे इन पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालता हूँ। वेदज्ञ लोग मुझे ही पशुओंको मुक्त करनेवाला मोचक कहते हैं। मायाके पाशसे आबद्ध जीवोंको मुक्त करनेवाला मुझ भूतोंके अधिपति अव्यय परमात्माको छोड़कर अन्य कोई नहीं है॥ १६–२०॥<br>(प्रकृति-महत्-अहंकार आदि) चौबीस तत्त्व, माया, कर्म तथा गुण—ये पशुपतिके पाश और पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालनेवाले क्लेश हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृति हैं और दूसरे सभी पदार्थ विकार या विकृति हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ तथा पाँचवीं नासिका, गुदा, जननेन्द्रिय, हाथ, पैर तथा दसवीं इन्द्रिय वाणी और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तेईस तत्त्व प्राकृत अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हैं॥ २१–२४॥<br>चौबीसवाँ तत्त्व अव्यक्त किंवा प्रधान है, वह गुणोंसे लक्षित होनेवाला आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित और जगत्का परम कारण है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण कहे गये हैं। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको अव्यक्त प्रकृति जानना चाहिये॥ २५–२६॥ |
१-यहाँ मृत्युसे यमराज या धर्मराजको समझना चाहिये, जो प्राणीमात्रकी अन्तिम गतिके कारण एवं निर्णायक हैं।
२-अज्ञानसे आवृत होनेके कारण जीव पशु हैं।
२८० * कूर्मपुराण *
सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रजो मिश्रमुदाहृतम्।
गुणानां बुद्धिवैषम्याद् वैषम्यं कवयो विदुः॥ २७॥
सत्त्वगुणको ज्ञानस्वरूप, तमोगुणको अज्ञानस्वरूप और रजोगुणको मिश्ररूप अर्थात् ज्ञान और अज्ञान दोनोंका मिश्रित रूप कहा गया है। बुद्धिकी विषमतासे गुणोंका भी वैषम्य होता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं॥ २७॥
धर्माधर्माविति प्रोक्तौ पाशौ द्वौ बन्धसंज्ञितौ।
मय्यर्पितानि कर्माणि निबन्धाय विमुक्तये॥ २८॥
अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं चाभिनिवेशकम्।
क्लेशाख्यानचलान् प्राहुः पाशानात्मनिबन्धनान्॥ २९॥
एतेषामेव पाशानां माया कारणमुच्यते।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सा शक्तिर्मयि तिष्ठति॥ ३०॥
बन्ध नामवाले दो पाशोंको धर्म और अधर्म कहा गया है। मुझे अर्पित किये गये कर्म बन्धनसे मुक्तिके लिये होते हैं। आत्माका बन्धन करनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश—इन क्लेश नामवाले पाँच अचल (दीर्घकालतक स्थायी-सा रहनेवाले) तत्त्वोंको पाश कहा गया है। मायाको इन (गाँठों) पाशोंका कारण कहा जाता है। अव्यक्त मूलप्रकृतिरूप शक्ति मुझमें प्रतिष्ठित रहती है॥ २८—३०॥
स एव मूलप्रकृतिः प्रधानं पुरुषोऽपि च।
विकारा महदादीनि देवदेवः सनातनः॥ ३१॥
स एव बन्धः स च बन्धकर्ता
स एव पाशः पशवः स एव।
स वेद सर्वं न च तस्य वेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥
यह मूल प्रकृति, प्रधान, पुरुष, महत्, अहंकार आदि विकारयुक्त तत्त्व—ये सब देवाधिदेव सनातनके ही रूप हैं। यही (सनातन पुरुष) बन्धन है, यही बन्धनमें डालनेवाला है। यही पाश और यही पशु है। यही सब कुछ जानता है, परंतु इसे जाननेवाला कोई नहीं है। इसे ही आदि पुराणपुरुष कहा जाता है*॥ ३१-३२॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
महेश्वरका अद्वितीय परमेश्वरके रूपमें निरूपण, सांख्य-सिद्धान्तसे तत्त्वोंका सृष्टिक्रम, महेश्वरके छः अङ्ग, महेश्वरके स्वरूपके ज्ञानसे परमपदकी प्राप्ति
ईश्वर उवाच
अन्यद् गुह्यतमं ज्ञानं वक्ष्ये ब्राह्मणपुंगवाः।
येनासौ तरते जन्तुर्घोरं संसारसागरम्॥ १॥
ईश्वर बोले— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं दूसरे गुह्यतम ज्ञानको बताता हूँ, जिससे यह प्राणी घोर संसार-सागरको पार कर लेता है॥ १॥
अहं ब्रह्ममयः शान्तः शाश्वतो निर्मलोऽव्ययः।
एकाकी भगवानुक्तः केवलः परमेश्वरः॥ २॥
मम योनिर्महद् ब्रह्म तत्र गर्भं दधाम्यहम्।
मूलं मायाभिधानं तु ततो जातमिदं जगत्॥ ३॥
प्रधानं पुरुषो ह्यात्मा महान् भूतादिरेव च।
तन्मात्राणि महाभूतानीन्द्रियाणि च जज्ञिरे॥ ४॥
मैं ब्रह्ममय, शान्त, शाश्वत, निर्मल, अव्यय, एकाकी, अद्वितीय परमेश्वर तथा भगवान् कहलाता हूँ। महद्ब्रह्म मेरी योनिरूप है, मैं उसमें मूल माया नामक गर्भ धारण करता हूँ और उससे यह संसार उत्पन्न हुआ है। (उसीसे) प्रधान, पुरुष, आत्मा, महत्तत्त्व, भूतादि (तामस अहंकार), तन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं॥ २—४॥
* यहाँ बन्धन आदिको सनातनपुरुषमें कल्पितमात्र बताकर अद्वैतभावकी प्रतिष्ठा की गयी है।
* अध्याय ८ *
२८१
| ततोऽण्डमभवद्धैमं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>तस्मिन् जज्ञे महाब्रह्मा मच्छक्त्या चोपबृंहितः॥ ५ ॥ | तदनन्तर करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्डमें मेरी शक्तिसे उपबृंहित महाब्रह्मा उत्पन्न हुए। अन्य भी जो बहुतसे प्राणी हैं, वे सभी मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे पितामह-स्वरूपको नहीं देख पाते। सभी योनियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उनकी योनि परा माया है और मुझे ही पितृस्वरूप विद्वान् लोग जानते हैं। इस प्रकार जो मुझे ही बीजरूप पितृस्वरूप प्रभु जानता है, वह सभी लोकोंमें धीर होता है और मोहको प्राप्त नहीं होता॥ ५-८॥ |
| ये चान्ये बहवो जीवा मन्मयाः सर्व एव ते।<br>न मां पश्यन्ति पितरं मायया मम मोहिताः॥ ६ ॥ | |
| याश्च योनिषु सर्वासु सम्भवन्ति हि मूर्तयः।<br>तासां माया परा योनिर्मामेव पितरं विदुः॥ ७ ॥ | |
| यो मामेवं विजानाति बीजिनं पितरं प्रभुम्।<br>स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति॥ ८ ॥ | |
| ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां परमेश्वरः।<br>ओङ्कारमूर्तिर्भगवानहं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ ९ ॥ | मैं ही सभी विद्याओंका स्वामी, प्राणियोंका परम ईश्वर, ओङ्कारमूर्ति, प्रजापति भगवान् ब्रह्मा हूँ। जो पुरुष विनष्ट होनेवाले सभी (चराचर) भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समानरूपसे देखता है, वह स्वयंद्वारा स्वयंको नष्ट नहीं करता; इस कारण वह परम गति प्राप्त करता है। सात सूक्ष्म तत्त्वों एवं छः अङ्गोंवाले महेश्वरको जानकर प्रधान तथा विनियोगको जाननेवाला परम ब्रह्मको प्राप्त करता है॥ ९-१२॥ |
| समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।<br>विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ १० ॥ | |
| समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।<br>न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ ११ ॥ | |
| विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्।<br>प्रधानविनियोगज्ञः परं ब्रह्माधिगच्छति॥ १२ ॥ | |
| सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः<br>स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः।<br>अनन्तशक्तिश्च विभोर्विदित्वा<br>षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ १३॥ | सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि ज्ञान, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त-शक्ति तथा अनन्तशक्ति—ये विभु महेश्वरके छः अङ्ग कहे गये हैं। पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), मन और आत्मा—ये सात सूक्ष्म तत्त्व कहे गये हैं। जो हेतुरूप प्रकृति है, वह प्रधान है और उससे होनेवाले बन्धनको ही विनियोग कहा जाता है। प्रकृतिमें लीन रहनेवाली जो शक्ति है, उसे वेदोंमें ब्रह्मयोनि और कारणरूप कहा गया है। अद्वितीय, परमेष्ठी, परात्पर, सत्यरूप महेश्वर उसके पुरुष हैं॥ १३-१५॥ |
| तन्मात्राणि मन आत्मा च तानि<br>सूक्ष्माण्याहुः सप्त तत्त्वात्मकानि।<br>या सा हेतुः प्रकृतेः सा प्रधानं<br>बन्धः प्रोक्तो विनियोगोऽपि तेन॥ १४॥ | |
| या सा शक्तिः प्रकृतौ लीनरूपा<br>वेदेषूक्ता कारणं ब्रह्मयोनिः।<br>तस्या एकः परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः पुरुषः सत्यरूपः॥ १५॥ | |
| ब्रह्मा योगी परमात्मा महीयान्<br>व्योमव्यापी वेदवेद्यः पुराणः।<br>एको रुद्रो मृत्युरव्यक्तमेकं<br>बीजं विश्वं देव एकः स एव॥ १६॥ | वे ही अद्वितीय देव ब्रह्मा, योगी, परमात्मा, महीयान्, व्योमव्यापी, वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य, पुराण, पुरुष अद्वितीय रुद्र, मृत्यु, अव्यक्त, एक बीज और विश्वरूप हैं॥ १६॥ |
२८२ * कूर्मपुराण *
तमेवैकं प्राहुरन्येऽप्यनेकं
त्वेकात्मानं केचिदन्यत्तथाहुः।
अणोरणीयान् महतोऽसौ महीयान्
महादेवः प्रोच्यते वेदविद्भिः॥ १७॥
एवं हि यो वेद गुहाशयं परं
प्रभुं पुराणं पुरुषं विश्वरूपम्।
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं
स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति॥ १८॥
उन्हें ही कोई एक और कोई अनेक कहते हैं। दूसरे कुछ लोग उन्हें ही अद्वितीय आत्मा कहते हैं। वेदज्ञ लोग उन्हें अणुसे अणुतर और महान्से भी महत्तर महादेव कहते हैं। हृदयरूप गुहामें स्थित, परात्पर, पुराणपुरुष, विश्वरूप, हिरण्मय और बुद्धिमानोंकी परमगति प्रभुको जो इस प्रकार जानता है, वह बुद्धिमान् पुरुष बुद्धिको पार कर जाता है अर्थात् परमपद प्राप्त करता है॥ १७-१८॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) अष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें (ईश्वरगीताका) आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८॥
नवाँ अध्याय
महादेवके विश्वरूपत्वका वर्णन तथा ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका प्रतिपादन
ऋषय ऊचुः
निष्कलो निर्मलो नित्यो निष्क्रियः परमेश्वरः।
तन्नो वद महादेव विश्वरूपः कथं भवान्॥ १॥
**ऋषियोंने पूछा—**महादेव! आप परमेश्वर निष्कल, निर्मल, नित्य तथा निष्क्रिय होनेपर भी विश्वरूप कैसे हैं, इसे हम लोगोंको बतलायें॥ १॥
ईश्वर उवाच
नाहं विश्वो न विश्वं च मामृते विद्यते द्विजाः।
मायानिमित्तमत्रास्ति सा चात्मानमपाश्रिता॥ २॥
अनादिनिधना शक्तिर्मायाव्यक्तसमाश्रया।
तन्निमित्तः प्रपञ्चोऽयमव्यक्तादभवत् खलु॥ ३॥
अव्यक्तं कारणं प्राहुरानन्दं ज्योतिरक्षरम्।
अहमेव परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते॥ ४॥
तस्मान्मे विश्वरूपत्वं निश्चितं ब्रह्मवादिभिः।
एकत्वे च पृथक्त्वे च प्रोक्तमेतन्निदर्शनम्॥ ५॥
अहं तत् परं ब्रह्म परमात्मा सनातनः।
अकारणं द्विजाः प्रोक्तो न दोषो ह्यात्मनस्तथा॥ ६॥
**ईश्वर बोले—**द्विजो! मैं विश्व नहीं हूँ और मुझसे अतिरिक्त विश्व भी नहीं है। यह सब मायाके निमित्तसे है और वह माया भी आत्माको आश्रित कर रहती है। आदि और अन्तसे रहित शक्तिरूप माया अव्यक्त (परमात्मा)-के आश्रित है, उसी (माया)-के कारण अव्यक्तसे यह प्रपञ्चरूप संसार उत्पन्न हुआ है। (मुझ) अव्यक्तको कारण कहा जाता है। मैं ही आनन्दस्वरूप, प्रकाशरूप, अक्षर परम ब्रह्म हूँ। मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी कारण ब्रह्मवादियोंने मेरा विश्वरूपत्व निश्चित किया है। एक रूप तथा भिन्नरूपके विषयमें इस उदाहरणका* वर्णन किया गया है। द्विजो! मैं कारणरहित, सनातन, परम ब्रह्म परमात्मा हूँ, अतः मुझमें कोई दोष नहीं है। तात्पर्य यह है कि जगत्में विषमता, क्रूरता आदि दोषोंका असाधारण कारण मनुष्यकृत कर्म है, ईश्वर नहीं। ईश्वर तो सामान्य कारण है, अतः वह दोषरहित है॥ २-६॥
* विवर्त विश्वकी दृष्टिसे महादेव अनेक रूप हैं तथा परमार्थतः एक होनेसे एक रूप हैं।
- अध्याय ९ * २४३
| अनन्ता शक्तयोऽव्यक्ते मायाद्याः संस्थिता ध्रुवाः।<br>तस्मिन् दिवि स्थितं नित्यमव्यक्तं भाति केवलम्॥ ७ ॥<br><br>याभिस्तल्लक्ष्यते भिन्नमभिन्नं तु स्वभावतः।<br>एकया मम सायुज्यमनादिनिधनं ध्रुवम्॥ ८ ॥<br><br>पुंसोऽभूदन्यया भूतिरन्यया तत्तिरोहितम्।<br>अनादिमध्यं तिष्ठन्तं युज्यतेऽविद्यया किल॥ ९ ॥<br><br>तदेतत् परं व्यक्तं प्रभामण्डलमण्डितम्।<br>तदक्षरं परं ज्योतिस्तद् विष्णोः परमं पदम्॥ १०॥<br><br>तत्र सर्वमिदं प्रोतमोतं चैवाखिलं जगत्।<br>तदेव च जगत् कृत्स्नं तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ११॥<br>यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।<br>आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् बिभेति न कुतश्चन॥ १२॥<br>वेदाहमेतं पुरुषं महान्त-<br>मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>तद् विज्ञाय परिमुच्येत विद्वान्<br>नित्यानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥ १३॥<br>यस्मात् परं नापरमस्ति किञ्चित्<br>यज्ज्योतिषां ज्योतिरेकं दिविस्थम्।<br>तदेवात्मानं मन्यमानोऽथ विद्वा-<br>नात्मानन्दी भवति ब्रह्मभूतः॥ १४॥<br>तदव्ययं कलिलं गूढदेहं<br>ब्रह्मानन्दममृतं विश्वधाम।<br>वदन्त्येवं ब्राह्मणा ब्रह्मनिष्ठा<br>यत्र गत्वा न निवर्तन्त भूयः॥ १५॥<br>हिरण्मये परमाकाशतत्त्वे<br>यदर्चिषि प्रभातीव तेजः।<br>तद्विज्ञाने परिपश्यन्ति धीरा<br>विभ्राजमानं विमलं व्योम धाम॥ १६॥<br><br>ततः परं परिपश्यन्ति धीरा<br>आत्मन्यात्मानमनुभूयानुभूय ।<br>स्वयम्प्रभः परमेष्ठी महीयान्<br>ब्रह्मानन्दी भगवानीश एषः॥ १७॥ | अव्यक्तमें ही माया आदि अनन्त ध्रुव शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं और वह अव्यक्त अकेले ही विशुद्ध शब्दतन्मात्रारूप आकाशतत्त्वमें स्थित रहते हुए सदा प्रकाशित रहता है। स्वभावतः वह अभिन्न (अव्यक्त) तत्त्व जिनके द्वारा अनेक रूपोंमें प्रतिभासित होता है, उनकी मूल एक (परम) शक्तिसे आदि और अन्तरहित मेरा ध्रुव सायुज्य प्राप्त होता है। पुरुषकी दूसरी शक्तिसे भूति (ऐश्वर्य)-की उत्पत्ति तथा अन्य शक्तिसे उसका (भूतिका) लोप होता है। आदि एवं मध्यरहित सर्वत्र विद्यमान (पुरुष) ही अविद्यासे (स्वेच्छाया) युक्त होता है। प्रभामण्डलसे मण्डित वह परम व्यक्त, अक्षर, परम ज्योतिरूप है और वह विष्णुका परमपद है। उसमें ही यह सारा जगत् ओतप्रोत है। वही सम्पूर्ण जगत् है। उसे जान लेनेसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है॥ ७-११॥<br><br>मनके साथ वाणी जिसे न पाकर लौट आती है, उस आनन्दस्वरूप ब्रह्माको जाननेवाला कहीं भयभीत नहीं होता। मैं इस तमोगुणसे परे आदित्यके समान वर्णवाले अर्थात् प्रकाशयुक्त महान् पुरुषको जानता हूँ, इसे जानकर विद्वान् मुक्त हो जाता है और नित्य आनन्दस्वरूप तथा ब्रह्ममय हो जाता है॥ १२-१३॥<br><br>जिससे परे और भिन्न कुछ भी नहीं है और जो द्युलोकमें स्थित सभी ज्योतियोंका एकमात्र प्रकाशक है, उसीको आत्मा माननेवाला विद्वान् नित्य आनन्द-स्वरूप ब्रह्ममय हो जाता है। ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण उसे अविनाशी, कलिल, गूढदेह, ब्रह्मानन्द, अमृत तथा विश्वधाम कहते हैं। वहाँ पहुँचनेपर फिर लौटना नहीं पड़ता॥ १४-१५॥<br><br>हिरण्मय प्रकाशयुक्त परम आकाशतत्त्वमें जो तेजके समान प्रतिभासित होता है, धीर जन (आत्मस्थ) विज्ञानमें उस प्रकाशमान निर्मल व्योम (ब्रह्म) एवं धाम (परम प्राप्तव्य)-का दर्शन करते हैं। तदनन्तर अपने आत्मामें आत्माका बार-बार अनुभव करके धीर पुरुष परम तत्त्वका दर्शन करते हैं और उन्हें यह ज्ञान होता है—यही (आत्मतत्त्व) स्वयं प्रकाशमान, परमेष्ठी, महान् ब्रह्मानन्दस्वरूप भगवान् ईशके रूपमें है॥ १६-१७॥ |
२८४ * कूर्मपुराण *
| एको देवः सर्वभूतेषु गूढः<br>सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।<br>तमेवैकं येऽनुपश्यन्ति धीरा-<br>स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १८ ॥ | सभी प्राणियोंके अन्तरात्मा, सर्वव्यापी एक देव ही सभी प्राणियोंमें छिपे हुए हैं। जो धीर पुरुष उन एक अद्वितीयका दर्शन करते हैं, उन्हें ही शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, दूसरोंको नहीं। वे भगवान् सभी ओर मुख, सिर तथा ग्रीवावाले, सभी प्राणियोंके (हृदयरूपी) गुहामें स्थित और सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले हैं। उनसे भिन्न कुछ नहीं है॥ १८-१९॥ |
| सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः।<br>सर्वव्यापी च भगवान् न तस्मादन्यदिष्यते ॥ १९ ॥ | |
| इत्येतदैश्वरं ज्ञानमुक्तं वो मुनिपुंगवाः।<br>गोपनीयं विशेषेण योगिनामपि दुर्लभम् ॥ २० ॥ | मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार यह आपको ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान बतलाया। यह विशेषरूपसे गोपनीय है और योगियोंके लिये भी दुर्लभ है॥ २०॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) नवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९ ॥
दसवाँ अध्याय
ईश्वरद्वारा परम तत्त्व तथा परम ज्ञानके स्वरूपका निरूपण और उसकी प्राप्तिके साधनका वर्णन
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
|---|---|
| अलिङ्गमेकमव्यक्तं लिङ्गं ब्रह्मेति निश्चितम्।<br>स्वयंज्योतिः परं तत्त्वं परे व्योम्नि व्यवस्थितम् ॥ १ ॥ | अलिङ्ग (चिह्नरहित), अद्वितीय, अव्यक्त, लिङ्गको ब्रह्म कहा गया है। वह स्वयं प्रकाशरूप परम तत्त्व परम व्योममें अवस्थित है। जो निर्गुण, विशुद्ध विज्ञानरूप, अक्षर और अव्यक्त कारण-रूप है, उस परमपदका विद्वान् लोग साक्षात्कार करते हैं। जिसे वेदमें तल्लिङ्ग अर्थात् हेतुरूप कहा गया है, उस परम ब्रह्मका शान्तसंकल्पवाले, तत्परायण और नित्य उनके भावसे भावित लोग साक्षात्कार करते हैं॥ १–३॥ |
| अव्यक्तं कारणं यत्तदक्षरं परमं पदम्।<br>निर्गुणं शुद्धविज्ञानं तद् वै पश्यन्ति सूरयः ॥ २ ॥ | |
| तन्निष्ठाः शान्तसंकल्पा नित्यं तद्भावभाविताः।<br>पश्यन्ति तत् परं ब्रह्म यत्तल्लिङ्गमिति श्रुतिः ॥ ३ ॥ | |
| अन्यथा नहि मां द्रष्टुं शक्यं वै मुनिपुंगवाः।<br>नहि तद् विद्यते ज्ञानं यतस्तज्ज्ञायते परम् ॥ ४ ॥ | मुनिश्रेष्ठो! अन्य किसी प्रकार मेरा दर्शन नहीं हो सकता। ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जिससे उस परम तत्त्वको जाना जा सके। इस परम ज्ञानको केवल विद्वान् ही जानते हैं। इसके अतिरिक्त सभी कुछ अज्ञानस्वरूप है, जिससे यह मायामय जगत् (उत्पन्न) है॥ ४-५॥ |
| एतत्त्परमं ज्ञानं केवलं कवयो विदुः।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं यस्मान्मायामयं जगत् ॥ ५ ॥ | |
| यज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम्।<br>ममात्मासौ तदेवेदमिति प्राहुर्विपश्चितः ॥ ६ ॥ | जो निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्प तथा अव्यय ज्ञान है, वही मेरा आत्मरूप है—ऐसा विद्वानोंका कहना है। जो उसे (उस परम तत्त्वको) अनेक रूपसे देखते हैं, वे भी परम निष्ठा (भक्ति)-का आश्रय ग्रहणकर अद्वितीय अविनाशी तत्त्वका ज्ञान प्राप्तकर उसी परम तत्त्वको देखते हैं ॥ ६-७ ॥ |
| येऽप्यनेकं प्रपश्यन्ति तेऽपि पश्यन्ति तत्परम्।<br>आश्रिताः परमां निष्ठां बुद्ध्वैकं तत्त्वमव्ययम् ॥ ७ ॥ |
| * अध्याय १० * | २८५ |
|---|
| ये पुनः परमं तत्त्वमेकं वानेकमिश्वरम्।<br>भक्त्या मां सम्प्रपश्यन्ति विज्ञेयास्ते तदात्मकाः ॥ ८ ॥ | और जो दूसरे लोग पुनः एक या अनेक रूपोंमें परम तत्त्वरूप ईश्वरका भक्तिद्वारा साक्षात्कार करते हैं, उन्हें तदात्मक अर्थात् उस ब्रह्मका स्वरूप ही जानना चाहिये ॥ ८ ॥ |
| साक्षादेव प्रपश्यन्ति स्वात्मानं परमेश्वरम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं सत्यरूपमिति स्थितिः ॥ ९ ॥ | वे वस्तुतः नित्यानन्दस्वरूप, निर्विकल्प तथा सत्यस्वरूप साक्षात् परमेश्वरको अपनी आत्मामें देखते हैं यह वस्तुस्थिति है। अपने अव्यक्त परम आत्मामें अवस्थित शान्त (योगीजन), श्रेष्ठ परम तत्त्वके परमानन्दस्वरूप, सर्वव्यापी तदात्मक तत्त्वकी उपासना करते हैं। यही परम मुक्ति है, विद्वान् इसे मेरा उत्तम सायुज्य (नामक मोक्ष), निर्वाण ब्रह्मके साथ ऐक्य और कैवल्यरूपसे जानते हैं। ये परम शिव आदि, मध्य और अन्तसे रहित अद्वितीय तत्त्व हैं। ये ही महादेव हैं, ईश्वर हैं, इसलिये इन्हें जाननेसे मुक्ति मिल जाती है ॥ ९—१२ ॥ |
| भजन्ते परमानन्दं सर्वगं यत्तदात्मकम्।<br>स्वात्मन्यवस्थिताः शान्ताः परेऽव्यक्ते परस्य तु ॥ १० ॥ | |
| एषा विमुक्तिः परमा मम सायुज्यमुत्तमम्।<br>निर्वाणं ब्रह्मणा चैक्यं कैवल्यं कवयो विदुः ॥ ११ ॥ | |
| तस्मादनादिमध्यान्तं वस्त्वेकं परमं शिवम्।<br>स ईश्वरो महादेवस्तं विज्ञाय विमुच्यते ॥ १२ ॥ | |
| न तत्र सूर्यः प्रविभातीह चन्द्रो<br>न नक्षत्राणि तपनो नोत विद्युत्।<br>तद्भासेदमखिलं भाति नित्यं<br>तन्नित्यभासमचलं सद्दिभाति ॥ १३ ॥ | वहाँ (परम तत्त्व परमेश्वरमें) न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा, न नक्षत्र, न अग्नि और न ही विद्युत्। उसीके प्रकाशसे सम्पूर्ण (विश्व) प्रकाशित होता है। वह नित्य प्रकाश अचल एवं सद्रूपसे प्रकाशित होता है। जो परम बृहत् विशुद्ध तत्त्व निर्विकल्प ज्ञानस्वरूप और नित्य उदित हुआ ज्ञानसे ही प्रकाशित होता है, उसीमें ब्रह्मज्ञानी लोग जिस नित्य अचल तत्त्वका दर्शन करते हैं, वही ईश हैं ॥ १३–१४ ॥ |
| नित्योदितं संविदा निर्विकल्पं<br>शुद्धं बृहन्तं परमं यदिभाति।<br>अत्रान्तरं ब्रह्मविदोऽथ नित्यं<br>पश्यन्ति तत्त्वमचलं यत् स ईशः ॥ १४ ॥ | |
| नित्यानन्दममृतं सत्यरूपं<br>शुद्धं वदन्ति पुरुषं सर्ववेदाः।<br>तमोमिति प्रणवेनेशितारं<br>ध्यायन्ति वेदार्थविनिश्चितार्थाः ॥ १५ ॥ | सभी वेद पुरुषको नित्य आनन्दरूप, अमृतरूप और विशुद्ध सत्यस्वरूप कहते हैं। वेदार्थका निश्चय किये हुए लोग 'ॐ' इस प्रणवके द्वारा उस नियामकका ध्यान करते हैं। परम आकाशके मध्यमें एकमात्र अद्वितीय देव शिव ही प्रकाशित होते हैं; वहाँ न भूमि है, न जल है, न मन है और न अग्नि ही है। इसी प्रकार प्राण, वायु, आकाश, बुद्धि तथा अन्य कोई चेतन-तत्त्व वहाँ नहीं है ॥ १५-१६ ॥ |
| न भूमिरापो न मनो न वह्निः<br>प्राणोऽनिलो गगनं नोत बुद्धिः।<br>न चेतनोऽन्यत् परमाकाशमध्ये<br>विभाति देवः शिव एव केवलः ॥ १६ ॥ | |
| इत्येतदुक्तं परमं रहस्यं<br>ज्ञानामृतं सर्ववेदेषु गूढम्।<br>जानाति योगी विजनेऽथ देशे<br>युञ्जीत योगं प्रयतो ह्यजस्रम् ॥ १७ ॥ | यह मैंने सभी वेदोंमें निहित परम रहस्यमय ज्ञानरूपी अमृतका वर्णन किया। किसी निर्जन प्रदेशमें निरन्तर प्रयत्नपूर्वक साधना करनेवाला योगी ही इस ज्ञानको जानता है ॥ १७ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १० ॥
२८६ * कूर्मपुराण *
ग्यारहवाँ अध्याय
योगकी महिमा, अष्टाङ्गयोग, यम, नियम आदि योगसाधनोंका लक्षण, प्राणायामका विशेष प्रतिपादन, ध्यानके विविध प्रकार, पाशुपत-योगका वर्णन, वाराणसीमें प्राणत्यागकी महिमा, शिव-आराधनकी विधि, शिव और विष्णुके अभेदका प्रतिपादन, शिवज्ञान-योगकी परम्पराका वर्णन, ईश्वरगीताकी फलश्रुति तथा उपसंहार
| ईश्वर उवाच | **ईश्वरने कहा—**इसके अनन्तर उस परम दुर्लभ योगको कहता हूँ, जिससे सूर्यके समान ईश्वररूप आत्माका दर्शन होता है अर्थात् सूर्यका जैसे प्रत्यक्ष हो रहा है, वैसे ही ईश्वरका प्रत्यक्ष होता है॥ १ ॥ |
|---|---|
| अतः परं प्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम्।<br>येनात्मानं प्रपश्यन्ति भानुमन्तमिवेश्वरम्॥ १ ॥<br>योगाग्निर्दहति क्षिप्रमशेषं पापपञ्जरम्।<br>प्रसन्नं जायते ज्ञानं साक्षान्निर्वाणसिद्धिदम्॥ २ ॥<br><br>योगात् संजायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य प्रसीदति महेश्वरः॥ ३ ॥<br><br>एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव वा।<br>ये युञ्जन्तीह मद्योगं ते विज्ञेया महेश्वराः॥ ४ ॥ | योगरूपी अग्नि शीघ्र ही सम्पूर्ण पापपञ्जरको भस्म कर देता है और (उसके बाद) साक्षात् मुक्तिरूप सिद्धि प्रदान करनेवाला प्रसन्न (निर्मल) ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित होता है। योग तथा ज्ञानसे सम्पन्न व्यक्तिपर महेश्वर प्रसन्न होते हैं। जो नित्य एक समय, दो समय या तीनों समय मेरे योगका साधन करते हैं, उन्हें महेश्वर समझना चाहिये॥ २—४॥ |
| योगस्तु द्विविधो ज्ञेयो ह्यभावः प्रथमो मतः।<br>अपरस्तु महायोगः सर्वयोगोत्तमोत्तमः॥ ५ ॥<br><br>शून्यं सर्वनिर्भासं स्वरूपं यत्र चिन्त्यते।<br>अभावयोगः स प्रोक्तो येनात्मानं प्रपश्यति॥ ६ ॥<br><br>यत्र पश्यति चात्मानं नित्यानन्दं निरञ्जनम्।<br>मयैक्यं स महायोगो भाषितः परमेश्वरः॥ ७ ॥ | योग दो प्रकारका समझना चाहिये, पहला अभावयोग है और दूसरा सभी योगोंमें उत्तमोत्तम महायोग कहलाता है। जिसमें सभी आभासोंसे रहित शून्यमय (निर्विकल्पक) स्वरूपका चिन्तन होता है और जिसके द्वारा आत्माका साक्षात्कार होता है, वह अभावयोग कहा गया है। जिसमें नित्यानन्दस्वरूप निरञ्जन आत्माका दर्शन होता है और मेरे साथ एकता होती है, वह परमेश्वररूप महायोग कहा गया है॥ ५—७॥ |
| ये चान्ये योगिनां योगाः श्रूयन्ते ग्रन्थविस्तरे।<br>सर्वे ते ब्रह्मयोगस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ८ ॥<br><br>यत्र साक्षात् प्रपश्यन्ति विमुक्ता विश्वमीश्वरम्।<br>सर्वेषामेव योगानां स योगः परमो मतः॥ ९ ॥<br><br>सहस्रशोऽथ शतशो ये चेश्वरबहिष्कृताः।<br>न ते पश्यन्ति मामेकं योगिनो यतमानसाः॥ १० ॥ | अन्य जिन योगियोंके योगोंका ग्रन्थोंमें विस्तार हुआ है, वे सभी ब्रह्मयोगकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिस योगमें मुक्त पुरुष विश्वको साक्षात् ईश्वरके रूपमें देखते हैं, वह सभी योगोंमें श्रेष्ठ योग माना जाता है। जो सैकड़ों, हजारों अन्य प्रकारके मनको संयमित करनेवाले ईश्वरबहिष्कृत (वेदबाह्य) योगी हैं, वे मुझ अद्वितीयका दर्शन नहीं करते॥ ८—१०॥ |
- अध्याय ११ * | २८७ ---|---
प्राणायामस्तथा ध्यानं प्रत्याहारोऽथ धारणा ।<br>समाधिश्च मुनिश्रेष्ठा यमो नियम आसनम् ॥ ११ ॥<br>मय्येकचित्ततायोगो वृत्त्यन्तरनिरोधतः ।<br>तत्साधनान्यष्टधा तु युष्माकं कथितानि तु ॥ १२ ॥<br>अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहौ<br>यमाः संक्षेपतः प्रोक्ताश्चित्तशुद्धिप्रदा नृणाम् ॥ १३ ॥<br><br>कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा ।<br>अक्लेशजननं प्रोक्तं त्वहिंसा परमर्षिभिः ॥ १४ ॥<br><br>अहिंसायाः परो धर्मो नास्त्यहिंसा परं सुखम् ।<br>विधिना या भवेद्धिंसा त्वहिंसैव प्रकीर्तिता ॥ १५ ॥<br><br>सत्येन सर्वमाप्नोति सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ।<br>यथार्थकथनाचारः सत्यं प्रोक्तं द्विजातिभिः ॥ १६ ॥<br><br>परद्रव्यापहरणं चौर्याद् वाथ बलेन वा ।<br>स्तेयं तस्यानाचरणादस्तैयं धर्मसाधनम् ॥ १७ ॥<br><br>कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।<br>सर्वत्र मैथुनत्यागं ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥ १८ ॥<br>द्रव्याणामप्यनादानमापद्यपि यथेच्छया ।<br>अपरिग्रह इत्याहुस्तं प्रयत्नेन पालयेत् ॥ १९ ॥<br><br>तपःस्वाध्यायसंतोषाः शौचमीश्वरपूजनम् ।<br>समासान्नियमाः प्रोक्ता योगसिद्धिप्रदायिनः ॥ २० ॥<br><br>उपवासपराकादिकृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः ।<br>शरीरशोषणं प्राहुस्तापसास्तप उत्तमम् ॥ २१ ॥<br>वेदान्तशतरुद्रीयप्रणवादिजपं बुधाः ।<br>सत्त्वशुद्धिकरं पुंसां स्वाध्यायं परिचक्षते ॥ २२ ॥<br><br>स्वाध्यायस्य त्रयो भेदा वाचिकोपांशुमानसाः ।<br>उत्तरोत्तरवैशिष्ट्यं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः ॥ २३ ॥<br><br>यः शब्दबोधजननः परेषां शृण्वतां स्फुटम् ।<br>स्वाध्यायो वाचिकः प्रोक्त उपांशोरथ लक्षणम् ॥ २४ ॥ | मुनिश्रेष्ठो ! अन्य वृत्तियोंका निरोधकर मेरेमें एकचित्तता ही योग है और इस योगके जो आठ साधन मैंने आप लोगोंको बताये हैं वे ये हैं—प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, धारणा, समाधि, यम, नियम तथा आसन* ॥ ११-१२ ॥<br>अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह—संक्षेपमें इन्हें यम कहा गया है। ये मनुष्योंके चित्तकी शुद्धि करनेवाले हैं। मन, वाणी तथा कर्मसे सभी प्राणियोंको सर्वदा किसी भी प्रकारका क्लेश प्रदान न करना—इसे श्रेष्ठ ऋषियोंने अहिंसा कहा है। अहिंसासे श्रेष्ठ (कोई) धर्म नहीं है और अहिंसासे बढ़कर कोई सुख नहीं है। वेदविहित हिंसाको अहिंसा ही कहा गया है। सत्यके द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है, सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। द्विजातियोंके द्वारा यथार्थ कथनके आचारको सत्य कहा गया है। चोरीसे अथवा बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है, उसका (स्तेयका) आचरण न करना अस्तेय है, यह धर्मका साधन है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा सभी अवस्थाओंमें सर्वदा सर्वत्र मैथुनका त्याग करना ब्रह्मचर्य कहलाता है ॥ १३—१८ ॥<br>आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्योंका ग्रहण न करना 'अपरिग्रह' कहा गया है। प्रयत्नपूर्वक उस अपरिग्रहका पालन करना चाहिये। तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच तथा ईश्वरका पूजन—संक्षेपमें नियम बतलाये गये हैं, ये योगसिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। तपस्वियोंने पराक आदि उपवासों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि (व्रतों)-के द्वारा शरीरके शोषणको उत्तम तप कहा है ॥ १९—२१ ॥<br>विद्वान् लोगोंने वेदान्तशास्त्र, शतरुद्रिय और प्रणव आदिके जपको पुरुषोंके लिये सत्त्वकी शुद्धि करनेवाला 'स्वाध्याय' कहा है। स्वाध्यायके तीन भेद हैं—वाचिक, उपांशु और मानस। वेदार्थ जाननेवालोंने इन तीनोंमें उत्तरोत्तरका वैशिष्ट्य कहा है अर्थात् वाचिक स्वाध्यायसे उपांशु स्वाध्याय श्रेष्ठ और उपांशु स्वाध्यायसे मानस स्वाध्याय श्रेष्ठ है। दूसरे सुननेवालेको स्पष्टरूपसे शब्दका ज्ञान उत्पन्न करानेवाला स्वाध्याय 'वाचिक' कहलाता है। (अर्थात् वह स्वाध्याय वाचिक है जो दूसरोंको स्पष्ट सुनायी पड़े।) अब उपांशुका लक्षण बतलाया जाता है ॥ २२—२४ ॥
* यद्यपि अष्टाङ्गयोगके साधन ऊपर निर्दिष्ट क्रमसे ही मूलमें वर्णित हैं, पर यह वर्णन छन्दकी दृष्टिसे है। वास्तवमें साधनोंका क्रम इस प्रकार है—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि।
| २८८ | * कूर्मपुराण * |
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ओष्ठयोः स्पन्दमात्रेण परस्याशब्दबोधकः ।
उपांशुरेष निर्दिष्टः साहस्त्रो वाचिकाज्जपः ॥ २५ ॥
यत्पदाक्षरसङ्गत्या परिस्पन्दनवर्जितम् ।
चिन्तनं सर्वशब्दानां मानसं तं जपं विदुः ॥ २६ ॥
यदृच्छालाभतो नित्यमलं पुंसो भवेदिति ।
या धीस्तामृषयः प्राहुः संतोषं सुखलक्षणम् ॥ २७ ॥
बाह्याभ्यन्तरं शौचं द्विधा प्रोक्तं द्विजोत्तमाः ।
मृज्जलाभ्यां स्मृतं बाह्यं मनःशुद्धिरथान्तरम् ॥ २८ ॥
स्तुतिस्मरणपूजाभिर्वाङ्मनःकायकर्मभिः ।
सुनिश्चला शिवे भक्तिरेतदीश्वरपूजनम् ॥ २९ ॥
यमाः सनियमाः प्रोक्ताः प्राणायामं निबोधत ।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ॥ ३० ॥
उत्तमाधममध्यत्वात् त्रिधायं प्रतिपादितः ।
स एव द्विविधः प्रोक्तः सगर्भोऽगर्भ एव च ॥ ३१ ॥
मात्राद्वादशको मन्दश्चतुर्विंशतिमात्रिकः ।
मध्यमः प्राणसंरोधः षट्त्रिंशन्मात्रिकोत्तमः ॥ ३२ ॥
प्रस्वेदकम्पनोत्थानजनकत्वं यथाक्रमम् ।
मन्दमध्यममुख्यानामानन्दादुत्तमोत्तमः ॥ ३३ ॥
सगर्भमाहुः सजपमगर्भं विजपं बुधाः ।
एतद् वै योगिनामुक्तं प्राणायामस्य लक्षणम् ॥ ३४ ॥
सव्याहृतिं सप्रणवां गायत्रीं शिरसा सह ।
त्रिर्जपेदायतप्राणः प्राणायामः स उच्यते ॥ ३५ ॥
रेचकः पूरकश्चैव प्राणायामोऽथ कुम्भकः ।
प्रोच्यते सर्वशास्त्रेषु योगिभिर्यतमानसैः ॥ ३६ ॥
| ओठोंमें केवल स्पन्दन होनेके कारण दूसरेको शब्दका बोध न करानेवाला स्वाध्याय 'उपांशु' कहा गया है। यह वाचिक जपसे हजार गुना श्रेष्ठ है। (अर्थात् वही स्वाध्याय उपांशु है जिसमें ओठोंमें मात्र स्पन्दन हो, शब्दोंका उच्चारण न हो।) स्पन्दनरहित अक्षर एवं उस पदकी संगतिके अनुसार सभी शब्दोंके चिन्तनको विद्वान् मानस जप कहते हैं (अर्थात् मानस जप (स्वाध्याय) वही है जिसमें स्वाध्यायके शब्दोंपर केवल मन केन्द्रित हो बाकी सर्वथा व्यापारशून्य हो)। पुरुषको जो यदृच्छापूर्वक मिल जाता है, उसे ही पर्याप्त समझने-वाली बुद्धिको ऋषिलोग नित्य सुख लक्षणवाला संतोष कहते हैं॥ २५-२७॥ <br><br> द्विजश्रेष्ठो! बाह्य और आभ्यन्तर-भेदसे शौच दो प्रकारका कहा गया है। मिट्टी और जलसे होनेवाला शौच बाह्य शौच और मनकी शुद्धि आभ्यन्तर शौच है। मन, वाणी तथा कर्मद्वारा स्तुति, स्मरण तथा पूजा करते हुए शिवमें अचल भक्ति रखना—यह ईश्वरका पूजन है। नियमोंके साथ यमोंको बतलाया गया, अब प्राणायामके विषयमें सुनो—अपनी देहसे उत्पन्न वायुको प्राण कहते हैं और उस वायुका निरोध करना आयाम है। उत्तम, मध्यम तथा अधमके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है। वही सगर्भ और अगर्भ-भेदसे दो प्रकारका है। द्वादश मात्रा (अर्थात् प्रणवका बारह बार जप करनेतक)-के कालको मन्द प्राणायाम, चौबीस मात्रा (-के प्राणनिरोध)-को मध्यम और छत्तीस मात्रातकके कालतक प्राणनिरोधको उत्तम प्राणायाम कहा जाता है॥ २८-३२॥ <br><br> मन्द, मध्यम तथा मुख्य अर्थात् उत्तम नामके प्राणायामोंमें क्रमसे प्रस्वेद (पसीना) कम्पन तथा उत्थान होता है। इनसे तत्त्व-प्राप्तिमें क्रमशः आनन्दातिशयकी अनुभूति होती है। विद्वान् जपयुक्त प्राणायामको सगर्भ और जप-रहितको अगर्भ कहते हैं। योगियोंके प्राणायामका यही लक्षण कहा गया है। प्राणधारणपूर्वक व्याहृति (भूः, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्), प्रणव और शीर्षमन्त्रसहित गायत्रीका तीन बार जप (सगर्भ) प्राणायाम कहा जाता है। मनको संयत करनेवाले योगियोंने सभी शास्त्रोंमें रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायामका वर्णन किया है॥ ३३-३६॥ |
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अध्याय ११ २८९
| रेचकोऽजस्रनिःश्वासात् पूरकस्तन्निरोधतः ।<br>साम्येन संस्थितिर्या सा कुम्भकः परिगीयते ॥ ३७॥ | वायुके सतत बाहर निकालनेको रेचक और उसके रोकनेको पूरक तथा बादकी सम अवस्थाकी जो स्थिति है, उसे कुम्भक कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो ! सज्जनोंने |
| इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु स्वभावतः ।<br>निग्रहः प्रोच्यते सद्भिः प्रत्याहारस्तु सत्तमाः ॥ ३८ ॥ | स्वभावतः विषयोंमें विचरण करनेवाली इन्द्रियोंके निग्रहको प्रत्याहार कहा है। हृदयकमल, नाभिदेश, मूर्धा तथा |
| हृत्पुण्डरीके नाभ्यां वा मूर्ध्नि पर्वतमस्तके ।<br>एवमादिषु देशेषु धारणा चित्तबन्धनम् ॥ ३९ ॥ | पर्वतशिखर आदि स्थानोंमें चित्तके बन्धनको धारणा कहा जाता है। किसी देश (स्थान)-विशेषका अवलम्बनकर |
| देशावस्थितिमालम्ब्य बुद्धेर्या वृत्तिसंततिः ।<br>वृत्त्यन्तरैरसंमृष्टा तद्ध्यानं सूरयो विदुः ॥ ४० ॥ | उसमें बुद्धिकी जो एकतान वृत्ति बनी रहती है और दूसरी वृत्तियोंसे कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है, उसे |
| एकाकारः समाधिः स्याद् देशालम्बनवर्जितः ।<br>प्रत्ययो ह्यर्थमात्रेण योगसाधनमुत्तमम् ॥ ४१ ॥ | विद्वानोंने ध्यान कहा है। किसी देश या अन्य आलम्बनसे रहित चित्तकी एकाकारता समाधि है। इसमें ध्येयमात्रका भान होता है। यह योगका उत्तम साधन है। बारह |
| धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादश धारणाः ।<br>ध्यानं द्वादशकं यावत् समाधिरभिधीयते ॥ ४२ ॥ | प्राणायामपर्यन्त धारणा, बारह धारणापर्यन्त ध्यान और बारह ध्यानपर्यन्त समाधि कही जाती है ॥ ३७-४२ ॥ |
| आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा ।<br>साधनानां च सर्वेषामेतत्साधनमुत्तमम् ॥ ४३ ॥ | स्वस्तिकासन, पद्मासन तथा अर्धासन-भेदसे आसन (तीन प्रकारका) कहा गया है। सभी साधनोंमें यह साधन उत्तम है। विप्रेन्द्रो ! अपने दोनों ऊरुओंके ऊपर |
| ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्राः कृत्वा पादतले उभे ।<br>समासीतात्मनः पद्ममेतदासनमुत्तमम् ॥ ४४ ॥ | दोनों पादतलोंको रखकर बैठनेको उत्तम पद्म नामक आसन कहा गया है। श्रेष्ठ मुनियो ! एक पैरको दूसरे |
| एकं पादमथैकस्मिन् विन्यस्योरुणि सत्तमाः ।<br>आसीतार्धासनमिदं योगसाधनमुत्तमम् ॥ ४५ ॥ | जाँघके ऊपर रखकर बैठनेको अर्धासन कहा जाता है। यह योगका उत्तम साधन है। दोनों पैरोंको जानुओं |
| उभे कृत्वा पादतले जानूर्वोरन्तरेण हि ।<br>समासीतात्मनः प्रोक्तमासनं स्वस्तिकं परम् ॥ ४६ ॥ | एवं ऊरुओंके भीतर करके बैठनेको श्रेष्ठ स्वस्तिक नामक आसन कहा जाता है ॥ ४३-४६ ॥ |
| अदेशकाले योगस्य दर्शनं हि न विद्यते ।<br>अग्न्यभ्याशे जले वापि शुष्कपर्णचये तथा ॥ ४७ ॥ | विपरीत देश (स्थान) और विपरीत कालमें योगतत्त्वका दर्शन भी नहीं होता। अग्निके समीप, जलमें, सूखे पत्तोंके ढेरके मध्य, जन्तुओंसे भरे स्थानमें, श्मशानमें, |
| जन्तुव्याप्ते श्मशाने च जीर्णगोष्ठे चतुष्पथे ।<br>सशब्दे सभये वापि चैत्यवल्मीकसंचये ॥ ४८ ॥ | पुराने गोष्ठमें, चौराहेमें, कोलाहल और भययुक्त स्थानमें, चैत्यके समीप, दीमकोंसे पूर्ण स्थान, अशुभ |
| अशुभे दुर्जनाक्रान्ते मशकादिसमन्विते ।<br>नाचरेद् देहबाधे वा दौर्मनस्यादिसम्भवे ॥ ४९ ॥ | स्थान, दुर्जनोंसे व्याप्त और मच्छर आदिसे भरे स्थान तथा देह-सम्बन्धी कष्ट और मनकी अस्वस्थताकी दशामें योग-साधन नहीं करना चाहिये। अच्छी प्रकार |
| सुगुप्ते सुशुभे देशे गुहायां पर्वतस्य तु ।<br>नद्यास्तीरे पुण्यदेशे देवतायतने तथा ॥ ५० ॥ | रक्षित, शुभ स्थान, पर्वतकी गुफा, नदीके किनारे, पुण्यदेश, देवमन्दिर, घर, शुभ, रमणीय, जनशून्य, |
| गृहे वा सुशुभे रम्ये विजने जन्तुवर्जिते ।<br>युञ्जीत योगी सततमात्मानं मत्परायणः ॥ ५१ ॥ | जन्तुओंसे रहित स्थानोंमें योगीको सतत अपनेको मेरे परायण रखते हुए योग-साधना करनी चाहिये। |
| नमस्कृत्य तु योगीन्द्रान् सशिष्यांश्च विनायकम् ।<br>गुरुं चैवाथ मां योगी युञ्जीत सुसमाहितः ॥ ५२ ॥ | योगीको चाहिये कि वह शिष्योंसहित श्रेष्ठ योगियों, विनायक, गुरु तथा मुझे प्रणाम करके समाहित-मन होकर योग-साधना करे ॥ ४७-५२ ॥ |
२९० * कूर्मपुराण *
| आसनं स्वस्तिकं बद्ध्वा पद्ममर्धमथापि वा।<br>नासिकाग्रे समां दृष्टिमीषदन्मीलितेक्षणः॥ ५३॥<br><br>कृत्वाथ निर्भयः शान्तस्त्यक्त्वा मायामयं जगत्।<br>स्वात्मन्यवस्थितं देवं चिन्तयेत् परमेश्वरम्॥ ५४॥ | स्वस्तिक, पद्म अथवा अर्धासन बाँधकर नासिकाके अग्रभागमें कुछ-कुछ खुली हुई आँखोंसे दृष्टिको स्थिर करके निर्भय तथा शान्त होकर मायामय संसार (-के चिन्तन)-का परित्यागकर अपने आत्मामें स्थित परमेश्वर देवका चिन्तन करना चाहिये॥ ५३-५४॥ |
| शिखाग्रे द्वादशाङ्गुल्ये कल्पयित्वाथ पङ्कजम्।<br>धर्मकन्दसमुद्भूतं ज्ञाननालं सुशोभनम्॥ ५५॥<br><br>ऐश्वर्याष्टदलं श्वेतं परं वैराग्यकर्णिकम्।<br>चिन्तयेत् परमं कोशं कर्णिकायां हिरण्मयम्॥ ५६॥<br><br>सर्वशक्तिमयं साक्षाद् यं प्राहुर्दिव्यमव्ययम्।<br>ओंकारवाच्यमव्यक्तं रश्मिजालसमाकुलम्॥ ५७॥<br><br>चिन्तयेत् तत्र विमलं परं ज्योतिर्यदक्षरम्।<br>तस्मिन् ज्योतिषि विन्यस्य स्वात्मानं तदभेदतः॥ ५८॥<br><br>ध्यायीताकाशमध्यस्थमीशं परमकारणम्।<br>तदात्मा सर्वगो भूत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥ ५९॥ | शिखाके अग्रभागमें बारह अंगुलके प्रदेशमें धर्मस्वरूप कन्दसे प्रादुर्भूत, ज्ञानरूप नालवाले, ऐश्वर्यरूप आठ दलोंवाले, वैराग्यरूपी कर्णिकासे युक्त अत्यन्त श्वेत एवं सुन्दर कमलकी कल्पना करे और उस कमलकी कर्णिकामें हिरण्मय श्रेष्ठ कोशका ध्यान करे। उस (कोश)-में विशुद्ध अविनाशी साक्षात् परम ज्योतिका ध्यान करे, जिसे सर्वशक्तिसम्पन्न, दिव्य, अव्यय, ओंकारसे वाच्य, अव्यक्त और प्रकाशकी किरण-मालाओंसे व्यास कहा गया है। उस ज्योतिमें अपने आत्माकी अभेदभावना कर आकाशके मध्यमें स्थित परम कारणस्वरूप परमेश्वरका ध्यान करे और परमेश्वररूप एवं सर्वव्यापी होकर किसी भी अन्य वस्तुका चिन्तन न करे॥ ५५-५९॥ |
| एतद् गुह्यतमं ध्यानं ध्यानान्तरमथोच्यते।<br>चिन्तयित्वा तु पूर्वोक्तं हृदये पद्ममुत्तमम्॥ ६०॥<br><br>आत्मानमथ कर्तारं तत्रानलसमत्विषम्।<br>मध्ये वह्निशिखाकारं पुरुषं पञ्चविंशकम्॥ ६१॥<br><br>चिन्तयेत् परमात्मानं तन्मध्ये गगनं परम्।<br>ओंकारबोधितं तत्त्वं शाश्वतं शिवमच्युतम्॥ ६२॥ | यह अत्यन्त गुह्य ध्यान है। अब दूसरा ध्यान कहा जाता है। अपने हृदयदेशमें पूर्वमें कहे गये उत्तम कमलका चिन्तनकर उस कमलमें अग्निके समान तेजस्वी, कर्तारूप, पचीसवें तत्त्व पुरुषात्मक परमात्मरूप आत्माका चिन्तन करना चाहिये। उस परमात्माके भीतर परम आकाश (अवकाश) है (क्योंकि परमेश्वर विभु विराट् हैं)। ओंकारसे बोधित सनातन तत्त्व अच्युत शिव कहलाता है॥ ६०-६२॥ |
| अव्यक्तं प्रकृतौ लीनं परं ज्योतिरनुत्तमम्।<br>तदन्तः परमं तत्त्वमात्माधारं निरञ्जनम्॥ ६३॥<br><br>ध्यायीत तन्मयो नित्यमेकरूपं महेश्वरम्।<br>विशोध्य सर्वतत्त्वानि प्रणवेनाथवा पुनः॥ ६४॥<br><br>संस्थाप्य मयि चात्मानं निर्मले परमे पदे।<br>प्लावयित्वात्मनो देहं तेनैव ज्ञानवारिणा॥ ६५॥<br><br>मदात्मा मन्मयो भस्म गृहीत्वा ह्यग्निहोत्रजम्।<br>तेनोद्धृत्य तु सर्वाङ्गमग्निरित्यादिमन्त्रतः।<br>चिन्तयेत् स्वात्मनीशानं परं ज्योतिःस्वरूपिणम्॥ ६६॥ | उसके भीतर अव्यक्त, प्रकृतिमें लीन, उत्तम परम ज्योति, परम तत्त्व, आत्माधार, निरञ्जन, नित्य, एकरूप महेश्वरका तन्मय होकर ध्यान करना चाहिये। अथवा प्रणवके द्वारा पुनः सभी तत्त्वोंका शोधनकर विशुद्ध परमपदरूप मुझमें अपने आत्माको स्थापित करे और उसी ज्ञानरूपी जलसे अपनी देहको आप्लावित करके मुझमें चित्त आसक्त करे तथा मेरे परायण होकर अग्निहोत्रका भस्म ग्रहण करे और 'अग्नि०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा भस्मसे अपने सम्पूर्ण शरीरको उपलिप्त कर अपने आत्मामें परम ज्योतिस्वरूप ईशानका चिन्तन करे॥ ६३-६६॥ |
- अध्याय ११ * २९१
| एष पाशुपतो योगः पशुपाशविमुक्तये।<br>सर्ववेदान्तसारोऽयमत्याश्रममिति श्रुतिः॥ ६७॥<br><br>एतत् परतरं गुह्यं मत्सायज्योपपादकम्।<br>द्विजातीनां तु कथितं भक्तानां ब्रह्मचारिणाम्॥ ६८॥<br><br>ब्रह्मचर्यमहिंसा च क्षमा शौचं तपो दमः।<br>संतोषः सत्यमास्तिक्यं व्रताङ्गानि विशेषतः॥ ६९॥<br><br>एकेनाप्यथ हीनेन व्रतमस्य तु लुप्यते।<br>तस्मादात्मगुणोपेतो मद्व्रतं वोढुमर्हति॥ ७०॥ | जीवको बन्धनरूप पाशसे मुक्त करनेके लिये यह पाशुपत नामक योग कहा गया है। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है और श्रुतिमें इस योगकी अवस्थाको सभी आश्रमोंकी अवस्थासे अतीत अवस्था (उत्कृष्ट अवस्था) बतलाया गया है। इसे अत्यन्त गुह्य और द्विजातियों, भक्तों एवं ब्रह्मचारियोंके लिये मेरा सायुज्य प्रदान करनेवाला कहा गया है। ब्रह्मचर्य, अहिंसा, क्षमा, शौच, तप, दम, संतोष, सत्य तथा आस्तिकता—ये सभी (इस पाशुपत) व्रतके विशेष अङ्ग हैं। इनमेंसे एक (अङ्ग)-के भी न होनेसे इस (योग)-का व्रत लुप्त हो जाता है। इसलिये इन आत्मगुणों (ब्रह्मचर्य, अहिंसा आदि नौ व्रतके अङ्गों)-से युक्त साधक ही मेरा (पाशुपत) व्रत धारण कर सकता है॥ ६७-७०॥ |
| वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।<br>बहवोऽनेन योगेन पूता मद्भावमागताः॥ ७१॥<br><br>ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।<br>ज्ञानयोगेन मां तस्माद् यजेत परमेश्वरम्॥ ७२॥<br><br>अथवा भक्तियोगेन वैराग्येण परेण तु।<br>चेतसा बोधयुक्तेन पूजयेन्मां सदा शुचिः॥ ७३॥<br><br>सर्वकर्माणि संन्यस्य भिक्षाशी निष्परिग्रहः।<br>प्राप्नोति मम सायुज्यं गुह्यमेतन्मयोदितम्॥ ७४॥ | राग, भय और क्रोधसे रहित, मत्परायण और मेरे आश्रित अनेक लोग इस (पाशुपत) योगके द्वारा मेरा भाव प्राप्तकर पवित्र हो गये हैं। जो जिस प्रकार मेरे पास आते हैं, मैं भी उसी प्रकार उन्हें स्वीकार करता हूँ। इसलिये ज्ञानयोगके द्वारा मुझ परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। अथवा भक्तियोग, परम वैराग्य एवं ज्ञानयुक्त चित्तके द्वारा पवित्रतापूर्वक सदा मेरा पूजन करना चाहिये। सभी कर्मोंका परित्यागकर, भिक्षाका अन्न ग्रहण करते हुए अन्य कुछ भी संग्रह न करते हुए (साधना करनेवाला) साधक मेरा सायुज्य (नामक मोक्ष) प्राप्त करता है। यह मैंने गुह्य बात बतलायी॥ ७१-७४॥ |
| अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।<br>निर्ममो निरहंकारो यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ७५॥<br><br>संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।<br>मय्यर्पितमनो बुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ७६॥<br><br>यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।<br>हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स हि मे प्रियः॥ ७७॥ | जो सभी प्राणियोंसे द्वेष न करनेवाला, मित्रता करनेवाला, करुणायुक्त, ममतारहित और अहंकारसे रहित है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जो संतुष्ट रहनेवाला, निरन्तर योग-साधना करनेवाला, संयमित-चित्त, दृढ़निश्चयी और मुझमें मन तथा बुद्धि अर्पण करनेवाला है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। जिससे किसी भी प्राणीको उद्वेग प्राप्त नहीं होता और किसी भी प्राणीसे जो उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे होनेवाले उद्वेगोंसे रहित है, वह मुझे प्रिय है॥ ७५-७७॥ |
२९२ * कूर्मपुराण *
| अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।<br>सर्वारम्भपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥ ७८॥<br><br>तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित्।<br>अनिकेतः स्थिरमतिर्मद्भक्तो मामुपैष्यति॥ ७९॥<br><br>सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मत्परायणः।<br>मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं परमं पदम्॥ ८०॥ | जो किसी भी प्रकारकी अपेक्षा न रखनेवाला, पवित्र, कुशल (वेदशास्त्र-निषिद्धके त्यागमें सावधान) पक्षपातसे (शत्रु-मित्रभावसे) रहित, दुःखसे आक्रान्त होनेपर भी व्यथाका अनुभव न करनेवाला और सभी प्रकारके आरम्भोंका परित्याग करनेवाला है, वह भक्तियुक्त पुरुष मेरा प्रिय है। जो निन्दा एवं स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस किसी भी पदार्थसे संतुष्ट रहनेवाला, गृहसे (गृहासक्तिसे) रहित है, वह स्थिर बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझे प्राप्त करता है। मुझमें परायण रहनेवाला सभी कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे शाश्वत परमपद प्राप्त करता है॥ ७८–८०॥ |
| चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।<br>निराशीर्निर्ममो भूत्वा मामेकं शरणं व्रजेत्॥ ८१॥<br><br>त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।<br>कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव तेन निबध्यते॥ ८२॥<br><br>निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।<br>शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति तत्पदम्॥ ८३॥ | चित्तसे सभी कर्मोंको मुझमें अर्पितकर मत्परायण होते हुए आशा एवं ममताकी आसक्तिसे रहित होकर एकमात्र मेरी ही शरण ग्रहण करना चाहिये। कर्मफलकी आसक्तिका सर्वथा परित्यागकर नित्य संतुष्ट और (अन्य) आश्रयरहित (एकमात्र परमेश्वरको ही आश्रय समझनेवाला) व्यक्ति कर्मोंमें प्रवृत्त होते हुए भी उन कर्मोंके द्वारा बन्धनमें नहीं पड़ता। आशारहित, संयमित चित्तवाला, सब प्रकारके परिग्रहों (संचयों)-का परित्याग-कर केवल शरीर (रक्षा)-के निमित्त कर्म करते हुए भी (व्यक्ति) उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त कर लेता है॥ ८१–८३॥ |
| यदृच्छालाभतुष्टस्य द्वन्द्वातीतास्य चैव हि।<br>कुर्वतो मत्प्रसादार्थं कर्म संसारनाशनम्॥ ८४॥<br><br>मन्मना मन्नमस्कारो मद्याजी मत्परायणः।<br>मामुपैष्यति योगीशं ज्ञात्वा मां परमेश्वरम्॥ ८५॥<br><br>मद्बुद्धयो मां सततं बोधयन्तः परस्परम्।<br>कथयन्तश्च मां नित्यं मम सायुज्यमाप्नुयुः॥ ८६॥<br><br>एवं नित्याभियुक्तानां मायेयं कर्मसान्वगम्।<br>नाशयामि तमः कृत्स्नं ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ८७॥ | अनायास जो उपलब्ध हो उसीमें संतुष्ट रहनेवाले और सभी प्रकारके सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित रहनेवाले पुरुषके द्वारा केवल मेरी प्रसन्नताके लिये किये गये कर्म संसार (रूपी बन्धन)-का विनाश करनेवाले हैं। मुझमें मन लगानेवाला, मुझे नमस्कार करनेवाला, मेरा पूजन करनेवाला और मुझे ही अपना परम अयन (आश्रय) समझनेवाला (योगी) मुझ योगके ईश परमेश्वरको जानकर मुझे प्राप्त कर लेता है। मुझमें बुद्धि रखनेवाले (साधक) सतत परस्पर मेरा बोध कराते हुए और नित्य मेरा वर्णन करते हुए मेरा सायुज्य प्राप्त करते हैं। इस प्रकार नित्य योगयुक्त पुरुषके माया (अज्ञान)-से उत्पन्न तथा उनसे भी उत्पन्न कर्मरूप समस्त अन्धकारका प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं नाश कर देता हूँ॥ ८४–८७॥ |
- अध्याय ११ * । २९३
| मद्बुद्धयो मां सततं पूजयन्तीह ये जनाः।<br>तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ ८८॥<br><br>येऽन्ये च कामभोगार्थं यजन्ते ह्यान्यदेवताः।<br>तेषां तदन्तं विज्ञेयं देवतानुगतं फलम्॥ ८९॥<br><br>ये चान्यदेवताभक्ताः पूजयन्तीह देवताः।<br>मद्भावनासमायुक्ता मुच्यन्ते तेऽपि भावतः॥ ९०॥<br><br>तस्मादनीश्वरानन्यांस्त्यक्त्वा देवानशेषतः।<br>मामेव संश्रयेदीशं स याति परमं पदम्॥ ९१॥<br>त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निःशोको निष्परिग्रहः।<br>यजेच्चामरणालिङ्गे विरक्तः परमेश्वरम्॥ ९२॥<br><br>येऽर्चयन्ति सदा लिङ्गं त्यक्त्वा भोगानशेषतः।<br>एकेन जन्मना तेषां ददामि परमैश्वरम्॥ ९३॥<br><br>परानन्दात्मकं लिङ्गं केवलं सन्निराञ्जनम्।<br>ज्ञानात्मकं सर्वगतं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ ९४॥<br>ये चान्ये नियता भक्तो भावयित्वा विधानतः।<br>यत्र क्वचन तल्लिङ्गमर्चयन्ति महेश्वरम्॥ ९५॥<br><br>जले वा वह्निमध्ये वा व्योम्नि सूर्येऽथ वान्यतः।<br>रत्नादौ भावयित्वेशमर्चयेल्लिङ्गमेश्वरम्॥ ९६॥<br><br>सर्वं लिङ्गमयं ह्येतत् सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्।<br>तस्माल्लिङ्गेऽर्चयेदीशं यत्र क्वचन शाश्वतम्॥ ९७॥ | मुझमें बुद्धि लगानेवाले जो मनुष्य सतत मेरी पूजा करते हैं, उन नित्य योगयुक्त पुरुषोंके योग-क्षेमका मैं निर्वाह करता हूँ और जो दूसरे लोग अभिलषित विषयोंके उपभोगके लिये ही भिन्न-भिन्न देवताओंका पूजन करते हैं, उनका अन्त विषयभोगतक ही समझना चाहिये, क्योंकि देवताके अनुसार ही फल भी होता है¹। जो दूसरे देवोंके भक्त हैं, वे यदि मेरी भावनासे युक्त होकर (दूसरे)देवताओंकी पूजा करते हैं अर्थात् दूसरे देवोंमें मेरी ही भावना करते हैं तो वे भी (मुझमें) भावना करनेके कारण मुक्त हो जाते हैं। अतएव समस्त अनीश्वर² देवताओंका परित्यागकर जो मुझ ईशका ही आश्रय ग्रहण करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है॥ ८८-९१॥<br><br>पुत्र (स्त्री, गृह) आदिमें आसक्तिका परित्यागकर और शोकरहित होकर तथा अपरिग्रही होकर विरक्त पुरुषको मृत्युपर्यन्त (शिव-) लिङ्गमें परमेश्वरकी आराधना करनी चाहिये। जो सम्पूर्ण भोगोंका परित्यागकर सर्वदा लिङ्गका पूजन करते रहते हैं, उन्हें मैं एक जन्ममें ही परम ऐश्वर-पद (मोक्ष) प्रदान करता हूँ। परम आनन्दस्वरूप, अद्वितीय, सद्रूप, निरञ्जन, ज्ञानात्मक और सर्वत्र व्याप्त (शिव-) लिङ्ग योगियोंके हृदय-प्रदेशमें अवस्थित रहता है॥ ९२-९४॥<br><br>नियमपूर्वक भक्ति करनेवाले दूसरे लोग विधि-पूर्वक जहाँ-कहीं भी (शिवलिङ्गकी) भावना करते हुए उस महेश्वर-लिङ्गकी अर्चना करते हैं। जलमें, अग्निके मध्यमें, आकाशमें, सूर्यमें, रत्न आदिमें अथवा अन्यत्र कहीं भी ईशकी भावना करके लिङ्गरूप ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये। यह सब कुछ लिङ्गमय है और सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतएव जहाँ-कहीं भी लिङ्गरूपमें शाश्वत ईशका अर्चन करना चाहिये॥ ९५-९७॥ |
१-देवताके अनुसार फलका तात्पर्य यह है कि जैसी भावनासे देवताकी आराधना की जाती है, वैसी भावनाके अनुसार ही देवता फल देते हैं, जिस रूपमें हम देवताको समझेंगे, उसी रूपमें देवता हमें लाभ देंगे। तत्-तत् फलोंके अधिष्ठाता रूपमें ही देवताकी आराधना करनेपर फलमात्र देकर देवता विरत हो जाते हैं।
२-एक ही देवता पूजककी दृष्टिमें तबतक अनीश्वर है, जबतक पूजक उसे किसी तुच्छ फलका अधिष्ठाता मात्र समझता है। यदि उसी देवताको परमेश्वरके भावसे निष्काम होकर पूर्ण समर्पण-भावके साथ पूजा जाय तो वह देवता अनीश्वर नहीं है, सर्वथा सेवनीय है।
२९४ * कूर्मपुराण *
| अग्नौ क्रियावतामप्सु व्योम्नि सूर्ये मनीषिणाम् ।<br>काष्ठादिष्वेव मूर्खाणां हृदि लिङ्गं तु योगिनाम् ॥ ९८ ॥<br><br>यद्यनुत्पन्नविज्ञानो विरक्तः प्रीतिसंयुतः ।<br>यावज्जीवं जपेद् युक्तः प्रणवं ब्रह्मणो वपुः ॥ ९९ ॥<br><br>अथवा शतरुद्रीयं जपेदामरणाद् द्विजः ।<br>एकाकी यतचित्तात्मा स याति परमं पदम् ॥ १०० ॥<br><br>वसेद् वामरणाद् विप्रो वाराणस्यां समाहितः ।<br>सोऽपीश्वरप्रसादेन याति तत् परमं पदम् ॥ १०१ ॥<br><br>तत्रोत्क्रमणकाले हि सर्वेषामेव देहिनाम् ।<br>ददाति तत् परं ज्ञानं येन मुच्येत बन्धनात् ॥ १०२ ॥<br><br>वर्णाश्रमविधिं कृत्स्नं कुर्वाणो मत्परायणः ।<br>तेनैव जन्मना ज्ञानं लब्ध्वा याति शिवं पदम् ॥ १०३ ॥<br><br>येऽपि तत्र वसन्तीह नीचा वा पापयोनयः ।<br>सर्वे तरन्ति संसारमीश्वरानुग्रहाद् द्विजाः ॥ १०४ ॥<br><br>किन्तु विघ्ना भविष्यन्ति पापोपहतचेतसाम् ।<br>धर्मं समाश्रयेत् तस्मान्मुक्तये नियतं द्विजाः ॥ १०५ ॥<br><br>एतद् रहस्यं वेदानां न देयं यस्य कस्यचित् ।<br>धार्मिकायैव दातव्यं भक्ताय ब्रह्मचारिणे ॥ १०६ ॥<br><br>व्यास उवाच<br>इत्येतदुक्त्वा भगवानात्मयोगमनुत्तमम् ।<br>व्याजहार समासीनं नारायणमनामयम् ॥ १०७ ॥ | क्रियाशीलोंका^१ (लिङ्ग) अग्निमें, मनीषियोंका^२ जल, आकाश और सूर्यमें, अज्ञानियोंका^३ काष्ठ आदिमें और योगियोंका^४ लिङ्ग हृदयमें स्थित रहता है। यदि (ब्रह्म) विज्ञान उत्पन्न न हुआ हो तो विरक्त होकर (द्विजको) अत्यन्त प्रीतिसे ब्रह्मके प्रणवरूपी शरीरका यावज्जीवन जप करते हुए रहना चाहिये। अथवा एकाकी एवं संयत-चित्तवाले द्विजको मरणपर्यन्त शतरुद्रियका जप करना चाहिये, इससे उसे परम पद प्राप्त होता है। अथवा विप्रको^५ चाहिये कि मरणपर्यन्त समाहितचित्त होकर वाराणसीमें निवास करे। वह भी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे उत्कृष्ट परमपदको प्राप्त करता है। वहाँ (वाराणसीमें) सभी प्राणियोंको उनके प्राण निकलते समय (भगवान् शंकर) उस परम ज्ञानको प्रदान करते हैं, जिससे वे (पुनर्जन्मके) बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ९८-१०२ ॥<br><br>सम्पूर्ण वर्णाश्रम-विधिका पालन करते हुए मेरे परायण रहनेवाला अपने उसी जन्ममें (जिस जन्ममें वर्णाश्रम-धर्मका पालन कर रहा है) ज्ञान प्राप्तकर शिवपदको प्राप्त करता है। द्विजो! नीच अथवा पापयोनिवाले भी जो प्राणी वहाँ (वाराणसीमें) निवास करते हैं, वे सभी ईश्वर (शंकर)-के अनुग्रहसे संसारको पार कर लेते हैं, किंतु जो पापाक्रान्त चित्तवाले हैं, उन्हें बहुत विघ्न होते हैं। इसलिये द्विजो! मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर धर्मका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। यह वेदोंका रहस्य है, इसे जिस किसीको नहीं देना चाहिये। धार्मिक तथा ब्रह्मचारी भक्तको ही प्रदान करना चाहिये ॥ १०३-१०६ ॥<br><br>व्यासजी बोले— इस प्रकार उत्तम आत्मयोगका वर्णन करके भगवान् (शंकर)-ने वहीं बैठे हुए प्रसन्नचित्त नारायणसे कहा— ॥ १०७ ॥ |
१-'क्रियाशील' से उन द्विजोंको समझना चाहिये जो श्रौत-स्मार्त क्रियाओंमें दत्तचित्त हैं। इनका प्रमुख आराध्य अग्नि होता है।
२-'मनीषी' से उन्हें समझना चाहिये जो यथाविधि श्रौत-स्मार्त क्रियाओंके अनुष्ठानसे शुद्धान्तःकरण होकर ब्रह्मनिष्ठाकी ओर अग्रसर हैं।
३-'अज्ञानी' शब्दसे उन्हें समझना चाहिये जो वेद-शास्त्रके प्रति निष्ठावान् हैं, पर ऐहलौकिक विविध ऐश्वर्योंके प्रति आसक्त हैं, इन्हें प्राप्त करनेके लिये उत्कण्ठित हैं।
४-'योगी' शब्दसे ब्रह्मनिष्ठको समझना चाहिये। ब्रह्मनिष्ठ होनेके पूर्व संयत एवं एकाग्रचित्त अनासक्त साधककी एक भूमिका होती है। इस भूमिकाके लोग भी यहाँ 'योगी' समझे जा सकते हैं।
५-सर्वप्रमुख होनेसे यहाँ 'विप्र' मात्रका उल्लेख है। यह 'विप्र' शब्द प्राणिमात्रका उपलक्षक है।
| * अध्याय ११ * | २९५ |
|---|---|
| मयैतद् भाषितं ज्ञानं हितार्थं ब्रह्मवादिनाम्।<br>दातव्यं शान्तचित्तेभ्यः शिष्येभ्यो भवता शिवम्॥ १०८॥<br><br>उक्त्वैवमथ योगीन्द्रानब्रवीद् भगवानजः।<br>हिताय सर्वभक्तानां द्विजातीनां द्विजोत्तमाः॥ १०९॥<br><br>भवन्तोऽपि हि मज्ज्ञानं शिष्याणां विधिपूर्वकम्।<br>उपदेक्ष्यन्ति भक्तानां सर्वेषां वचनान्मम॥ ११०॥ | मैंने ब्रह्मवादियोंके कल्याणार्थ इस ज्ञानको कहा है। आप इस कल्याणकारी ज्ञानको शान्तचित्त शिष्योंको प्रदान करें। अजन्मा भगवान् (शंकर)-ने ऐसा कहनेके उपरान्त श्रेष्ठ योगियोंसे कहा—द्विजोत्तमो! सभी द्विजाति भक्तोंके कल्याणके लिये आप लोग भी मेरे कहनेसे सभी भक्त शिष्योंको मेरे ज्ञानका विधिपूर्वक उपदेश करें॥ १०८—११०॥ |
| अयं नारायणो योऽहमीश्वरो नात्र संशयः।<br>नान्तरं ये प्रपश्यन्ति तेषां देयमिदं परम्॥ १११॥<br><br>ममैषा परमा मूर्तिर्नारायणसमाह्वया।<br>सर्वभूतात्मभूतस्था शान्ता चाक्षरसंज्ञिता॥ ११२॥<br><br>ये त्वन्यथा प्रपश्यन्ति लोके भेददृशो जनाः।<br>न ते मां सम्प्रपश्यन्ति जायन्ते च पुनः पुनः॥ ११३॥<br><br>ये त्विमं विष्णुमव्यक्तं मां वा देवं महेश्वरम्।<br>एकीभावेन पश्यन्ति न तेषां पुनरुद्भवः॥ ११४॥<br><br>तस्मादनादिनिधनं विष्णुमात्मानमव्ययम्।<br>मामेव सम्प्रपश्यध्वं पूजयध्वं तथैव हि॥ ११५॥ | जो ये नारायण हैं, वह मैं ईश्वर ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है। जो (हम दोनोंमें) कोई भेद नहीं देखता, उसीको यह परम (ज्ञान) देना चाहिये। नारायण नामवाली तथा शान्त अक्षर-संज्ञक मेरी यह परम मूर्ति सभी प्राणियोंके हृदयमें स्थित है। लोकमें जो भेददृष्टिवाले लोग इसके विपरीत समझते हैं, वे मेरा दर्शन नहीं करते हैं और बार-बार (संसारमें) जन्म लेते हैं। जो इन अव्यक्त विष्णु अथवा मुझ देव महेश्वरको एकीभावसे देखते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिये अनादिनिधन (आदि और अन्तसे रहित) आत्मरूप अव्यय विष्णु मुझे ही समझो और फिर वैसे ही पूजा भी करो॥ १११—११५॥ |
| येऽन्यथा मां प्रपश्यन्ति मत्वेमं देवतान्तरम्।<br>ते यान्ति नरकान् घोरान् नाहं तेषु व्यवस्थितः॥ ११६॥<br><br>मूर्खं वा पण्डितं वापि ब्राह्मणं वा मदाश्रयम्।<br>मोचयामि श्वपाकं वा न नारायणनिन्दकम्॥ ११७॥<br><br>तस्मादेष महायोगी मद्द्भक्तैः पुरुषोत्तमः।<br>अर्चनीयो नमस्कार्यो मत्प्रीतिजननाय हि॥ ११८॥ | जो लोग इन (विष्णु)-को दूसरा देवता मानकर मुझे दूसरा देवता समझकर देखते हैं, वे घोर नरकोंमें जाते हैं, मैं उनमें स्थित नहीं रहता हूँ। मूर्ख हो, पण्डित हो, ब्राह्मण हो अथवा चाण्डाल हो, मेरे आश्रित रहनेवाले (प्रत्येक)-को मैं मुक्त कर देता हूँ, किंतु जो नारायणकी निन्दा करनेवाला है, उसे मैं मुक्त नहीं करता। इसीलिये मेरे भक्त मुझमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये इन महायोगी पुरुषोत्तमकी अर्चना अवश्य करें और इन्हें नमस्कार अवश्य करें॥ ११६—११८॥ |
| एवमुक्त्वा समालिङ्ग्य वासुदेवं पिनाकधृक्।<br>अन्तर्हितोऽभवत् तेषां सर्वेषामेव पश्यताम्॥ ११९॥<br><br>नारायणोऽपि भगवांस्तापसं वेषमुत्तमम्।<br>जग्राह योगिनः सर्वांस्त्यक्त्वा वै परमं वपुः॥ १२०॥ | ऐसा कहकर पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर वासुदेवका आलिंगन करके उन सभीके देखते-देखते अन्तर्हित हो गये। भगवान् नारायणने भी अपने पारमार्थिक विग्रहका त्यागकर उत्तम तपस्वीका वेष धारण किया और सभी योगियोंसे कहा—॥ ११९—१२०॥ |
| ज्ञातं भवद्भिरमलं प्रसादात् परमेष्ठिनः।<br>साक्षादेव महेशस्य ज्ञानं संसारनाशनम्॥ १२१॥<br><br>गच्छध्वं विज्वराः सर्वे विज्ञानं परमेष्ठिनः।<br>प्रवर्तयध्वं शिष्येभ्यो धार्मिकेभ्यो मुनीश्वराः॥ १२२॥ | आप लोगोंने परमेष्ठी (महेश्वर)-की कृपासे संसार (बन्धन)-को नष्ट करनेवाला उन्हीं साक्षात् महेशका निर्मल ज्ञान प्राप्त किया है। इसलिये मुनीश्वरो! विगतज्वर होकर आप सभी जायें और धार्मिक शिष्योंमें परमेष्ठीके ज्ञानको प्रवर्तित करें॥ १२१-१२२॥ |
२९६ * कूर्मपुराण *
| इदं भक्ताय शान्ताय धार्मिकायाहिताग्नये ।<br>विज्ञानमैश्वरं देयं ब्राह्मणाय विशेषतः ॥ १२३ ॥ | इस ईश्वर-सम्बन्धी विशिष्ट ज्ञानको विशेष रूपसे शान्त भक्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्री ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा कहकर योगियोंमें परम श्रेष्ठ वे महायोगी विश्वात्मा नारायण स्वयं अन्तर्हित हो गये ॥ १२३-१२४ ॥ |
| एवमुक्त्वा स विश्वात्मा योगिनां योगवित्तमः ।<br>नारायणो महायोगी जगामादर्शनं स्वयं ॥ १२४ ॥ | |
| तेऽपि देवादिदेवेशं नमस्कृत्य महेश्वरम् ।<br>नारायणं च भूतादिं स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥ १२५ ॥ | वे (मुनिगण) भी देवोंके आदिदेवेश्वर महेश्वरको और भूतादि (समस्त प्रपञ्चके मूलकारण) नारायणको नमस्कार कर अपने स्थानोंकी ओर चले गये। महामुनि भगवान् सनत्कुमारने संवर्तको ईश्वरीय ज्ञान (शिवज्ञानका उपदेश) प्रदान किया। उन्होंने भी (वह ज्ञान) सत्यव्रतको दिया। योगीन्द्र सनन्दनने महर्षि पुलहको और प्रजापति पुलहने गौतमको ईश्वरीय ज्ञान प्रदान किया। अङ्गिराने वेदोंके ज्ञाता भरद्वाजको और कपिलने जैगीषव्य तथा पञ्चशिखको (वह ज्ञान) दिया। सभी तत्त्वोंके द्रष्टा मेरे पिता पराशरने भी वह परम ज्ञान सनकसे प्राप्त किया और उनसे वाल्मीकिने प्राप्त किया। प्राचीन कालमें अर्धनारीश्वर भगवान् शंकरके अंशसे उत्पन्न महायोगी वामदेवजीने मुझसे कहा, जो साक्षात् पिनाकधारी रुद्रस्वरूप हैं ॥ १२५-१३० ॥ |
| सनत्कुमारो भगवान् संवर्ताय महामुनिः ।<br>दत्तवानैश्वरं ज्ञानं सोऽपि सत्यव्रताय तु ॥ १२६ ॥ | |
| सनन्दनोऽपि योगीन्द्रः पुलहाय महर्षये ।<br>प्रददौ गौतमायाथ पुलहोऽपि प्रजापतिः ॥ १२७ ॥ | |
| अङ्गिरा वेदविदुषे भरद्वाजाय दत्तवान् ।<br>जैगीषव्याय कपिलस्तथा पञ्चशिखाय च ॥ १२८ ॥ | |
| पराशरोऽपि सनकात् पिता मे सर्वतत्त्वदृक् ।<br>लेभे तत्परमं ज्ञानं तस्माद् वाल्मीकिराप्तवान् ॥ १२९ ॥ | |
| मामुवाच पुरा देवः सतीदेहभवाङ्गजः ।<br>वामदेवो महायोगी रुद्रः किल पिनाकधृक् ॥ १३० ॥ | |
| नारायणोऽपि भगवान् देवकीतनयो हरिः ।<br>अर्जुनाय स्वयं साक्षात् दत्तवानिदमुत्तमम् ॥ १३१ ॥ | देवकीके पुत्र हरि भगवान् नारायणने भी स्वयं साक्षात् अर्जुनको यह उत्तम ज्ञान प्रदान किया। जब मैंने वामदेव रुद्रसे इस श्रेष्ठ ज्ञानको प्राप्त किया, तभीसे मेरी गिरिशमें विशेष भक्ति हो गयी। मैंने शरणागतोंके रक्षक, शरण (प्राणिमात्रके आश्रय), भूतोंके ईश, गिरिश, स्थाणु, देवाधिदेव त्रिशूली रुद्रकी विशेषरूपसे शरण ग्रहण की है। पत्नी तथा पुत्रोंके साथ आप सब लोग भी उन गोवृषवाहन<sup>१</sup>, कल्याणकारी भगवान् शम्भुकी शरणमें जायें। उनकी कृपासे कर्मयोगके द्वारा व्यवहार<sup>२</sup> करें और विभूतिभूषण गोपति (इन्द्रियोंके पति) महादेव शंकरकी पूजा करें ॥ १३१-१३५ ॥ |
| यदहं लब्धवान् रुद्राद् वामदेवाददुत्तमम् ।<br>विशेषाद् गिरिशे भक्तिस्तस्मादारभ्य मेऽभवत् ॥ १३२ ॥ | |
| शरण्यं शरणं रुद्रं प्रपन्नोऽहं विशेषतः ।<br>भूतेशं गिरिशं स्थाणुं देवदेवं त्रिशूलिनम् ॥ १३३ ॥ | |
| भवन्तोऽपि हि तं देवं शम्भुं गोवृषवाहनम् ।<br>प्रपद्यध्वं सपत्नीकाः सपुत्राः शरणं शिवम् ॥ १३४ ॥ | |
| वर्तध्वं तत्प्रसादेन कर्मयोगेन शंकरम् ।<br>पूजयध्वं महादेवं गोपतिं भूतिभूषणम् ॥ १३५ ॥ | |
| एवमुक्तेऽथ मुनयः शौनकाद्या महेश्वरम् ।<br>प्रणेमुः शाश्वतं स्थाणुं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ १३६ ॥ | ऐसा कहे जानेपर उन शौनक आदि (महर्षियों)-ने पुनः शाश्वत स्थाणु सनातन महेश्वर एवं सत्यवतीके पुत्र व्यासको प्रणाम किया और प्रसन्नमन होकर वे सभी लोकोंके महेश्वर, साक्षात् हृषीकेश, प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यास)-से कहने लगे - ॥ १३६-१३७ ॥ |
| अब्रुवन् हृष्टमनसः कृष्णद्वैपायनं प्रभुम् ।<br>साक्षाद्देव हृषीकेशं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ १३७ ॥ |
१- 'गोवृषवाहन' — धर्मस्वरूप, गोजातिके वृषको महेश्वरने अपने वाहनके रूपमें स्वीकार किया है। इसलिये महेश्वरको 'गोवृषवाहन' कहा गया है।
२- 'कर्मयोगके द्वारा व्यवहार' का तात्पर्य है — अनासक्त-भावसे (कर्मफलकी कामनाके बिना) कर्तव्यबुद्धिसे अधिकारानुसार वेदादि शास्त्रोक्त कर्मोंका पालन करना।
* अध्याय ११ * २९७
| भवत्प्रसादादचला शरण्ये गोवृषध्वजे ।<br>इदानीं जायते भक्तिर्या देवैरपि दुर्लभा ॥ १३८ ॥<br><br>कथयस्व मुनिश्रेष्ठ कर्मयोगमनुत्तमम् ।<br>येनासौ भगवानीशः समाराध्यो मुमुक्षुभिः ॥ १३९ ॥<br><br>त्वत्संनिधावेष सूतः शृणोतु भगवद्वचः ।<br>तद्गदाखिललोकानां रक्षणं धर्मसंग्रहम् ॥ १४० ॥<br><br>यदुक्तं देवदेवेन विष्णुना कूर्मरूपिणा ।<br>पृष्टेन मुनिभिः पूर्वं शक्रेणामृतमन्थने ॥ १४१ ॥ | (भगवन् !) आपकी ही कृपासे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोवृषध्वज (भगवान् शंकर)-की वह अविचल भक्ति हमें प्राप्त हो गयी है, जो देवताओंको भी दुर्लभ है। मुनिश्रेष्ठ ! आप श्रेष्ठ कर्मयोग हमें बतलायें, जिसके द्वारा मोक्षार्थी लोग इन भगवान् ईशकी आराधना करते हैं*। आप (वेदव्यास)-की संनिधिमें ही श्रीसूतजी भगवान् (महेश्वर)-के वचनोंको सुन लें, जो वचन समस्त लोकोंके रक्षक हैं और जिनमें समस्त धर्मोंका संग्रह हुआ है। अतः इनका वर्णन करें। इसके अतिरिक्त आप वह भी बतायें, जो पूर्वकालमें अमृतमन्थनके समय इन्द्रके द्वारा तथा मुनियोंके द्वारा पूछे जानेपर कूर्मरूपी देवाधिदेव श्रीविष्णुने कहा था (आप उसी कर्मयोगका वर्णन करें) ॥ १३८-१४१ ॥ | | श्रुत्वा सत्यवतीसूनुः कर्मयोगं सनातनम् ।<br>मुनीनां भाषितं कृष्णः प्रोवाच सुसमाहितः ॥ १४२ ॥ | इस प्रकार मुनियोंने जो कहा उसे सुनकर सत्यवतीके पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यासजीने समाहित होकर (मुनियोंको) सनातन कर्मयोग बतलाया ॥ १४२ ॥ | | य इमं पठते नित्यं संवादं कृत्तिवाससः ।<br>सनत्कुमारप्रमुखैः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४३ ॥ | श्रीसनत्कुमार आदि प्रमुख मुनियों एवं भगवान् कृत्तिवासा (शंकर)-के मध्य सम्पन्न इस संवादको जो नित्य पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। | | श्रावयेद् वा द्विजान् शुद्धान् ब्रह्मचर्यपरायणान् ।<br>यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम् ॥ १४४ ॥ | अथवा जो ब्रह्मचर्यपरायण विशुद्ध द्विजोंको इस (संवाद)-को सुनाता है, या जो इस संवादके अर्थका अनुसंधान करता है, वह परमगतिको प्राप्त करता है। | | यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः ।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ १४५ ॥ | जो दृढ़व्रती भक्ति-सम्पन्न होकर इस (संवाद)-को नित्य सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होते हुए ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥ १४३-१४५ ॥ | | तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः ।<br>श्रोतव्यश्चाथ मन्तव्यो विशेषाद् ब्राह्मणैः सदा ॥ १४६ ॥ | इसलिये विद्वानोंको सभी प्रयत्नोंके द्वारा नित्य इसका पठन, श्रवण एवं विशेषरूपसे ब्राह्मणोंको इसका सदा मनन करना चाहिये ॥ १४६ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
(ईश्वरगीता समाप्त)
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ११ ॥
(ईश्वरगीता समाप्त)
* इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि वेद-शास्त्र-प्रतिपादित अपने कर्मोंका फलासक्तिरहित होकर सविधि अनुष्ठान ईशकी आराधनाका प्रमुख अङ्ग है।